Friday, December 28, 2012

कल भी लाठियां थीं,
और थी हमारी पीठ,
कल भी तुम हारे थे,
और हुई थी हमारी जीत,
तुम अब भी सोते हो,
और तुम्हारी लाठियाँ,
करती हैं मनमानी,
तुमने पनाह दी है दरिंदों को,
पर तुमने अवाम की,
ताक़त नहीं जानी,
मुश्किल नहीं है ओहदों में,
तुम्हारा ढीठ होना,
पर आज भी सुधार के लिए,
लाठी होने से ज़रूरी है,
पीठ होना ...

Wednesday, December 26, 2012

किसी कोने सिसकती हसरतों से,  
अब भी नयन हम मूंदते हैं,
बड़ी शिद्दत से लेकिन आज भी हम,
खुद को खुद में ढूंढते हैं ...

Sunday, December 23, 2012

जाड़ों की रात आज फिर शीत उगलेगी,
पर कोशिशों से स्थिति ज़रा और संभलेगी,
हमारे साथ थोड़ा सब्र रखना दोस्तों,
विषम ऋतु है, बदलते बदलते बदलेगी ...

Thursday, December 20, 2012

अभी भी कर गुज़रने का कोई फरमान बाकी है,
अभी इन दोस्तों के साथ का अरमान बाकी है,
कभी यह न समझना आइनों सा टूट जाऊँगा,
अभी इन बाजुओं में जिंदगी की जान बाकी है ...

Wednesday, December 19, 2012

कोई शर्म नहीं कि कुछ मौकों को भुना नहीं ,
हुए हाथ बहुत दूर पर हर्ज़ क्या है, जुदा नहीं,
करवट वक़्त की 'नीरज' हमें आगाह करती है,
कभी हमने कहा नहीं, कभी तुमने सुना नहीं,

Tuesday, December 18, 2012

कब तक खाली बातें ही खन्गालोगे
क्या भेड़ियों को शहर से निकालोगे,
वो कहीं और जाकर बस जायेंगे,
और मासूमियत को यूँ ही उजाड़ेंगे,
क्या इतनी हिम्मत बटोर पाओगे,
इन्हें रुखसत इस जहान से कराओगे,
क्योंकि ये 'कुछ' नहीं हैं, बहुत सारे हैं,
जिंदा शरीर से हैं, आत्मा से मारे हैं,
ज़रुरत है हम सब को सावधान करें,
मिलकर इन भेड़ियों का समाधान करें,
कानून और प्रशासन के सहारे न बैठें,
खुद शेर बनें, बस खाल ओढ़ न एंठें,
खुदगर्ज़ हम, खुदगर्ज़ हमारा रहन सहन है,
पर याद रहे इसी जंगल में बेटी है,बहन है ...

Monday, December 17, 2012

दर्द भरी शाम की पनाह से,
रात की बेदर्दी सौगात तक,
ठिठुरती भोर की सलाह से,
शर्माती धूप के जज़्बात तक,
बिसरा कब तन औ धन दिया,
आज बस जीने का मन किया ....

Wednesday, December 12, 2012

बहुत की कोशिशें लेकिन निगोड़ा गम नहीं जाता,
सुबह अब भी लजाती है, ये कोहरा छंट नहीं पाता,
मेरी मजबूरियों की 'नीरज' कुछ तस्वीर ऐसी है,
लिफाफा रोज़ खुलता है, लिखावट पढ़ नहीं पाता ....

Tuesday, December 11, 2012

कुछ है जो जागने नहीं देता ... और उठ कर के लाख कोशिशें कर लो, फिर सोने नहीं देता ....परिस्थिति वक़्त के साथ सहानभूति भी रखती है और झुंझलाहट भी ... यह अजीब है क्योंकि मस्तिष्क अक्सर कई ऐसी स्थितियों को मानने से इनकार कर देता है जिन्हें ह्रदय सहर्ष स्वीकार कर लेता है ...वह इसे intellectual simulation कहता है ...बौद्धिक अनुकरण .

 सब कुछ ठीक चलता है ....अपनी रफ़्तार से ...क्योंकि सफ़र तो अभी प्रारंभ हुआ है ...ये रास्ता ही अपने आप में एक मंजिल है ...मील के पत्थर पड़ाव हो सकते हैं पर सफ़र का काम तो चलना ही है ....लगातार रातों का काम दिन की आँखों पर भारी पड़ने लगता है ....कोई  सुपरमैन नहीं है ...पर जहाँ तक बन पड़ता है, करता है ...दिल की पीड़ा आँखों की थकान में घुली रहती है ...दर्द से निपटने के हम सब के अपने तरीके होते हैं ...मैं कुछ नहीं पूछता .

एक जन्मदिन पर माँ का वात्सल्य बंट जाता है और एक दुआ ह्रदय से निकलते ही टूटते तारे में समा जाती है ...धुओं के अस्थायी गुबार से होती हुई। कभी कभी नाम के मायने नहीं होते ...हाथों से बनाये व्यंजनों और जाम से गुज़रते हुए अस्पताल की चौखटों तक ये रिश्ते बेनाम ही रह जाते हैं ...शायद ये दूसरी दुनिया के रिश्ते हैं जो कहीं अधूरे रह  गए थे ... जैसे ये पहले भी था ...वैसे ही जैसे स्वप्न में फुटबॉल खेलते हुए हम कई गोल दाग देते हैं और जागने पर कुछ देर तक वह एहसास हमारे साथ रहता है ...यह सब अदभुत है ...खुशकिस्मती शायद किसी और नाम से मेरे पास आई है।

Sunday, December 9, 2012

आप की शुभकामनाओं से,
अथाह स्नेह से,
आप के प्रेम से,
चहकती मंगलकामनाओं से,
कुछ संजीदा भावनाओं से,
भर गया हूँ,
कृतज्ञ हूँ और खुशकिस्मत भी,
गर्व भी होता है,
और आती है हिम्मत भी,
इश्वर आप सब को,
ढेर सारी ख़ुशी दे,
बेहतर सेहत दे,
मुश्किलों में हंसी दे,
ज़रूरी ये है,
कि एक दूसरे के लिए हम हैं,
बहुत कुछ और कहता मैं,
पर मेरे पास,
धन्यवाद कहने के लिए,
शब्द कम हैं...

Sunday, December 2, 2012


लिहाफों के घरोंदों में तमन्ना भी लजाती है,
कभी जिंदा थी साँसों में, इमारत ये बताती है,
बड़ी मुश्किल से 'नीरज' आँख में ये पौ उतरती है,
ये जाड़े की सुबह तन्हाई में कितना सताती है ...
एक सफ़र का और इस्तकबाल करें,
पर इस बार कुछ तो बेमिसाल करें
बहुत सुन लिए दिमाग की 'नीरज',
चलो एक बार दिल का ख़याल करें ...
कुछ लुटा सकूँ ऐसी भी कमाई दे दे,
सब आसान लगे जिससे, दवाई दे दे 
इतनी फकत रह गई ख्वाहिश 'नीरज'
मेरे लफ़्ज़ों को मेरी रूह से रिहाई दे दे ...

Sunday, November 18, 2012

चलो कि जिंदगी की रैलियाँ फिर से बुलाती हैं,
चलो कि अनबुझी पहेलियाँ फिर से बुलाती हैं,
कभी जो सो रहीं थी धुंध सी 'नीरज' की नींदों में,
चलो कि राह की अठखेलियाँ फिर से बुलाती हैं

time to move on...........

Thursday, November 15, 2012

बचपना कभी जल्दी में छू कर निकल जाता है ; और कभी बर्फ सा जम जाता है ...और फिर पिघलता नहीं I
दो आँखें अपनी चमक से जगमगाहट देखती हैं ...और ये सिलसिला कुछ दिनों तक चलता है।
फिर रोज पूरब से एक नई आस होती है पर रोज वही सूरज फिर उसी अंदाज़ में जगता है ...कहीं कुछ नहीं बदलता।
कितनी ही दीवाली इन आँखों से गुज़र जाती हैं  ...दूसरों की रौशनी में ;
तब ये कुछ नहीं कहतीं ...विधाता का तर्क देखती हैं ;
फिर एक दिन यही दो आँखें ....किन्ही सहमी सी खामोशियों में फर्क देखती हैं।
कभी सूखी आँखों से फर्क देखा है ...

Monday, November 12, 2012

अबकी दिवाली मना लेना,
चरागों को भीतर सजा लेना,
आतिशी से अलग मन के लिए,
कुछ रौशनी बचा लेना ,
इन दीयों की लौ से परे,
जब स्याह फिर पग धरे,
तब हौसलों के चरागों से ,
मन का दीया जलाना ,
अबकी नीरज न मुरझाना ....

Friday, November 9, 2012




ये बंज़र ज़मीनों का नसीब है नीरज,
नाउम्मीदी भी रही और इंतज़ार भी .......
बूँद बूँद नमी बहती रही नसों से,
अंजाम ढूंढते रहे,
डूब गए दरिया कितने पर हम,
सैलाब ढूंढते रहे ...
मिले न मिले वो आदमी जो मैं था ,
वापसी ही लेकिन इक रास्ता है 'नीरज'.

Friday, October 26, 2012

एक परवरदिगार है, तब किस्मत क्यों लाचार है,
ये किसकी गलती है कि ये इनका भी त्यौहार है ...

Friday, October 12, 2012

बेबसी की चुप्पी बस माहौल कठोर करती है,
रोज़ दबती चाहत दिल को कमज़ोर करती है,
ज़ज्बात की चिड़ियों को चहचहाने दो 'नीरज',
अनचाही ख़ामोशी अक्सर बहुत शोर करती है।  

Monday, October 8, 2012

सदा से तू रहा है साथ मेरे ... मैं कहीं जाऊँ,
तेरी इन पत्थरों की शक्ल में भी हौसला पाऊँ ;
बस इतनी बुद्धि देना इस सफ़र में हमसफ़र मेरे,
निकल जाऊँ न इतनी दूर कि वापस लौट न पाऊँ;

Sunday, October 7, 2012

कितने ही सुकून तेरी उड़ानों में मिले,
जो ज़मीं पर नहीं, तो आसमानों में मिले.....
A very Happy  Air Force Day to all my Air Warrior friends...past and present. Touch the sky with glory!!

Saturday, October 6, 2012

कुछ पुराने ख्वाबों का नन्हा चाँद,
जब दिनों में पलेगा,
जाड़े में नंगे पाँव फर्श पर चलना,
तब फिर अच्छा लगेगा....

Sunday, September 30, 2012

लगे  बर्फ भी तपने,
न हम रहे,  न अपने,
दफ़न हो जायेंगे यूँ ही,
ये कुछ सोते हुए सपने...

Wednesday, September 26, 2012

दिशायें साथ हैं फिर भी कोई ख्वाहिश अधूरी है,
किन्ही खामोशियों से भी नहीं होती ये पूरी है,
हमारे रहगुज़र की कीमतें अनमोल  हैं 'नीरज',
ये कुछ एकांत है ऐसा, दख़ल जिसमे ज़रूरी है;

.....when solitude needs an intrusion.

Monday, September 24, 2012

Every time the waves go back, they take some sand along...and there is this unseen minor struggle to get the foothold back....but it isn't difficult if one loves to face the waves....these waves of life keep challenging us.

वापस जाती ये लहरें अपने वेग से पाँव के नीचे की कुछ रेत भी साथ ले जाती हैं...ज़मीन से पैरों की ढीली पड़ती पकड़ पल भर के लिए संतुलन बिगाड़ सकती है...परन्तु यदि हम लहरों से प्रेम करते हैं तो तुरंत ही ये पकड़ फिर बनाते हैं... जीवन की ये लहरें हमें बार बार सीधा खड़े रहने की चुनौती देती हैं.

Tuesday, September 18, 2012

पहले मैं सोचता था कि कैसे कुछ लोग इतनी देर तक सो लेते हैं और आधे दिन का सूरज ही देख पाते हैं....बाद में जाना कि ये तो अपनी अपनी पसंद है...आधे दिन का सूरज देखो या पूरी रात का चाँद.

earlier i used to wonder as to how people can sleep this late and see only half a day's sun...later i realized that its each one's choice...half a day's sun or a full night's moon.
चलाये तीर तेरे तरकश में लौटा आऊंगा,
नादानियों की चपलता न समझ पाऊंगा,
उखड़ी साँसों में संभला हूँ इसलिए स्थिर हूँ,
अल्पमत की सरकार नहीं जो गिर जाऊंगा,

Monday, September 17, 2012

बरसाती मौसम में
अधखुले छातों पर,
उधड़े हुए ख्वाबों में
बिन ब्याही रातों पर,
जीवन के चौसर में
बीती बिसातों पर,
गुमसुम ख़ामोशी में
सादे जज्बातों पर,
क्यूँ हम आघात करें,
आओ फिर बात करें

Sunday, September 16, 2012

जिगर के उन्मुक्त उमंगों की कहानी थी कभी,
जब बढे, रोमांच की दिलकश जवानी थी कभी,
क्या हुआ जो आज फिर ये छोड़ कर हमको गई,
बचपने से साथ थी, आखिर गँवानी थी कभी;

Saturday, September 15, 2012

वक़्त ने था सब दिया

वक़्त ने था सब दिया,
पर आज फिर मन किया,

दफ्ती का घर,
तितली का पर,
कागज़ की नाव,
नीम की छांव,
भागना अफलातून,
कड़वी दातून,
गिल्ली और डंडा,
ठेले का अंडा,
ईंटों का विकेट,
अँधेरे में क्रिकेट,
गाँव का दंगल,
गुरूद्वारे का लंगर,
चवन्नी के समोसे,
परीक्षा रामभरोसे,
हांकने में सवा सेर,
जेबों में भरे बेर,
टी शर्ट बिलकुल रेड,
दूध और ब्रेड,
साईकिल कजरारी,
हाथ छोड़ सवारी,
किताबें निगोड़ी,
अमरुद की चोरी,
भीगना बेहाल,
कीचड़ में फुटबाल,
लप्पे और झप्पे,
गोलगप्पे,

वक़्त ने था सब दिया,
पर आज फिर मन किया,

Thursday, September 13, 2012

ये लम्हा चल पड़ा है फिर इसे तोहफा नया दे दो,
नहीं ये लड़खड़ाए अब, कोई ऐसी दवा दे दो,
कि भीतर राख के चिंगारी लेती सांस है नीरज,
इसे अब फिर से जलना है, ज़रा सी तुम हवा दे दो;

Wednesday, September 12, 2012

मचलती धारा की रवानी है,
कोई फिसलती निशानी है,
बिसरती  खोती  कहानी है,
भागती गुज़रती जवानी है,
कविता कोई बेगानी है,
या सिर्फ बहता पानी है !!!
जैसी हमारी सोच,
वैसी जिंदगानी है....
                         neeraj
आगे के चक्कर में,
आज का भी मलाल है,
कल क्या होगा,
ये बड़ा सवाल है,
जिंदगी के एक पड़ाव के बाद,
सब का यही हाल है...
महज़ आशंका है सब,
फ़िज़ूल का बवाल है,
ये कोई बिखरता सच नहीं,
बस सहमा हुआ ख़याल है,

Sunday, September 9, 2012

एक और दिन और बादलों का आसमां,
छिपा हुआ एक बड़ा सूरज शर्म से,
जगा दो अपने दिलों के जुगनू,
जगमगाने दो छोटे सूरज मर्म से..

Yet another day with a cloudy sky,
allowing the bigger sun to be shy...
time to illuminate the smaller suns,
in your hearts they stay, the firefly...
अमावस में जब,
खिडकियों के परदे समूचा चाँद सोख लेते हैं,
और तारे ख्व़ाब बनकर नहीं उतरते,
तब भी बंद आँखों में,
तुम जुगनू से जगते हो,
रह रह कर बनाते हो एक चाँद,
जिन्हें मैं तारों से सजाता हूँ,
अब नींद कहीं नहीं जाती है,
कल्पनाओं की चादर में लिपट,
हौले हौले चली आती है.....

Saturday, September 8, 2012

बंद आँखें सोचती हैं, तिमिर है, सो लो,
चीखती इस रात में भी कुछ नहीं बोलो,
कब तलक सोते रहोगे इन अंधेरों को, 
दिन निकलना चाहता है, आँख तो खोलो;
                          

Friday, September 7, 2012

सतरंगी ख्वाहिशों की ख्व़ाब ही निशानी है,
इन हाथों में रंग नहीं बस फिसलता पानी है;

Wednesday, September 5, 2012

इन दिनों फुर्सत कुछ नाराज़ रहती है मुझसे ;  वक़्त नहीं है उसके पास मेरे लिए / हमेशा ऐसा नहीं था...कभी मैं तसल्ली से बैठ कर बारिश की बूंदों को पेड़ों के पत्तों से झर झर झरते देखा करता था / एक अजीब सी कसमसाहट है दिल में, जैसे कुछ छूटता जा रहा है पीछे...जिसे छूटना नहीं चाहिए; रोज़मर्रा की जिंदगी जब बिलकुल रोज़मर्रा सी लगे तो समझ लेना चाहिए की बदलाव की दस्तक है / कुछ अपना ही लिखा याद आता है....

अब रात का मन रात में नहीं लगता,
दिन भी मेरे साथ साथ नहीं जगता;
रोज़ कैसे मन के अपने भाव हारूँ,
कुछ नया मिले एक मन फिर संवारूँ;
मूक दिखती चिड़ियों के संग फिर बोलूं,
जो चिपके हैं अधर से वो लिफ़ाफ़े खोलूं ;
कुछ अपना हार कर कुछ उन्हें  जिताऊं,
ऊब गया हूँ, कुछ वक़्त कहीं और बिताऊं;
 

Tuesday, September 4, 2012

To the mentors in my life...Happy teacher's day
डिग्रियां न होने से अज्ञान नहीं होता,
भौतिकता से मन आलीशान नहीं होता,
बस इतना ही तो सिखाया था गुरुओं ने,
मानवता से बड़ा कोई ज्ञान नहीं होता...
            

Monday, September 3, 2012

दिन हों अच्छे तो गल्ती भी मददगार होती है,
समझते सुख जिसे वो प्यास की अवतार होती है,
अब मनाते हो कि बह जाए हवाओं की तरह,
सब्र करो, रात की भी अपनी रफ़्तार होती है;
                         

Sunday, September 2, 2012

सब कहते हैं मत सोचो, मत देखो, मस्त रहो,
दुःख को कर अनदेखा, खुशियों के परस्त रहो;
कहने में क्या है, कोई पहल कर के दिखाए,
बिना ग़म के इस जिंदगी में मर के दिखाए,
मान लेंगे दिल, दर्द, जज़्बात लफ्ज़ हैं महज़,
कोई आंसुओं का भाव हंसी से भर के दिखाए,

Friday, August 31, 2012

क्या हो तुम और क्या हूँ मैं, है अलग कोई नहीं,
ढूँढ़ते हैं सब उसी को जो कभी खोयी नहीं;
                                 

Wednesday, August 29, 2012

दो उजाला इतना मुझको, रात शरमा कर कहे,
अब बुझा दो बत्तियाँ जो मिल गयी सुबह मुझे;
क्यों पथिक को रोकते हो ओहदों की सरज़मीं से,
जो अगर तुम हो खुदा तो रास्तों को रोक लो ;

Monday, August 27, 2012

आज फिर बारिश की रात है ! कहने को तो ये अचानक आई थी पर दिन में निकली उमसदार धूप शाम को बादलों में जाकर  कड़कती बिजली बन गयी थी ; फिर तो बारिश का आभास होना ही चाहिए था / पर हम कितनी सरलता से अनायास ही कह देते हैं कि अचानक बारिश आ गयी ;  मानो बरसात के मौसम में हम कुछ और ही उम्मीद लगाये बैठे थे / मैं कमरे में बैठा टी वी पर कोयले कि दलाली देख रहा था कि अचानक  सिग्नल आने बंद हो गए / डिश टी वी में यही एक खराबी है कि ख़राब मौसम में यह भी ख़राब हो जाती है / ख़ैर ! मैं फिर भी इसका कृतज्ञ हूँ कि इसकी वजह से मेरा पाव भर खून जलने से बच गया ; वरना जिस तरह से ये राजनेता टी वी पर आरोप प्रत्यारोप जड़ रहे थे, उससे से तो एक आम आदमी का खून ही जल सकता है / इससे बेहतर है कि कोयला ही जले, चाहे सतह के ऊपर हमारे पसीने पर या सतह के नीचे धरती के गर्भ में / खून बचा रहेगा तो ऐसे न जाने कितने घोटाले देखने सुनने का सौभाग्य मिलता रहेगा, और मुझे सदैव गर्व रहेगा हमारे चुनाव पर और हमारी चुनावी प्रक्रिया पर / ऐसे बिरले ही देश होंगे जिन्हें भगवान् चलाता है; यूँ ही नहीं हमारे अधिकतर टूरिस्ट प्लेस मंदिर और मकबरे हैं; हमारी ईश्वर में आस्था इतनी अटूट है कि स्वयं और परिवार के अलावा हमने अपने देश को भी उसके हवाले कर रखा है / इस देश में तो ईश्वर के  पैरों की खड़ाऊँ ने राज किया है; फिर ये नेतागण तो ईश्वर के बनाये हुए इंसान है; ये राज क्यों न करें / क्या कहते हैं आप लोग ?

पानी के एहसास

कुछ एहसास,
पानी की तरह हैं आते,
छुओ तो हाथ गीले हो जाते,
पर ये हाथ में नहीं आते;
रिश्तों और बंधनों से पृथक,
वायदों और जिम्मेदारियों से अलग,
ये दूसरी दुनिया में चलते हैं,
सामाजिक विषमताओं से दूर,
ये महज़ भावनाओं में पलते हैं;
इनका नाम नहीं होता,
इनका अंजाम नहीं होता,
और कितना भी पत्राचार करो,
इनका पैगाम नहीं होता;
इनका आकार नहीं होता,
कोई प्रतिकार नहीं होता,
यूँ तो ये अन्दर बसते हैं,
पर इनका अधिकार नहीं होता;
दोस्तों !
शायद ये हम सब में,
कहीं न कहीं पनपते हैं,
हम कहें, न कहें, मानें, न मानें,
ये चुपचाप खनकते हैं,
ये तो बस,
खुद को खुद से मिलाते हैं,
और कितना भी भर पेट रहें,
ये एक भूख और बढ़ाते हैं;

Friday, August 24, 2012

कोशिश है कि कुछ नए पन्ने जोडूँ खुद में,
सहेज सकूँ गुज़रे पन्नों को एहतियात से,
गुजारिश है नज़ाकत से पढना इन दिनों,
भीग जाता है ताज़ा अखबार भी बरसात से;

ये इनका अभिमान है,
या गूंगेपन का इकरार,
या जैसे किसी ने,
जान डाल दी हो हल्की सी,
पर जब तक,
बिजली का पंखा चलता है,
खिड़की को ओढ़े ये परदे,
मंद मंद हवा में हिलते हैं;
तब इनके झरोखों से,
पारदर्शी कांच,
और उसके पार.....भागती दुनिया,
दिखती है /

Thursday, August 23, 2012

हर ग़म दे जाता एक गिलास निशानी,
बताओ आधा खाली या आधा पानी;
सोचना तो दिमागी उपज है नीरज,
किसी का दिन ढला किसी की जवानी;
ये शहर, ये रास्ते जो साथ चले थे कभी,
बड़े गुमसुम से किसी बादल को तरसते हैं,
ये इंतज़ार है जो पानी सा जमा होता है,
भर जाता है तो आँखों से बरसते हैं

Monday, August 20, 2012

इंतकाम नहीं लेती,
पर पलती हैं,
अंधेरों में नहीं दिखती,
पर रहती हैं,
और कितना भी अकेलो चलो,
ये साथ देती हैं,
इनका बस तुमसे,
सरोकार होता है,
क्यों ग्लानि करते हो,
इन पर दाग नहीं होता है...

Saturday, August 18, 2012

दर्द का अपना रंग नहीं होता,
और आने का कोई ढंग नहीं होता;
हाँ, इसकी 'वजह' का रंग होता है,
धमनियों में बहे तो लाल,
आँखों से बहे तो ख़याल होता है.
मेहनत से बहे तो खारा,
हवाओं में उड़े तो गुलाल होता है,
मन को भाये तो दिलासा,
न भाये तो सवाल होता है;
शरीर में हो तो इलाज़,
रूह में हो तो हलाल होता है,
तुम्हारे पास है तो, 'थोड़ा',
मेरे पास है तो बवाल होता है,
                           ...neeraj
तू चाहे जिस कलम से,
उलझी जागीर लिखता है,
दुआओं का असर है ये,
हौसला अब भी दिखता है;
हसरतों के बादल,
जब छंटते हैं,
तब तक अरसा,
गुज़र जाता है,
बस गुबार बंटते हैं...

थकान का आकार,
शरीर से मिलता है,
और बूढ़े कंधे पर लटका ,
खाली झोला,
हवा में बेमन हिलता है;

वक़्त के साथ,
और असलियत के आभास से,
अन्दर का ढांचा,
शनै शनै गलता है,
पर धन्य है वो आदमी,
जो फिर भी चलता है....

Thursday, August 16, 2012

आज़ादी दी और ईज़ाद करना भूल गए,
क्यों श्वेत पन्नों पर रंग भरना भूल गए,
ये कैसी छटपटाहट दी तुमने मेरे साक़ी,
पंखों को खोल दिया, पैर खोलना भूल गए...

on independence day 2012

ऐ वतन इतना आज़ाद कर मुझे,
संवार सकूँ मैं सपनों की आजादी को;

Monday, August 6, 2012

बीती गुमनामियों का निशान नज़र आता है,
ज़मीं पर रहकर आसमान नज़र आता है,
शालीनता से जिसे बोया था कभी 'नीरज',     
आज उस जीवन का ईमान नज़र आता है...

Saturday, August 4, 2012

इस इग्यारहंवे मंजिल के फ्लैट की बालकनी से एक दुनिया दिखती है; कंक्रीट और कुछ हरे पेड़ों में घुली हुई...पास की इमारत के ऊपरी मंजिल को बादल यूँ छू कर निकलता है जैसे धुआं रिस रहा हो... ये रात सन्नाटों में जागने की रात है...धुंए और बातों के बीच एक अक्स तलाशने की रात है...इसे और कोई नहीं समझता...बस वो और मैं...कमरे में पड़े एक पिंजरे में पड़ी तकिया पर कफी कान खुजाता रहता है...तकलीफ है उसे... तकलीफ है हम सब को...कुछ दिखती है कुछ नहीं...वो कुछ बताता है...कुछ टाल जाता है...दर्द रिसता है पर लहू नहीं दिखता...फिर कभी...अभी सिर्फ सकारात्मकता का दौर है...क्या पा सकते हैं...किसको खोने से बचाना है...क्या करना है और क्या नहीं....इतनी तल्लीन रात पहले कभी नहीं आई...पहले कभी किसी ने इस तरह नहीं समझा...नहीं समझाया..ये इत्तफाक नहीं हो सकता...ये होना था...आगे बहुत से दिन देखने बाकी हैं...पर इस रात की छाप उनपर उजाले सी गिरेगी...मैं एहसानमंद नहीं हूँ...कृतज्ञ भी नहीं...बस खुद को खोजा हुआ पाता हूँ...वो समझता है और बहुत जगह चुप रहता है...नकारात्मकता नहीं आनी चाहिए..शहरी रात के उजाले में बादल तैरते हुए साफ़ दिखते हैं...अब बस इंतज़ार है...चुनौतियों का...एक बादल अपना भी है.

Wednesday, August 1, 2012

इस सिमटती धुंध की परछाइयों में,
रेंगती रुसवाइयों की आस है,
जो नहीं मिलना था आखिर न मिला,
पर महकता आज भी एहसास है;

खुद को खुद में ढूँढने का है समय,
वक़्त का अपना अलग सिद्धांत है,
गम नहीं 'नीरज' समझना तुम इसे,
ये अकेलापन नहीं, एकांत है;

Thursday, July 19, 2012

सुने सुनाये रास्तों का माप रह जाऊंगा,
आंच न दो इस तरह बस भाप रह जाऊंगा,
जब लिखोगे चेहरे इन चंद गुज़रे कहकहों में,
खूँटी की दीवार पर बस छाप रह जाऊंगा;

Monday, July 16, 2012

पलकों से निकलने का अब भ्रम नहीं होता,
यादों का ठहराव लेकिन कम नहीं होता,
ये जो गम बिखरा हुआ है, नयनों से ही छलका था,
बादलों का पानी इतना नम नहीं होता;

Wednesday, July 11, 2012

गीला मन

कपड़ों के साथ ही शायद,
धुल गया था गीला मन,
और सूखने के इंतज़ार में,
पल बीतते रहे,
पर बाहर डोरियों पर टंगे कपड़े,
बारिश में भीगते रहे,
फिर उन्हें उठाकर,
घर के अन्दर टांग दिया गया,
दरवाज़ों के ऊपर, सीढ़ियों की रेलिंग में,
फैला कर उन्हें बाँट दिया गया,
पंखे की हवा और उमस की शर्मिंदगी में,
वे दो दिन में सूख गए,
तह कर के अलमारियों में पहुंचे,
जैसे बाहरी दुनिया से रूठ गए,
धूप न मिलने से,
कमीज़ की जेब पर लगा पेन का निशान,
नीला ही रहा,
कपड़े तो सूख गए पर,
मन गीला ही रहा....

ऐसा क्यों कर होता है,
न समझता है, न रोता है,
न ज़ख्म रहता है न निशाँ,
फिर भी दर्द होता है,
पर ये दर्द खराब भी नहीं लगता,
ये किसी अधूरेपन की पहचान है,
यूँ तो हम हरदम सांस लेते हैं,
पर ये दर्द भी हमारी जान है,
इस दर्द पर उंगली नहीं रख पाते,
कहाँ हो रहा है, नहीं जान पाते,
दिखाते नहीं हैं पर तरसते हैं,
घिर आये बादलों को यूँ देखते हैं,
जैसे पानी नहीं, ये दर्द ही बरसते हैं...

ये दर्द कुछ भी हो सकता है,
कुछ मिलने की ख्वाहिश,
या खोने का ग़म हो सकता है,
तुम्हारा परिपूर्ण होना,
हमारा अधूरापन हो सकता है,
ये कुछ कमी को जताता है,
ठीक से नहीं जान पाते,
पर ये एक उम्मीद जगाता है,
उफनता है, उबलता है, तड़पता है,
यह मिश्रित दर्द,
इसी गीले मन में पनपता है,
यह बताता है,
कितना भी सूखे रहो, अन्दर नमी है,
और किसी कमी का न होना भी,
एक कमी है....

Tuesday, July 10, 2012

कल रात शुरू हुई फुहारें बंद नहीं हुईं / धरती का सीना तर हो गया है, पर ये हैं की अब नहीं रुकतीं / ये मौसम कितना कुछ याद दिला जाता है; सर पर स्कूल का बस्ता रख कर भागना, या फिर इन फुहारों के बीच फुटबाल खेलना, या दोस्तों के साथ यूँ ही सड़क पर टहलते हुए इनसे आलिंगन करना, या माँ के बनाये पकौड़ों और चाय में खुद को सेंकना, भीगना, सूखना और फिर भीगना / पर अब यह सब कुछ नहीं होता; बस यादें भीगती हैं / ये फुहारें अब भी बुलाती हैं, उसी तन्मयता से, उसी लगन से, उसी स्नेह से / पर अब क्या हो गया है; स्कूल के दिन कोसों पीछे छूट गए, फुटबाल टी वी पर आता है, दोस्त बहुत दूर दूर रह कर दोस्ती निभा रहे हैं, माँ साथ नहीं रहती, भीगने, सूखने और फिर भीगने का सुख बचकाना लगता है / हम बड़े हो गए हैं और हमारी खुशियों के मापदंड छोटे; आज कुछ मिनट खड़ा होकर इस गिरते जल को निहारता रहा और देखा उस पत्ते को जिसे मर कर भी सुख भोगना जिंदा रह रहे इंसान से बेहतर आता है  /

Saturday, July 7, 2012

आदमी अपनी पुरानी ठोकरों से सीखता है,
जो दिखा परिचित सा मंज़र, याद में फिर भीगता है,
पर ये आँखें डबडबा जाती हैं 'नीरज' खुद-ब-खुद,
जब कभी मुझको मेरा उजड़ा ठिकाना दीखता है;

Thursday, July 5, 2012

सुनता आया था मैं अपने बचपन से,
बिना चाहत हम कुछ नहीं पाते हैं;

पर इन चाहतों की हद्द कौन तय करे,
ये उड़ते परिंदे हैं, बस में कहाँ आते हैं;

रास्ते अनेक पर जिंदगी मिली एक हमें,
खोने पाने की कश्मकश में पछताते हैं;

लेकिन अनुभवी समाज के ये बाशिंदे,
सदा सीधा ही चलने में सुख बताते हैं;

अंत तक रहेगा ये सवाल हरदम 'नीरज',
ये अनचले टेढ़े मेढ़े रास्ते किधर जाते हैं;

Wednesday, July 4, 2012


काफ़ी इंतज़ार के बाद रात की हुई भारी बारिश एक भीगी सुबह लेकर आई है / कालोनी के अन्दर की सड़क पर पानी अब भी जमा हुआ है और इस पर चलते हुए चप्पलों की छपाक छपाक की आवाज़ चिर परिचित लगती है / पेड़ पौधों के रंग बदले हुए हैं; हलकी हवा में गमलों में लगे पौधे कुछ गर्व से हिलते हैं , उसी तरह जैसे गाँव का लड़का नौकरी मिलने के बाद अकड़ कर चलता है / सड़क उस पार से काफ़ी मिटटी पानी के साथ बहकर इस ओर चली आई है कीचड़ की शक्ल में / लोग नाप तोल कर कदम रखते हैं और कीचड़ से बचकर उस ओर पहुँचते हैं जहाँ सुबह दूध की थैलियाँ बिकती हैं; सड़क पर पैदल चलने वाले लोग सामने से आती गाड़ी देख अपनी रफ़्तार तेज़ और धीमी कर लेते हैं; ताकि गाड़ियों के द्वारा सड़क से उछले पानी से उनका मिलाप बच सके / सब कुछ वैसा ही है जैसा कल था / सात आठ महीने के अंतराल के बाद बारिश हुई और पहले ही दिन सब कुछ कितना जान पहचाना सा लगता है / जैसे ये तो रोज़ की बात है; हम इन जानी पहचानी स्थितियों को कितनी आसानी से जी लते हैं / ये जितना सरल है उतना ही आश्चर्यजनक भी है / समय की दूरी भी हमारे मौसम को एक दिन के लिए भी हमसे अलग नहीं कर पाती / पर क्या इंसानी रिश्तों पर भी ये बात लागू होती है ? ये सरल भी है और आश्चर्यजनक भी /

Tuesday, July 3, 2012

बहुत सा दम निकलता है नियति जब ग्रास लेती है,
ज़रा सुस्ताना पड़ता है, छीन जो आस लेती है,
अभी बोझिल से लगते हैं मगर फिर फड़फड़ाएंगे ,
 मेरी आशा है जो डाली पर बैठी सांस लेती है,
बागों में लगाया अपना पेड़,
कैसे जान पाऊंगा,
उन हथेलियों पर सुर्ख लहू,
कैसे पहचान पाउँगा,
कुछ रहे या बिखरे 'नीरज',
अब लौट कर नहीं जाऊंगा !
सूख कर पलकों पे ये नींदों से नागा करते हैं,
कंटीले रास्ते हैं, हम जहाँ पर रोज़ भागा करते हैं,
कि रखना हौसला नीरज छलकते इन अंधेरों में,
दिवस के कुछ सपन रातों में जागा करते हैं ;

Saturday, June 30, 2012

जीना है अब फिर, नहीं कोई बहाना है,
साँसों में फिर से नया पाना खज़ाना है,
उस चहकते पूरबी सिन्दूर के मुख से,
जिंदगी में फिर नया सूरज उगाना है:

अब दृष्टि कुछ कमज़ोर हो चली है; सूक्ष्म अक्षर बिना चश्मे का नहीं दीखते / लगातार कंप्यूटर का साथ एक बोझ की तरह मन मस्तिष्क में थकान की सतह के ऊपर सतह बनाता जा रहा है / कुर्सियों पर देर तक बैठा आलस्य कमर के इर्द गिर्द इकठ्ठा होने लगा है / कभी कुछ सीढियां चढ़नी पड़ जाए तो सांस फूल जाती है; शारीरिक परिश्रम करना पड़े तो जीभ बाहर को निकल आती है / घर पहुँचते ही पहले बिस्तर दिखता है ;  कभी कभी टाँगे पसार कर या अधलेटा होकर टेलीविज़न के स्पोर्ट्स चैनल कुछ दूर तक साथ निभाते हैं; कुछ याद दिलाते हैं / चंद रोटियों और आयुर्वेदिक औषधियों के पश्चात् रात आती है और अचानक ही चली जाती है / ये कभी इतनी छोटी न हुआ करती थी / सुबह के तौलिये में शीशा दिखता है; मैं अपने 'मैं' को पहचानने की कोशिश करता हूँ / अब तो उसकी याद भी धूमिल हो चली है ; कितना दूर निकल आये हैं, अपनों से दूर, अपने से दूर / क्या ये ज़रूरी था ? क्या ये ज़रूरी है ?

Tuesday, June 26, 2012

शाम ने फिर दर्द का रुतबा सहा था.
फिर मेरे आगोश से पानी बहा था,
बाँध बनकर वो किनारा बन गया फिर,
हौसलों को बांटकर उसने कहा था;

"रूह को सौगात में हम,
रूह से ही चुनते हैं,
दिल में हों ज़ज्बात तो,
पत्थर भी बात सुनते हैं"

Wednesday, June 20, 2012

सब खामोश हैं...

बरगद के नीचे का बोलता चौपाल,
और शोखियों पर डोलती चहचहाहट,
रुक रुक कर बजती घंटियाँ,
और स्कूल से भागने की हडबडाहट,
सब खामोश हैं...

रात गुज़रती ट्रेन की सीटी,
पुल के नीचे पानी की कलकलाहट,
मंदिर के मंजीरों की सरगम,
सरकती उन जुगनुओं की जगमगाहट,
सब खामोश हैं....

सड़कों पर भागते इंजन,
मदिरालय में कांच की खनखनाहट,
मेघों का उफनता गर्जन,
गली में रेंगते कुत्तों की गुर्राहट,
सब खामोश हैं...

विचरता मन, संवरता दर्पण,
वह बहकती रेशमी सी फुसफुसाहट,
ठहरे हुए यौवन का समर्पण,
दिल की चौखट पर क़दमों की आहट,
सब खामोश है...

कभी कभी कुछ बना हुआ टूट जाता है,
भावों का हाथ फिसल कर छूट जाता है,
तब ह्रदय अपने ही आगोश में गुज़र जाता है,
और रोज़ का शोर भी खामोश नज़र आता है,

पर ये महज़ ख़ामोशी है, गूंगापन नहीं है,
समय कुछ अकेला है, सूनापन नहीं है,
बेतहाशा चीखें केवल नींद से जगाएँगी, 
पर ये खामोशियाँ ही अँधेरे दूर भगाएँगी;  
भाप बनकर जिंदगी से रोज़ कुछ उड़ता रहा,
पर वो नीरज जलतरंग की छाया में छिपता रहा,
चुलबुलाती जिंदगी का स्तम्भ लेकिन तब हिला,
जब समस्या के उपाय में सामन्जस्य नहीं मिला;

Monday, June 11, 2012

जो पैबंद लगाये थे,
खिसिया कर अब खुलने लगे हैं,
कभी सोचा था,
एक ज़मीन होगी अपनी भी,
पर रोज़,
पैबंद की,
एक सिलाई और उधड़ जाती है,
अब,
जादू नहीं होते....

Wednesday, June 6, 2012

हर लफ्ज़ तेरा बयां है
हर सफे पे तेरा नाम हैं
तू ही आसमां, तू ज़मीन है
इक तू ही मेरा यकीन है
इक तू ही तो आगाज़ था
इक तू ही बस अंजाम है
   by manjula saxena

आसमां भी तू, ज़मीं भी तू, यकीं भी तू,
दिल और होठों की मिश्रित हंसी भी तू,
आगाज़ भी तू, अंदाज़ भी तू, अंजाम भी तू,
तू ही लफ्ज़, तू ही पहचान और नाम भी तू,
जब हर लम्हा, हर एहसास तुझसे ही आया है,
तो ये कौन है जिसने गलत सही बनाया है !!
         -neeraj
वहां कोई डोक्युमनटेशन नहीं होता,
कोई रिपोर्ट नहीं पढता,
कोई प्रेजेंटेशन नहीं होता,
वहां तो बस चित्रगुप्त होता है,
और होती है उनकी बही,
जो बहुत पहले लिखी गयी;  
वहां कैसे फुसलाओगे,
ये वर्ड, एक्सेल, पावरपॉइंट,
किसको दिखलाओगे,
वो तो बस बही देखेंगे और जोड़ेंगे,
फिर बेदर्दी से कमर तोड़ेंगे ... :)

Saturday, June 2, 2012

बस संवरना चाहता है

किसी के पूछने पर कि कैसे हो,
कह देते हो कि अच्छा हूँ;
पर कभी कभी,
कुछ चुनिन्दा लोगों के साथ,
यह उत्तर,
खुद को ही अधूरा लगता है,
कुछ कहते कहते गला अटक जाता है,
कहाँ पूरा लगता है;
असमंजस की स्थिति होती है,
कहूँ न कहूँ !
सवाल रहता है,
फिर समय निकल जाता है,
बस मलाल रहता है ;

कभी बड़े ओहदे वाले,
फटकार लगा कर ही कोसते हैं,
गुस्सा तो बहुत आता है,
पर हम पहले अंजाम सोचते है,
फिर चुपचाप  ठहरते हैं,
वापस घर आते हैं,
और फिर किसी न किसी बहाने,
घरवालों पर बरसते हैं ;

कभी लोग तुलना करके,
हमें नीचा दिखाते हैं,
हम फिर भी शांत रहते हैं,
जैसे नहीं सुना, जताते हैं ;

पर हमारी इन चुप्पियों के पीछे,
एक निश्चित निवारण होता है,
व्यक्तिगत या व्यवसायिक,
या सामाजिक कारण होता है;

पर कभी कभी चुप्पियाँ,
इन सब से अलग होती हैं,
थोड़ा सा कह कर रुक जाते हैं,
पर इन्द्रियाँ सजग होती हैं,
जितना बाहर निकल पाता है,
उतने में ही बताना होता है,
जो अन्दर रह जाता है,
वह असल खज़ाना होता है;

ये कोई कमजोरी नहीं होती,
अभिव्यक्ति का,
एक और ज़रिया होता है,
जो दिखाई और सुनाई नहीं देता,
पर अन्दर जागता सोता है;
न निकलना चाहता है,
न ठहरना चाहता है,
कुछ अधबुने एहसासों में,
बस संवरना चाहता है;


Thursday, May 31, 2012

Inspired by a poem of Lisel Mueller

जब पूछा जाता है,
क्यों लिखते हो, कैसे शुरू किया;
तब मैं उपेक्षित स्मृति की बात करता हूँ,
उदासीनता में जो ज़रा अधूरी रह गयी,
उस अनोखी प्रकृति की बात करता हूँ;

बिछड़ने के तुरंत बाद के दिन,
गर्मियों का आगमन था,
सब कुछ खिला खिला था,
क्या था जो नहीं मिला था;

भूरे पत्थर की  बेंच जहाँ बैठा था मैं,
उस प्यार से रोपे बागीचे में,
एक दिवस के लिए वह फूली कुमुदिनी,
मौन और बहरी सी थी,
जैसे नींद में बहरा हो जाता कोई,
मदिरामय मदमस्त शराबी;
और गुलाब अपने ही अन्दर,
वापस मुड़ते दीखते थे,
कुछ काला न था, कुछ टूटा न था,
न कोई चेहरा, न कोई पत्ता,
धूप असीमित पड़ती थी उन अवकाशों में;

उस भूरे पत्थर की बेंच पर बैठा मैं,
उत्सुक, अधीर,
गुलाबी, उजले रंगों में भोले से चेहरे,
मुझमे थे रह रह कर उतरते,
तब मैंने भाषा का था मुहं खोला,
और उसमें उड़ेल कर वेदना सारी,
यह माना था,
क़ि नहीं शोक में रहूँ अकेला जीवन भर मैं,
साथ यह मेरी भाषा होगी अब हरदम !!

Tuesday, May 29, 2012

कुछ वक़्त कहीं और बिताऊं

अब रात का मन रात में नहीं लगता,
दिन भी मेरे साथ साथ नहीं जगता;
रोज़ कैसे मन के अपने भाव हारूँ,
कुछ नया मिले एक मन फिर संवारूँ;
मूक दिखती चिड़ियों के संग फिर बोलूं,
जो चिपके हैं अधर से वो लिफ़ाफ़े खोलूं ;
कुछ अपना हार कर कुछ उन्हें  जिताऊं,
ऊब गया हूँ, कुछ वक़्त कहीं और बिताऊं;

Monday, May 28, 2012

ये गर्मियों की शाम जैसे कहीं और होकर यहाँ आती है; एक अनबुझी सी प्यास लेकर, अनकही सी बात लेकर, अनजानी सी सौगात लेकर,  अनसुलझे से जज़्बात लेकर / कुछ कहते कहते जैसे रुक जाती है; कुछ देते देते जैसे थम जाती है; कुछ पास आते आते जैसे अचानक खो जाती है / ये सकुचाई सी शाम रोज़ कुछ पूरा करना चाहती है किन्तु रोज़ कुछ अधूरी ही रह जाती है / कुछ है जो इसे पूरा नहीं होने देता; एहसास, वनवास, संकोच, हया, भय, लज्जा....कुछ तो है जो इसके अधूरेपन को अधूरा ही रखता है / गुज़रती, थकी हुई धूप के अवशेष शनै शनै शीतल होती पवन को रास्ता देते हैं; दिन भर तपन की गोद में बैठी धरती को छाया का आँचल मिलता है; दूर जाता रवि मुस्कुराता हुआ सोते हुए शशि को जगाता जाता है / दोनों हाथ फैलाकर भी इस शाम को समेट पाना मुश्किल है, पर कुछ तो है जो इसकी मुट्ठियों में बंद है, जिसे ये खोलना चाहती है, कुछ लेकर आई है जिसे देना चाहती है; ये हथेलियाँ इसे रोपना चाहती हैं पर वह मुट्ठी खुलते खुलते रह जाती है / ये गर्मियों की शाम जैसे कहीं और होकर यहाँ आती है /

Tuesday, May 22, 2012

फिर वही !!

आज का दिन थका हुआ निकला था; जैसे बीते हुए कल का बोझ लेकर चल रहा हो /  कुछ समय तक मुझे ऐसा आभास होता रहा, परन्तु यह मेरा भ्रम मात्र था / हल्के तैरते बादल जो अचानक कहीं से आ गए थे, अचानक ही कहीं चले गए / आठ बजते तक उमस और गर्मी ने शरीर को चिपचिपा बना दिया / ऑफिस पहुँचते पहुँचते पीठ गीली हो चुकी थी, जैसे होली में कोई पीछे से आपके ऊपर अपनी पिचकारी खाली कर देता है / और ये सब भी तब जब मैं अपनी पांच महीने पुरानी लोन लेकर खरीदी नई कार के एयर कंडिशनर को तकलीफ पहुंचाता रहा था / सीट से चिपकी पीठ पर उसका असर न के बराबर था / आज रास्ते भर मैं यह सोचता रहा की रोज़ कैसे एक नया दिन आ जाता है, बिल्कुल पुराने दिन की तरह / कुछ भी तो अलग नहीं था; हाँ ! स्टीरिओ में एक परिचित गाना बज रहा था " करोगे याद तो हर बात याद आएगी, गुज़रते वक़्त की हर मौज़ ठहर जायेगी " ; 'बाज़ार' फिल्म में भूपेंद्र का स्वरबद्ध किया यह मेरे पसंदीदा गीतों में है / ये पुरानी बात करता है पर प्रत्येक बार मैं इसे एक नए अंदाज़ में सुनता हूँ / एक नए दिन की तरह जिसमे तारीख तो बदल जाती है पर एहसास नहीं बदलते / क्या मैं आगे नहीं देखता, क्या मैं अब भी बीते हुए कल में ही जीता हूँ; ऐसा क्या है मेरे इतिहास में जो मुझे बार बार वापिस ले जाता है; कुछ भी तो नहीं; कुछ भी विशेष या अप्रत्याशित नहीं; फिर क्यों ! क्या कुछ खोने का डर मेरे कुछ पाने की लालसा पर भारी है ; पर खोने को ऐसा क्या है / फिर वही रोज़ के ख़याल, फिर वही रोज़ की सोच, फिर वही रोज़ की बातें; वही दफ्तर, वही कुर्सी मेज़, वही कर्मचारी, वही चाय की प्याली, वही कागजों का पुलिंदा, वही कंप्यूटर की पुरानी साजिशें, वही बॉस की अनकही फरमाइशें, वही मैं और वही मेरी संकुचित दुनिया / बीती रात सोचा था; कल एक नया दिन है; नया दिन आया, पुराने अंदाज़ में; ये मेरी सोच की कमी है या स्वभाव की !!

ई मेल और फेसबुक गतिविधियों से भरे पड़े हैं; कितनी ही नई कवितायेँ, तस्वीरें, सन्देश ! कितने ही सन्देश कहते हैं," ये मेरी अपनी लाइफ है, मैं इसे अपने ढंग से जीऊंगा; किसी को इसमें दखल देने का अधिकार नहीं, मुझे एक बार ही जीना है इसलिए मेरी मर्ज़ी सर्वोपरि है" / या फिर उन लोगों के उदाहरण हैं जिन्होंने ने जो करना चाहा वो किया, प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद; जो अपने ढंग से जिए, अपने सपनों को साकार करने के लिए, जो साधारण इंसान थे परन्तु असाधारण कार्य कर बैठे / यह सब पढ़ना मुझे अच्छा लगता है; बस एक ही बात दिल को कचोटती है, कि उन लाखों लोगों का क्या जो इसी चाहत में सब कुछ गवां बैठे; जिन्हें आज कोई नहीं जानता, जिनका ज़िक्र कहीं नहीं होता; जो अपने पीछे रोते बिलखते परिवार छोड़ गए; आकाश की चाहत में धरा ही छोड़ गए / उनकी भी तो एक ही लाइफ थी, उन्हें भी सफलता और जीवन से प्रेम रहा होगा, उन्होंने भी मशक्कत की होगी / ये सब मुझे कन्फ्यूज़ करता है; चेतावनी देता है कि सपनों को पाने के लिए कोई अलग दुनिया नहीं है; हकीकत यहीं है और इसी में से गुज़रना है; अपनी गणित ठीक कर लो, कितना और पा सकते हो; कितना खोना पड़ेगा, प्राफिट होगा या लोस ; क्या अंजाम झेलने की भी क्षमता है या ये तय है कि जो चाहते हो वो मिल जाए तो बाकी सब स्वयं ठीक ही रहेगा /

ये शायद मेरी समस्या ही नहीं अपितु उन सब की भी है जो मस्तिष्क, ह्रदय और भावनाओं के बुने जालों में रहते हैं / जो सोच रखते हैं और समझ तो सकते हैं पर सपने अपनी सोच और समझ से ऊपर देखना पसंद करते हैं / जो कुछ और करना तो चाहते हैं पर ठीक से नहीं जानते कि क्या; जो समाज में रहते भी हैं और अलग भी हैं; जिन्हें लोग स्वीकार करते हैं पर वे खुद को स्वीकृत नहीं समझते / यह जटिल है / समाजिकता और इच्छाओं के दाँव पेंच में इनकी पतंग न ही ऊपर जा पाती है और न ही नीचे आती है / बस उड़ती रहती है, अनमनी सी, पवन के वेग में, कभी तेज़ कभी धीमी / ये साहस का अभाव नहीं है; जिम्मेदारियों का आभास है जो उन्हें यह रिस्क लेने से रोकता है / हर नया दिन पुराने दिनों कि तरह एक और नए दिन का इंतज़ार करता है /

Monday, May 21, 2012

कुछ खोना नहीं चाहती है,
कुछ पाना नहीं चाहती है,
अवकाश के बाद आई,
मई की ये दोपहर,
देख मेरा खारापन,
बस गुज़र जाना चाहती है;
ठहरे हुए पत्थरों पर,
लगातार पड़ती ऊष्मा,
इन पर कुछ ज्यादती है,
ये पत्थर हिल नहीं पाते,
मूक रहते हैं,
अविचल, संकोच रहित,
और सोख कर सारी गर्मी,
तपते रहते हैं,
किस्मत समझकर,
इंतज़ार है इन्हें,
बारिशों का,
मेरी तरह !!!

Monday, May 14, 2012

वक़्त के पांव

कहते हैं वक़्त के पांव नहीं होते; बिना आहट आता है और चला जाता है / आने और जाने के बीच उसमें ठहराव होता है, छोटा या बड़ा ठहराव; जो इस पर निर्भर करता है की वक़्त साथ में वेदना लाया है या सुख / जो भी हो; कम या ज्यादा, पर आया वक़्त गुज़र ही जाता है / यह सब कितना सरल लगता है, खासकर तब जब हमें किसी को उसके बुरे समय में दिलासा देनी होती है, या जब किसी के अच्छे समय को देखकर खुद को दिलासा देनी होती है / परन्तु क्या कभी गौर किया है कि कहीं कहीं, कुछ जगहों पर, कुछ लोगों के लिए यह ठहराव कितना लम्बा होता है; जब वक़्त केवल एक बार आता है और साँसों के साथ ही जाता है / जब जीवन ठहराव में ही बीत जाता है; जब कुछ भी वक़्त का मोहताज़ नहीं होता; जब आहटों के मायने नहीं होते; जब कोई शक्ल तो होती है, पर आइने नहीं होते / यह सब मुझे उन दो घंटों के बीच महसूस हुआ जब मैं उससे मिला / ये कोई हादसा नहीं था, कोई घटना या दुर्घटना नहीं, कोई जीत या हार भी नहीं, बस एक छोटा सा लम्हा था जो मेरे लिए तो भाग रहा था, पर उसके लिए बिलकुल थमा हुआ था / मैं इसे कहीं भी, कभी भी दोहरा सकता हूँ क्योंकि ये मेरे अन्दर आज भी बिलकुल ताज़ा है; पर वक़्त कि नज़रों से देखें तो ये कुछ तेईस साल पहले कि बात है /

मैं बंगलूर से बेलगाँव जा रहा था, अपनी बास्केटबाल टीम के अन्य खिलाडियों के साथ ; आज बेशक मुझमें वह अवशेष न नज़र आयें पर उस समय मैं देश के चुनिन्दा युवा प्रतिभावान खिलाडियों में से एक था / अपने इस शौक को मैंने कई वर्षों तक जीवित रखा; आज भी इन शारीरिक और सामाजिक विफलताओं के बावजूद, यदि खेलने का मौका मिलता है तो मन में कहीं कोने में टांग सिकोड़े बैठा वह खेल का कीड़ा कुलबुलाने लगता है / पर ये मेरी बात है और यहाँ यह केवल वजह मात्र है जिसके कारण रात के ग्यारह बजे मैं उस छोटे से स्टेशन पर बैठा दूसरी गाड़ी का इंतज़ार कर रहा था / इस स्टेशन का नाम मिराज़ था और बंगलूर से यहाँ आने के बाद हमें गाड़ी बदलनी थी जो रात में एक बजे हमें मिलती / बाकी साथियों ने मुझे सामान के पास बैठाया और सब घूमने निकल गए / मैं अपनी टीम में उम्र में सब से छोटा था, कुछ उन्नीस बरस का, और यूँ कहने को तो मैं लगभग छः फीट का था पर इस बास्केटबाल की टीम में मैं लम्बाई के लिहाज़ से भी सबसे छोटा था / यदि इस दानवीय टीम को मैं अपने गाँव ले जाता और इन्हें मात्र देखने के लिए टिकट लगाता तो शायद आज मैं भी दो बिस्वा ज़मीं खरीद ही लेता / परिवार में छोटों पर हम ज़िम्मेंदारियां नहीं डालते पर यहाँ मुझे आसानी से सारे सामान की हिफाज़त का ज़िम्मा थमा दिया गया था / उन्हें पता था की बड़ों का लिहाज़ और मेरी आगे खेलने की लालसा मेरी मज़बूरी है ; यह उत्पीड़न था,  जिसे हम अनायास ही छोटी छोटी बातों से शुरू कर देते हैं और बाद में जब उत्पीड़ित थक हार कर विद्रोह करता है तो असामाजिक तत्त्व या फिर बागी कहलाता है / आप सोचेंगे कि इतनी छोटी बात को इतना बड़ा तूल क्यों, पर यकीन मानिये, हजारों मील लम्बा सफ़र भी एक छोटे से कदम से ही शुरू होता है / वरना...घूमने की इच्छा तो मेरी भी थी /

ख़ैर ! मैंने अपने बैग से अर्थर हेली की किताब निकली और उसमें खो गया; उन दिनों मैं  अर्थर हेली और निर्मल वर्मा को खूब पढता था / इस स्टेशन से अधिक  गाड़ियाँ नहीं गुज़रती; प्लेटफार्म की निर्जनता और अजीब सी ख़ामोशी इसका सबूत थीं / मैं इस लोहे की बेंच पर बैठा था और मेरे आगे कुछ बैग और अटैची करीने से रखीं थी जिनकी अनचाही रखवाली का ज़िम्मा मुझ पर था / मेरे दायें हाथ पर वो किताबों की लकड़ी की दुकान थी जिसे कुछ ही देर पहले उस दुकानदार ने बड़ी तल्लीनता से लकड़ी के तख्ते लगा कर बंद किया था / एक ठेला भी उससे कुछ ही दूर पर अनमना सा आराम कर रहा था; पानी के नलों के बगल में, और उसके पास ही बेंच पर उसका मालिक सो रहा था, ठंडी पड़ी चाय और बासी होती पूरी और भाजी के बीच / बीच बीच में एक पुलिस वाला कहीं से आकर कहीं को चला जाता था, अपने हाथ में उलझे डंडे को घुमाता हुआ / बाएँ हाथ पर लोहे का मोटा खम्बा था, ऐसे कई खम्बों पर इस प्लेटफार्म की ऊँची लोहे की छत अटकी पड़ी थी; एक गाय भी थी जो पीछे सीढ़ियों के पास बैठी थी मानो ये जगह उसने पेटेंट कराया हो / कुछ सौ मीटर दूर जहाँ बाहर निकलने का द्वार था, वहां कुछ चहलकदमी अवश्य थी; मेरे सर पर एक पंखा था जो केवल इसलिए चल रहा था क्योंकि उसे चलाया गया था ; ठीक वैसे ही जैसे हम अमूमन नौकरी में अपनी फ़ाइलें निपटाते हैं / यदि मेरे बगल रखी पानी की वह बोतल नीचे न गिरती तो शायद वह नहीं जगता; पर उसे जागना था और वह जगा; और फिर मुझे वह आवाज़ सुनाई दी " कुछ खाई का दै देता भईया, भिनसार देख लेइत " /

वह मुझसे कुछ पांच मीटर की दूरी पर था, बिलकुल लोहे के मोटे खम्बे से सटा हुआ ; और मैं अब तक अपने को अकेला समझ रहा था / मैंने आश्चर्य से देखा; वह कुछ गठरी जैसा ही था, अंग्रेजी के जेड अक्षर की तरह, एक डंडा जो सिरहाने पड़ा था, कुछ कपड़ों की शक्ल में चीथड़े , हलकी सफ़ेद दाढ़ी जो शायद अब न बढ़ती थी न घटती थी, अन्दर धंसी हुई आँखें जिन्हें देखने का शौक न बचा था, डंडे के बगल रखा वह बड़ा सा खोरा (कटोरा) जो शायद जूठन की खान था; और वह कराहती पर बिलकुल साफ़ आवाज़, " कुछ खाई का दै देता भईया, भिनसार देख लेइत " / भिनसार हमारे यहाँ सुबह को कहते हैं; ये मेरे गाँव की बोली थी ; मेरे गाँव से कोसों दूर, इस अनजानी जगह पर , अनजानों के बीच, अनजानी रात में, अनजाने कान उस अनजानी बोली को साफ़ पहचान सकते थे / आश्चर्य था; मेरे इतने करीब एक जीवन था और इतनी देर तक मुझे इसका एहसास भी नहीं; इस निर्जन स्टेशन पर हमारे एहसासों का ये हाल है तो भीड़ में इन आवाजों का क्या अस्तित्व होगा ! अब मैं उसे देख सकता था पर शायद उसकी आँखें जवाब दे चुकी थीं; या शायद उन आँखों ने कभी रोशनी देखी ही न हो; पर वह तो भिनसार देखने की बात करता है /

उसे याद नहीं कि वह यहाँ कैसे पहुंचा, कब पहुंचा, कहाँ से पहुंचा, पहुँचाया गया या फिर यूँ ही पहुँच गया / कुछ बेटवा और पतोहू कि बात करता है पर इससे अधिक कुछ नहीं; बस कुछ खाने को मांगता है / मेरे पास खाने को कुछ नहीं है; मैं उसे बीस रुपये देना चाहता हूँ, ये मेरे लिए एक समय के भोजन की रकम थी उन दिनों पर वह नहीं लेता; कहता है " रुपिया न चाही बच्चा, कुछ खाई का दै देता , भिनसार देख लेइत" / यहाँ कुछ खाने को नहीं मिल रहा; स्टेशन के बाहर हो शायद, पर मैं नहीं जा सकता था; मैं इंतज़ार करने लगा, शायद एकाध साथी पहले आ जाए / मैं उससे खड़ी बोली में ही बात करता हूँ; क्यों ! मुझे पता नहीं; मैं उसे छूना नहीं चाहता, पर मैं उसे खाना देना चाहता हूँ, मैं उसके पास नहीं बैठना चाहता पर मैं उससे साहनुभूति भी रखता हूँ / ये असमंजस की स्थिति है; हमारी आज की दशा को उजागर करती हुई, हम आज भी सहानभूति तो रख सकते है, दूर से शायद कुछ कर भी सकते हैं, पर इनमे सम्मिलित नहीं होना चाहते, इन्वोल्व नहीं हो सकते क्योंकि हमारी अपनी लाइफ है और हैं हमारे अपने सपने/ हम हकीकत में भी हैं और हकीकत से परे भी /

मेरे कुछ साथी लौटे हैं; ट्रेन का समय हो चला है / मैं दौड़ कर स्टेशन के बाहर जाता हूँ, एक दूकान है, वहां चाय भी मिल रही है और पावरोटी भी; मैं पावरोटी खरीदता हूँ और एक कुल्हड़ में चाय भी; संभल कर वापस लौटता हूँ वरना चाय छलक जायेगी / स्टेशन पर कुछ आवाजाही बढ़ गयी है; ट्रेन आ रही है; मेरे साथी अपना सामान उठा लेते हैं; उनमें से एक मेरा बैग भी उठा लेता है, मैं दूर से देखता हूँ, उसका कृतज्ञ रहता हूँ / वो ट्रेन की ऑर बढ़ चलते हैं; मैं उस बूढ़े के पास पहुँचता हूँ उसके हाथ में कुल्हड़ थमाता हूँ जिसे वो सावधानी से अपने बगल में रखता है जिससे कि बाद में  टटोल कर उठा सके / फिर मैं उसे पावरोटी देता हूँ और कहता हूँ, " बाहिर दुकनिया में इहै रहा बाबा, खाई ल्या " और जैसे ही जाने को होता हूँ, वह मेरी कलाई पकड़ लेता है / भाषा और बोली का महत्व उस दिन मुझे चरितार्थ हुआ; "हे बेटवा, हमहू का लियाय चल्त्या, तोहरे गोड़े गिरी बेटवा, हमहू का लियाय चल्त्या" / एक अधमरे बूढ़े के लिए, मेरी कलाई पर उसकी पकड़ काफ़ी मजबूत थी ; वैसे ही जैसे एक डूबता हुआ किसी सहारे को पकड़ लेता है / मैंने उससे हाथ छुड़ाया था और दौड़ कर ट्रेन में जा बैठा था; पर मेरी कलाई पर उस पकड़ की गर्माहट काफ़ी दिनों तक मेरे साथ रही / वो पीछे से चिल्लाता रहा; मैं अपनी राह चलता रहा; उसकी अपनी मज़बूरी थी, मेरी अपनी / उसका वक़्त बरसों से उसी लोहे के खम्बे के नीचे ठहरा हुआ था, पर मेरा वक़्त तो भाग रहा था; मैं क्या करता !

Wednesday, May 9, 2012

सरलता बहुत भोग लिए हैं

इस शहरातू जीवन में,
जब सूरज सर पर तपता है,
और गर्मी प्यास उगाती है,
तब कूलर और फ्रिज का पानी,
या पेप्सी, कोला की बोतलों,
में कितना भी डूबो,
प्यास नहीं जाती है !!!
तब याद आता है,
कुएं का एक लोटा ताज़ा पानी,
और एक भेली देसी गुड़,
बेल का रस,
कच्चे आमों का पना,
क्या आपको है मना ?
नहीं न !!
पर ये सब यहाँ शहर में,
नहीं बिकता,
मेरा विश्वास कीजिये,
अब ये गाँव में भी नहीं मिलता ;
वहां भी हमने,
कृत्रिम उपाय खोज लिए हैं,
अब हम जटिल होना चाहते हैं,
सरलता बहुत भोग लिए हैं;
और ये सिर्फ प्यास तक,
सीमित नहीं है,
हमारी भूख भी अब जटिल है,
नियमित नहीं है,
चाहे पानी हो या खाना,
या दुःख सुख का आना जाना,
या रिश्ता कोई पुराना,
या हो यूँ ही मुस्काना,
इन सब में भी बहाना ?
तरक्की की दिखावट में,
हमने कितने अनचाहे रोग लिए हैं,
अब हम जटिल होना चाहते हैं,
सरलता बहुत भोग लिए हैं;

Monday, May 7, 2012

एक सत्य : अंत या आरंभ

उस शाम ढलते सूरज को देखना न सुखद लगा न ही दुखद ; बस कुछ अजीब लगा /  ऐसा लगा जैसे यह एक सत्य का अंत है, या एक दूसरे सत्य का आरंभ; या शायद दोनों, या फिर कुछ भी नहीं /
मैं इस चढ़ती सड़क की ऊंचाई पर बैठा था; एक सीमेंट की बेंच पर, जिसके अन्दर छिपा लोहा बाहर आने को बेचैन था / ये पतली सड़क नीचे दूर तक जाती है, मंदिरों और दुकानों के साथ /  मैं यहाँ कभी कभी आता हूँ,  जब मुझे लगता है कि क्रिकेट और व्हिस्की के आगे भी दुनिया है / पर मैं अक्सर नीचे सड़क कि ढलान पर ही रहता हूँ ; उस पतले चौराहे के पास जहाँ से बायीं ऑर हनुमान मंदिर का रास्ता चला जाता है / वहां लोगों को देखता रहता हूँ मंदिर कि ऑर से आते हुए या जाते हुए / या चौराहे से सीधा कुछ और आगे चला जाता हूँ, जहाँ गोलगप्पे कि रेड़ी लगती है; अभी भी वो रुपये में चार देता है, फिर भी लोग पांचवी मांगते हैं; कहते हैं तीन ही तो हुई / उसके बगल ही लकड़ी और टीन के बने गल्ले पर बैठा पनवाड़ी मुझे पहचान गया है; मेरे पहुँचते ही विल्स कि एक सिगरेट थमा देता है जैसे मैं चिमनी बनने ही वहां आया हूँ / पर यह सब वहां नीचे सड़क कि ढलान पर होता है / मैं ऊपर सड़क कि ऊंचाई नहीं चढ़ता क्योंकि इसमें मेहनत लगती है और इस तरफ भीड़ भी कम हो जाती है/ अक्सर हम अपने अनुमान लगा लेते हैं थोड़ी सी मेहनत से बचने के लिए / ख़ैर आज अनायास ही मैं चढ़ान पर था और इस तरफ वाकई लोग न थे; अलबत्ता  दो एक लकड़ी कि टाल ज़रूर थी जहाँ जलाऊ लकड़ियां बिकने को तैयार बैठी थीं/  
ये बेंच भी मुझे किस्मत से ही मिल गयी, इसकी पीठ सड़क कि ऑर थी और यदि इसके नीचे बैठा कुत्ता अचानक ही निकल कर नहीं भागता तो मुझे ये बेंच निश्चित ही न दिखती / मुझे लगा जैसे ज़माने से इस सीमेंट की टूटी बेंच पर कोई नहीं बैठा; पर यहाँ से सब कुछ कितना साफ़ दिखता है, ऊंचाई से, जैसे एरिअल व्यू हो /  नारंगी सूरज जो पानी के उस ऑर धरती में समाने के लिए धीरे धीरे उतर रहा है; वो पानी जो बहुत दूर से आता है ढेर सारी श्रद्धा, आस्था और गन्दगी बटोरे हुए, उस पानी तक पहुँचने के लिए कुछ दो सौ मीटर का बलुआ तट और पानी में तैरता नारंगी रंग / यह सब अदभुत है; गंगा को हमारे देश में यूँ ही नहीं पूजा जाता /
यह सब मुझे तब तक अदभुत लगता है जब तक वह नारंगी रंग मुझे रंग ही दिखता है; यह सब चंद मिनटों तक रहता है / तब एक आग दिखती है; और उसके बगल एक और, और थोड़ी दूर एक और, और उनसे कुछ ही दूर बैठे कुछ लोग / एक सिहरन सी दौड़ जाती है; तो ये है नारंगी रंग, अब ये सुन्दर नहीं लगता, अचानक पानी पर भी नहीं दिखता, सूर्य कहाँ गया; वहीँ तो है; फिर फीका क्यों हो गया ! अब यह सुखद नहीं है, दुखद भी नहीं, बस अजीब है , एक सत्य का अंत या एक दूसरे सत्य का आरंभ; या शायद दोनों, या फिर कुछ भी नहीं /  कहते हैं यहाँ आग कभी नहीं बुझती; बस दिन ढलता है, जीवन के साथ /


Tuesday, May 1, 2012

पूनम की रात,
जमुना तट पर,
उजले संगमरमर,
गुम्बद, मीनारें,
उस पर नक्काशी,
सौंदर्य का आलम,
प्रेम की काशी,
दिखती है...

पर उसमें से,
आज भी,
रोता, बिलखता,
देह का खारापन,
और,
टप टप रिसता,
मजदूरों का लहू,
नहीं दिखता !

एक शहंशाह,
और उसकी बेगम,
इसकी तलहटी में,
मज़े से सोते हैं,
और दर दर भटकते,
हथकटे  मजदूर,
प्रेम की पराकाष्ठा पर,
आज भी रोते हैं....

Monday, April 30, 2012

जिन भी मैदानों में दौड़ लगायी,
बस रह गए ईनाम पाते पाते,
दौड़े तो थे, इसका संतोष रहा,
हताशा भी जाएगी जाते जाते,
कितनों ने समझाया था राहों में,
क्यों खुद को हो इस तरह सताते,
पर हमने न एक मानी किसी की,
अपने में ही रहे मुस्कुराते,
समझने के लिए ज़रूरत थी जिसकी,
अब वो दर्द हम कहाँ से लाते....

Friday, April 27, 2012

प्रश्न में ही उत्तर लिखित है,
ईमानदारी से पढो,
समस्या में समाधान निहित है,

जीवन की ऐसी ही व्यवस्था है,
धैर्य से लड़ो,
दुःख, सुख की पहली अवस्था है,

Thursday, April 26, 2012

 रात के बाद फिर रात आएगी; कभी सोचा न था,
 अश्कों पर भी धूल जम जायेगी; कभी सोचा न था,
 कि जिससे रहे पूछते प्रश्न सारी उम्र तुम 'नीरज',
 वो फितरत खुद प्रश्न बन जायेगी; कभी सोचा न था ;

Wednesday, April 25, 2012



वहां दुःख नहीं होता वहां आंसू नहीं होते,
कोई नहीं रोता वहां अपने नहीं खोते,
धन और कीर्ति का वहां कुछ मोल नहीं होता,
वैभव समृद्धि का झूठा कोई खोल नहीं होता,
वहां पर द्वेष नहीं होता वहां बिछोह नहीं होता,
बस प्रेम पनपता है वहां, विद्रोह नहीं होता,
जो भी करते हो उसका कोई बही नहीं होता,
गलत नहीं होता वहां कुछ सही नहीं होता,
वह केवल तब ही जगती है, जब पहली दुनिया सोती है,
बचपन से सुनता आया था, एक दूसरी दुनिया होती है,


Wednesday, April 18, 2012

क्या राज़ है जो नहीं खोल पाते हो

तिनका तिनका रोज़ कसमसाते हो,
क्या राज़ है जो नहीं खोल पाते हो,

है कोई ऐसी लिखावट बांच जो पाते नहीं हो,
या कोई भीतर झरोखा झाँक जो पाते नहीं हो,
या निगोड़ी चाकरी है व्यर्थ के संताप की,
स्वास्थ्य की कोई है चिंता बाँट जो पाते नहीं हो,

पूछने पर क्यों हिचकिचाते हो,
क्या राज़ है जो नहीं खोल पाते हो,

विरह का उदगार है या मिलन का विस्तार है,
भूलने की प्रतिक्रिया या स्मरण का आहार है,
ईश की है बंदगी या नव मनुज अवतार है,
तुम कभी खोते हो जिसमे कौन सा संसार है,

मानवीय सुख में भी झुंझलाते हो,
क्या राज़ है जो नहीं खोल पाते हो,

या ये सब कुछ भी नहीं बस ह्रदय का सूना सजल है,
बोल कुछ निश्चित नहीं पर गुनगुनी कोई ग़ज़ल है,
ख़ोज है एकाकी की ये, ठीक से निश्चित नहीं पर,
कुछ नहीं हो पाया जिसको पाने की इच्छा प्रबल है,

वियोग की छांव में मुस्कुराते हो,
क्या राज़ है जो नहीं खोल पाते हो,

Monday, April 16, 2012

उसके आने की वजह,
आदतन है,
इसके रहने की वजह,
भी आदतन है,
फिर संवरना क्यों नहीं भाया,
जब वह एक दिन नहीं आया;
सही गलत का प्रश्न नहीं,
अपना दृष्टिकोण है,
तुम भी सही, हम भी सही,
बस परिस्थिति कमज़ोर है,
पर भिन्न विचारों के बीच भी,
कितनी भव्यता है,
बदलती संस्कृति तो है,
पर पुरानी सभ्यता है;
उसे फौज के मायने नहीं मालूम,  उसे तो बस आदत है अपने पिता को छुट्टियों में आते जाते देखने की; वह खड़ी हो जाती है सामने पत्थर पर, नन्ही सी हथेलियाँ बच्ची की, अपने फौजी बाप को कन्धों पर होल्डाल लटकाए पहाड़ियों के टेढ़े मेढ़े रास्तों से उतरता देखती हैं....
यह अब आम बात है, रोज़मर्रा सी; इन पथरीले रास्तों से उतरते वक़्त निगाह रह रह कर ऊपर जाती है, वह अब भी खड़ी है...हाथ हिलाती हुई ; वह रोती नहीं है, जिद्द नहीं करती, कुछ नहीं मांगती, बस हाथ पकड़े कुछ दूर तक आती है; फिर उसकी मां उसे वापस ले जाती हैं...और वह दौड़ कर उस बड़े पत्थर पर चढ़ जाती है, हाथ अपने आप हवा में हिलने लगते हैं;
नीचे आधे घंटे की उतरन के बाद सड़क मिलेगी, और साधन भी...जमरू का घर निकल गया...उसकी मुर्गियां भी, ये पहाड़ी उबड़ खाबड़ रास्ते, मंदिर, एक मिनट का रुकना...फिर पत्थरों की ढलान पर कदम....बुधिया के आडू के पेड़...बस झरना आ ही गया समझो...इसके आगे एक घुमाव और फिर चार फलांग पर सड़क...शरीर फिर मुड़ता है...निगाहें ऊपर जाती हैं..कितना नीचे उतर आये..वह रहा मंदिर का लाल झंडा...और उसके ऊपर बड़ा पेड़...और ...वो अब भी दीखती है...हाथ हिलाती हुई.


Friday, April 13, 2012

एक पानी का सच

खेतों के बगल से निकला चकरोट कुछ दूर जाकर पगडण्डी में तब्दील हो जाता है / बायें हाथ पर सरसों फूल रही है, बीच बीच में मटर के पौधे भी हैं जिनके छोटे छोटे पत्तों पर पड़ी ओस अब छिटकने लगी है / दायें हाथ पर है पुराना बेल का पेड़; निगाह बरबस ही नीचे ज़मीन पर चली जाती है कि कहीं कोई बेल पक कर गिरा हुआ न हो / ये मेरी बहुत पुरानी आदत है, बचपन में जब एक बेल नीचे गिरा मिलता था था तो ये किसी लाटरी से कम नहीं होता था ; और खासकर के तब, जब पेड़ किसी और का हो / प्रकृति से हमारा रिश्ता आश्चर्यजनक है; बरसों बाद भी जब हम उन पहचाने पेड़ों से रूबरू होते हैं तो अनायास ही वही हरकत कर बैठते हैं , पहले जैसी / बूढ़ा पेड़ मानो झुक कर देखता है और पहचानी आकृति देख कर कहता है; बहुत दिनों बाद आये हो; कैसे हो ! कैसे बताऊँ; अब कहाँ आना हो पाता है, और जाड़ों में तो लगभग न के बराबर /

खेतों के सामानांतर नाली है, सिंचाई के लिए और साथ ही साथ बांटती है खेतों को; यहाँ तक ही मेरा है और इसके आगे भगेलू अहिर का / पगडण्डी के दायीं ऑर बेल के पेड़ के पीछे एक ट्यूबेल है; इन तमाम खेतों की कृत्रिम सिंचाई का इकलौता साधन / यह एक निजी ट्यूबेल है और खेत सींचने के लिए इसके मालिक के पास बुकिंग करानी पड़ती है; और करना पड़ता है बिजली आने का इंतज़ार / जाड़ों में बिजली अक्सर रात में आती है, कोई सात आठ घंटों के लिए; इन सर्द रातों में खेत सींचना किसी पर्बत श्रृंखला को पार करने से कम बड़ी उपलब्धि नहीं है / पर यहाँ यह एक आम काम है, बिलकुल वैसे ही जैसे आप और हम रात में भोजन करके सो जाते हैं / नालियाँ कई जगह से कट जाती हैं और बार बार पानी के कटाव को रोकना पड़ता है, हाथों में फावड़ा आराम नहीं कर पाता, क्योंकि ये पानी सस्ता नहीं आता / ये पानी महज़ पानी नहीं होता, यह एक साल का दाना भी होता है; कभी गौर करेंगे तो पायेंगे कि यहाँ पानी, पानी को सींचता है /

कभी ये नालियाँ पक्की हुआ करती थीं, पर वह सरकारी काम था और साल भर के अन्दर ही उसमे लगी ईंटें करवटें लेने लगीं / गाँव वालों ने उन्हें तल्लीनता से जगाया और उठाकर अपने घर ले आये /  मिटटी के गारे में इनके छूहे बनाये और उनपर बैठाया सरपत से बना छप्पर ; सरपत एक तरह की धार वाली घास है, जो कुछ दो मीटर तक बढ़ती है / यदि ध्यान न दिया जाए तो ये हाथ में से रक्त का रंग दिखा देती हैं; कुछ डेढ़ किलोमीटर दूर सई नदी के दूसरी तरफ ये बेपनाह उगती हैं , और ऊँटों पर, साइकिलों पर और कभी कभी ट्रैक्टर में भर कर इनका पदापर्ण गाँव में होता है  / फिर बांस के ढांचे पर इन्हें फैलाया जाता है और अरहर के भिगोये हुए राठे से इन्हें बाँधा जाता है; तैयार हो जाने पर गाँव के पुरुष इकठ्ठा होकर इसे उठाकर छूहों पर रख देते हैं / इसके नीचे सपोर्ट के लिए कुछ बबूल या बेर के पेड़ के मोटे तने लगा दिए जाते हैं जिन्हें थून कहते हैं / नालियों की ईंटें इन्ही  छप्परों के छूहों में अब तसल्ली से सोती हैं /

नाली के दूसरी ओर अरहर में कुहासा जगह जगह पर पसर गया है; जहाँ भी पौधों के बीच सांस है, कुहासे ने डेरा डाल रखा है / अक्सर सोचता हूँ की इस कुहासे की उम्र धरती पर कितनी कम है, रात से सवेरे तलक; अभी सूर्य देवता की किरणें इन्हें पिघला देंगी पर ये जम कर कहीं फिर इकट्ठा होंगे और रात में धरती की छाती पर तैरेंगे / इन खेतों के पीछे छोटा सा आमों का बाग़ है और उनके बीच है बांसों की कोठ जहाँ से रात में सियार बोलते हैं /  और उसी के साथ लगता हुआ है कुआं, जिसके छूहे कभी उज्जवल हुआ करते थे पर अब काले पड़ गए हैं / अम्मा बताती हैं की ये कुआं मेरे दादाजी के जन्म के समय बना था और गाँव के दो लोगों की मौत इसे बनाने में हो गयी थी/ इसलिए गांववालों ने इसको न इस्तेमाल करने का निर्णय लिया था / फिर एक दिन गाँव के सब कुओं और नलकूपों का पानी बदल गया; अब किसी भी पानी से दाल न पकती थी, दाल अलग रह जाती और पानी अलग / तब इस कुँए की याद फिर आयी और अब एक बाल्टी पानी गाँव के हर घर में इस कुँए से जाता है / कुर्बानी आज नहीं तो कल काम आती ही है /  खेतों और बाग़ के साथ सन्नाटे में पड़े इस कुँए का सच तो मैं नहीं जानता, पर आज इसका पानी ही इसका सच है /

बाग़ में कुछ पुराने आम के पेड़ हैं; जाड़ों में ये बेकार पड़े रहते हैं पर गर्मियों के आगमन पर हर नज़र इन पर जाती है / इंसानी प्रकृति प्राकृतिक प्रकृति पर कितना निर्भर है; मौसमों के साथ हमारी सोच भी बदलती है और प्रवृत्ति भी / अभी कुछ ही देर में औरतें हाथों में खुरपी और झौआ (बांस या अरहर के डंठल कि बनी टोकरी) लेकर निकल आएँगी; इन खेतों के बीच मेड़ों पर जो हरी घास दीखती है, वो उनके खुरपी की काल बनेगी / पढ़ाई न करने पर अक्सर पिताजी मुझे कहते थे कि बड़े होकर घास छीलोगे; पर गाँव में इसका अपना महत्व है / जाड़ों में सारे खेत फसलों से लबालब होते हैं इसलिए  गोरु (मवेशी) दिन भर अपने खूंटे से बंधे रहते हैं ; उनके लिए कोई अलग से चारागाह नहीं है यहाँ / छीली हुई घास साफ़ होकर महीन टुकड़ों में कट जायेगी और पर साल के गेहूं के भूसे और आटे की चोकर में मिलाकर इसकी सानी परोस दी जायेगी मवेशियों को उनके हौदों में / जब अम्मा सानी बनाती हैं तो सारे जानवर एकटक उनको देखते रहते हैं; यदि कभी ज़रा भी देर हो जाती है तो रंभाते हैं; बुलाते हैं / एक परिवार में सब की भाषा एक सी नहीं होती, पर प्रेम, वात्सल्य और करुणा की कोई भाषा नहीं होती; ये तो बिलकुल पानी की तरह ही होते हैं, जब प्यास लगती है तो प्रकट हो जाते हैं /

सुबह की पहली किरण के साथ सारे महुए के पेड़ पीले पके महुओं का त्याग करना शुरू कर देते हैं; टप टप महुए टपकते रहते हैं धरती पर ज्यों ज्यों धूप तेज़ होती है /  अरसा हो गया था देखे हुए; धरती पर फैली पीले महुओं की चादर; कहीं पांव रखने की भी जगह नहीं; अदभुत है ये सब / सुबह परवान चढ़ती है और रात का अकड़ा जीवन अंगडाई लेता है; और तब दिन भागने लगता है / यह अलौकिक सौंदर्य है; ये खेत, टूटी नालियाँ, हरे मेड़, आम के पेड़, खूंटे से बंधे जानवर, घास छीलती स्त्रियाँ, खेत सींचता किसान, महुओं का धरती से स्पर्श, अकेला खड़ा कुआं और उसका पानी, सब सौंदर्य है / मेरा मानना है की सौंदर्य भी बिलकुल पानी की तरह है; इसका न कोई रंग है, न कोई आकार; ये तो बस जिन आँखों में बसता है उसी का रंग और आकार ले लेता है; क्या हम शहरी लोग इस पानी से दूर होते जा रहे हैं; क्या आज के शहरी बच्चे कभी इस पानी को समझ पायेंगे /  किताबों से हम कितना कुछ बता पायेंगे, अब भी जीवन में कितनी ही चीज़ें हैं जो न पढ़ाई जा सकती हैं, न सिखाई जा सकती हैं; महज़ महसूस की जा सकती हैं / मेरा भाग्य है कि मैं इस पानी के सच को कुछ हद तक समझ पाया हूँ; काश मैं इसे अपने चाहनेवालों को भी समझा पाता ///


Thursday, April 12, 2012

कभी क़दमों के तले दुनिया,
सर पे ताज़ोतख़्त होता है;
कभी सब कुछ लुट कर भी,
साँसों में चैन जब्त होता है,
कभी धमनियों में ही नहीं,
आँखों में भी रक्त होता है,
परीक्षा ही तब होती है,
जब दर्द सख्त होता है,
ज़रा सब्र करो मेरे दोस्त,
बेवफा तो बस वक़्त होता है;
क्यों फिर समुद्रों में कुछ कोलाहल सा है,
तेरी रवानगी है, या धरती काँपी है कहीं...
वक़्त भी कैसे अचानक बन गया इन्सां,
फेर दिया पानी वहां पर थी जहाँ ज़मीं...

Tuesday, April 10, 2012

अब निज़ी कुछ भी नहीं है

हिनहिनाती ये घटाएं,
बारिशों की वत्सलाएं,
होश को मय से मिलाती,
पूर्व की बहकी हवाएं;

लोचनों के रंग सारे,
घाट के टूटे किनारे,
पंख जैसे पवन में कुछ,
तैरते अरमां हमारे;

सूरतें गुमसुम सी सारी,
भीगी पलकों की सवारी,
तितलियों सी खोजती कुछ,
सीरतें मेरी तुम्हारी;

रास्तों का अनमनापन,
पक्षियों का वह लड़कपन,
रात में राहें दिखाता,
जुगनुओं का वह बड़प्पन;

पूस का सिकुड़ा हुआ तन,
बाग़ में उतरा हुआ घन,
मंदिरों की घंटियों सा,
स्पर्श में डूबा हुआ मन;

सांझ की बिखरी सी लाली,
तेरे हिस्से की वो थाली,
आसरों के बोझ से,
लटकी हुई महुए की डाली;

आसमां सी अब ज़मीं है,
बिन तेरे कुछ भी नहीं है,
दे दिया मैंने सभी कुछ,
अब निज़ी कुछ भी नहीं है

Sunday, April 8, 2012

इन दिनों में दिन हैं,
और उनमे भी दिन हैं,
सुबह, दोपहर, शाम, रात,
कुछ हैं साथ, कुछ बिन हैं,
यादें हैं, यादों में यादें हैं,
वादों में और वादे हैं,
हंसी में है मिश्रण,
ग़मों के रूप सादे हैं,
रुआंसी में नसीहत है,
मुस्कान, जैसे सीरत है,
ये बस हो जाता है यूँ ही,
नहीं नासाज़ नीयत है;
झगड़ों में, मनाने में,
या यूँ ही चिडचिड़ाने में,
कदम अपने नहीं थकते,
सुबह से लडखडाने में;
तुम्हारे साथ भी हैं,
और तुम्हारे बिन हैं,
इसी में तरह तरह के,
गुज़रते पलछिन हैं,
देखो एक दिन में समाये,
कैसे अनेकों दिन हैं;

Thursday, April 5, 2012

वाह री अधेड़ता तेरे जलवे,
रोज़ गिरते हैं, संभलते हैं,
कभी दिन में हालात बदल देते थे,
अब हालात में दिन बदलते हैं;

Wednesday, April 4, 2012

किसी के हंसने से, किसी के रोने से,
और किसी के जगने से,
तस्वीरों में आइने बदल गए,
किसी के आने से, किसी के जाने से,
और किसी के रुकने से,
जिंदगी के मायने बदल गए;

Sunday, April 1, 2012

यथार्थ और उसकी परछाई के बीच,
एक दुनिया और है,
सुनाई और दिखाई नहीं देती,
पर रहती है;
क्या कभी महसूस किया है ?

along with the reality and its shadow,
there exists another world,
can neither be heard nor seen,
but exists;
have you ever felt it ?

Thursday, March 29, 2012

धूप में कालीन सी फैली हरी घास,
और उस पर तालाब बनाता पानी,
चिड़ियों का फुदकना और कुछ चुनना,
और जब चाहे उड़ जाने की मनमानी,
जब उड़ने की आजादी हम में जिंदा है,
फिर मनमानी से क्यों ये मन शर्मिंदा है;

Monday, March 26, 2012

क्यों बदलना चाहते हो उसे,
अपनी तरह,
रहने क्यों नहीं देते उसे,
उसकी तरह,
उसमे उसको देखना चाहते हो,
या खुद को,
क्या प्यार उसको करते हो,
या अपने बुत को;

Saturday, March 24, 2012

बिखरा हुआ ठहराव

लगता है कितना कुछ बिखरा हुआ है...... एक गाँव है, पूर्वांचल की धरती पर, उजड़ते बागों और सिमटते खलिहानों के बीच ;  अधपक्के मकान के सामने से गुज़रती हुई पक्की सड़क और उस पर तन्द्रा भंग करती भागती खिसकती गाड़ियाँ; मेरे कुछ अपने रहते हैं वहां... ठिठुरती सर्द और लपलपाती लू के दरमियाँ वहां जीवन अब भी पलता है; अब मैं अक्सर वहां नहीं जा पाता, हाल खबर मिलती रहती है; वहां ज्यादा कुछ नहीं बदलता...सब कुछ अपनी गति से चलता रहता है...जैसे ठहरा हुआ हो.

गाँव से कुछ बीस कोस दूर एक शहर है; गंगा जमुनी भूगोल में सांस लेता हुआ...कहते है यहाँ बुद्धिजीवी रहते हैं, या शायद रहते थे क्योंकि अब दिखाई नहीं देते;  शहर की सीमा के छोर पर राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे ठहरा हुआ एक हवाई अड्डा, और उसी से सटी एक भूतपूर्व सैनिकों की कालोनी....यहाँ एक मकान है बड़ा सा, सीमेंट और लोहे से भरा जहाँ मेरे अपने बुढ़ापा काट रहे हैं, बुढापे के तमाम रोगों और कुछ किरायेदारों के साथ;  टेलीफोन में उनकी औलादें अक्सर दिखती हैं...कहीं दूर..थोड़ी चिंता, थोड़ी मजबूरियां , थोड़ी जिद्द , ढेरों मानताओं और आशंकाओं के मध्य जीवन यहाँ भी चलता है...गुमसुम सा ...बेनाम...जैसे अपनी पहचान अतीत में छोड़ आया हो..रोज़ यहाँ एक सा होता है..ठहरा हुआ.

इस देश के मध्य में एक स्टील का कारखाना है, और उसके इर्द गिर्द बसा हुआ है एक छोटा सा शहर; कोई रहता हैं वहां जिसकी भेजी हुई राखी और प्रार्थनाएं सदैव सुख फैलाती हैं... जिसने परिवर्तित कर दिया कठिनाई को सहूलियत में...वह उसका घर है जिसमे से बहे पसीने की महक नहीं जाती; पसीने का रंग अब चटक हो चला है, संवरते दिन रोज़ कुछ नया विचार लाते हैं, कुछ भविष्य जगमगाते हैं; यहाँ दिन बदलते रहते हैं...घर के जवान प्राणियों के आवागमन के बीच...ठहराव तो है पर रुका भी नहीं है.

कुछ समंदर पार वह गोरे लोगों की नगरी है...व्यवसाय और बेहतरी की आकांशा कितनो को ही वहां उड़ा ले गयी,  कुछ ऐसे भी हैं जिनके पाने की इच्छा खोने के डर पर भारी थी...साहसी और समझदारों की दुनिया है वो...जिन्हें कोई शक नहीं की वो क्या चाहते हैं और उसे कैसे पा सकते हैं; वहां भी एक बड़ा घर है, बेहतरीन और सुसज्जित...तस्वीरों में देखा हैं मैंने...वहां भी है मेरी दुनिया का एक कोना; छोटी छोटी परियां जो शायद रोज़ बढ़ती हैं, और वहां है एक एहसास का किस्सा...एक खून का हिस्सा;  निश्चित ही ठहरा हुआ होगा क्योंकि अक्सर दिखता नहीं है...पर एहसास कभी कम नहीं होता.

फिर यहाँ मैं हूँ , अपने दूसरे आधे के साथ और साथ में हमारी पूरी बड़ी होती दुनिया और किराए का मकान...गुज़रते दफ्तरों के दिन, चहलकदमी करती रातें, टूटते, बिखरते, संवरते, संजोते सपने और अपनों में ही मशगूल अपने... पेट्रोल और दूध की थैलियों के साथ आशाओं में पनपता जीवन, खोजने और पाने की कोशिशों में बहकते विचार, और अरसे बाद फिर से चलती एक कलम; और यहीं मेरे साथ ही रहते हैं एहसास जिनमे हैं शामिल मेरा गाँव, अपनों का बुढ़ापा, कारखाने का नगर और समंदर पार दूसरे ज़मीं की गहराइयाँ...इसमें ही शामिल हैं दोस्त जो छिटके हुए हैं असीमित धरती की सीमित दूरियों में, या फिर बंद रहते हैं कंप्यूटर की घड़ियों में...इसमें हैं सहपाठी, सहकर्मी, पड़ोसी, और कुछ विदेशी...इन्ही एहसासों में है कल का कलरव, और इसी में आज का सच है, इसी में कल की भागदौड़ है और इसी में में बंद एक जहाँ और है;  यह सब चलता है...रुका हुआ नहीं है, पर इसमें भी ठहराव है...दिखता नहीं है पर रहता है...मुस्कुराते हुए, मुहं बाए हुए, मैं इसी ठहराव में चलता हूँ, हँसता हूँ, रोता हूँ, बदलता हूँ, सिंचता हूँ, भीगता हूँ, सूखता हूँ...परिवर्तन होता रहता है पर मेरा बिखरा हुआ ठहराव साथ रहता है...वो मेरा अपना है.

Friday, March 23, 2012

जब करो इंतज़ार तब घटा नहीं छाती,
बाग़ से सूखी मिटटी की महक नहीं जाती,
इतराना चाहता नीरज, फूलों के समंदर में,
पर तितलियों की बोली समझ नहीं आती;

Thursday, March 22, 2012

तुम्हारी सरफरोशी हम क्यूँ नहीं समझते,
देशप्रेम की मदहोशी हम क्यों नहीं समझते;
अब तो मनाते हैं हम भ्रष्टाचार की दिवाली,
और चुपचाप हैं देखते कोयले की दलाली,
कैसे कैसे गद्दारों को अब हम हैं सहते,
तेरे देश की संपत्ति को जो विदेश में रखते,
शर्मसार हैं हम, देश के सच्चे बन नहीं पाए, 
तुम्हारा बलिदान सार्थक कर नहीं पाए,
सीनों पर खायी गोली हम क्यूँ नहीं समझते,
कुर्बानियों की होली हम क्यूँ नहीं समझते;

Wednesday, March 21, 2012

Passing by the stream on way home, heard frogs croaking. Sighted a little snake yesterday morning surfing over a stone. Flowers, the birds, lightness in the breeze....nature is out of its winter hibernation.
For last few months winter silence prevailed over these mountains. Within, what seems like few days, trees are chirping with flowers and leaves. Birds now fly wearing bright colors and the Sun has a loving warmth.
Seeing the season change.

By: Jyoti Patil

उस छोटी सी पानी की पहाड़ी धारा से गुज़रते वक़्त मेढकों का टर्राना अब सुनाई देने लगा है; रोज़ यहाँ से गुज़रती हूँ...कल सुबह तो एक छोटे से सांप को पत्थरों के ऊपर नर्म धूप सेंकते देखा था; ये फूल, चिड़ियाँ, हवा का हल्कापन...प्रकृति अपनी जाड़े की निद्रा से जाग चुकी है...
पिछले चंद महीनों में इन पर्वतों को सर्दियों के सन्नाटे ने जकड़ रखा था...अभी कुछ ही दिनों से पेड़ों में फूल पत्तियां चहचहाने लगी हैं...पक्षी अब उजले और चटक रंगों में उड़ने लगे हैं, सूरज के पास फिर से प्यारी गुनगुनी धूप है...
मौसम को करवट लेते देख रही हूँ...

( I tried to interpret )

Monday, March 19, 2012

तब क्या करोगे

एक समय,
जब आइनों में पुराना चेहरा,
नहीं देख पाओगे,
और लाख कोशिशों के बाद भी,
बालों की सफेदी नहीं रोक पाओगे;
जब  रोज़ दफ्तर से लौटते हुए,
शरीर, दिमाग की तरह ही थक जाएगा,
करवटों में आराम खोजोगे,
पर अगली सुबह भी दर्द नहीं जाएगा;
जब शाम की चाय के पहले ही,
बच्चे गणित के सवालों का हल पूंछेंगे,
कुछ बुद्धि बची होगी तो बताओगे,
वरना रोज़ खाली होता सर खुजाओगे;
जब टी. वी और अखबार की तरह ही,
रोज़ इसबगोल चाटोगे,
अपनी दिन पर दिन बढ़ती व्यथा,
किस प्रभु से बांटोगे;
जब भविष्य की चिंता में,
अपनी बचत का पासा फेंकोगे,
और सड़क पर रेंगती सुंदरियों की बजाय,
 इन्वेस्टमेंट का स्टेटस देखोगे;
जब हर दिन, और दिनों की तरह,
इन्ही उलझनों में निकल जाएगा,
तब कहाँ से स्फूर्ति लाओगे,
नया दिन कहाँ से आएगा;
इस सरपट भागते जीवन का,
ये भी एक अभिन्न  कोना है,
और कितना भी बीच में रहना चाहो,
कभी इस कोने में सब को होना है;
ज़रूरत यह है कि और रंगों कि तरह,
इस रंग से भी न इनकार करो,
बेशक बालों को रंगों कृत्रिम,
पर सफेदी को भी स्वीकार करो;
पुराने गाढे रंगों में,
थोड़ी सी सफेदी मिलाओ,
कुछ इधर से निकालो, कुछ उधर से डालो,
एक और नया रंग बनाओ;
बच्चों को स्कूल कि गणित न सही,
जीवन कि गणित पढ़ाओ,
इन्ही रास्तों पर रोज़ नए आयाम मिलेंगे,
थोड़ा सा हाथ बढाओ;

on railway budget 2012

हर साल चलाई जाती हैं नई गाड़ियाँ,
बदले जाते हैं टिकट बुकिंग के नियम,
पर कभी भी नहीं मिलता रिज़र्वेशन,
भारतीय रेल है या कागज़ का सनम;

Saturday, March 10, 2012

तेरी आवाज़ को वो सोचते हैं कैसे दबाएँ,
सियासत की नई कोई तरकीब लगायें,
नादान हैं ये हौसलों का इल्म नहीं इनको,
चलेंगे पैर इतने, पत्थरों में छाले पड़ जाएँ,


देख कर मंज़र ये ऐसा क्यों लगा,
मन भरा पर आँख बाकी रह गयी,
देर से पहुंचा सवेरा आज क्यों,
रात की कुछ बात बाकी रह गयी,

Tuesday, March 6, 2012

एक और रंग चढ़ने दो,
इस होली,
कुछ और बढ़े न बढ़े,
प्यास अपनी बढ़ने दो;
जैसे उम्मीदें रखती है,
नव ब्याही,
शब्दों में भरो,
नई स्याही;
तो लो भाई,
लिखावट को नई लिपि,
हमने भी दे दी,
अब न रहेगी बेबसी,
और न ही उदासी;
अब भौहें रात में,
नहीं हैं सोचती,
बीते हुए कल को आँखें,
नहीं हैं कोसती,

क्योंकि अब जिंदगी से है,
हमारी भी दोस्ती;

 

Saturday, March 3, 2012



जो 'कल' मैं अपना बेकार नहीं करता,
तो आज अपने आप से नहीं लड़ता,
सोचता हूँ जिंदगी में कुछ तो कर लूँ,
अब महज़ लिखने से मन नहीं भरता,

Friday, March 2, 2012


कुछ अनकहे मौसम की तरह अपनी रुसवाई है,
जिस डगर को जब न चाहा, तब वही पाई है,
देखते हैं कि जलेंगे या बरस कर घुल मिलेंगे,
फिर वही चिर परिचित धूप नज़र आई है,

Monday, February 27, 2012

फिर से भला होगा


कभी तो सिल्लियों पर बर्फ की, कोई गला होगा,
कभी तो जुगनुओं की आग में कोई जला होगा,
ये अक्सर सोचता हूँ कीमतें जीने की हैं कैसी,
कभी बिन आसरे के भी तले कोई पला होगा;

कहीं उल्लास है, कश्ती कहीं पर डगमगाती है,

कहीं की रात भी इस दिन से ज्यादा जगमगाती है,
ये कैसा है नियम कुदरत का तेरे ऐ मेरे माझी,
कहीं पर पौ फटी है पर कहीं पर दिन ढला होगा;

ये कैसा है लहू जो खुद को खुद से सींचता है,
ये कैसा जांत है जो सांस की जौ पीसता है,
तेरी चौखट पे अब सर झुकाने से भी क्या होगा,
तू है सब जानता, बस दे दुआ, फिर से भला होगा;

Saturday, February 25, 2012


जो पाया वह सब भूलकर, कितना कुछ किया, जताते हैं,
जब वक़्त नहीं हो साथ तब रिश्ते भी हिसाब बताते हैं;

Thursday, February 23, 2012


हमारा साथ चला पथ,
बिन मौसम बरसात में,
कुछ भीग गया है;
सड़क से लगा,
वह इमली का पेड़,
अकेला रहना सीख गया है;
जुदा कुछ भी न हुआ,
सब यही समझते हैं,
शहर कमाने मीत गया है;

Monday, February 20, 2012

जो झरोखे सोचते थे बंद हैं, वो ज़रा सा चरमरा कर हिल गए,
एक झीनी झिलमिलाती आंच में, ये अँधेरे रौशनी से मिल गए,
उम्र भर रह कर सरोवर, जो नहीं फूले थे नीरज,
एक झीनी रौशनी की ताप में, रेत में भी लहलहा कर खिल गए;





Thursday, February 16, 2012

कल तक सोचते थे,
बस वहाँ पहुँच जाएँ,
फिर चैन से ज़िन्दगी बिताएँ;
सोचते सोचते, प्रयासों के पश्चात,
बदल गए अपने हालात,
लगता था सब खिला खिला,
पर चैन अब भी नहीं मिला;
कोई कैसी कहानी लिखता है,
आगे अब और कुछ दिखता है,
फिर सोचते हैं, करते हैं प्रयास,
कभी न ख़त्म होती है आस,

इसीलिए बस मानव हैं हम,
कोई साधू संत नहीं हैं,
चलते रहते रुक कर, थक कर,
इस सफ़र का कोई अंत नहीं है;

Tuesday, February 14, 2012

ये दिन


अब तो दिनों की बौछार हो गयी,
कहाँ तो सुनते थे जन्मदिन या फिर बड़ा दिन,
अब तो हैं माँ, भाई, बहन, बाप का दिन,
बेटा, बेटी, प्रेयसी और यार का दिन,
हँसने हँसाने का दिन, पढ़ने पढ़ाने का दिन,
जवानी का दिन, तम्बाकू छुड़ाने का दिन,
बूढ़ों का दिन, डायबिटीस से लड़ने का दिन,
जनसँख्या का दिन, एड्स में न पड़ने का दिन,
विज्ञान का दिन, विकलांगों का दिन,
बदलते मौसम, जंगलों को संवारने का दिन,
कंजूस बनने का दिन, खर्च करने का दिन,
बहरों का दिन, हर्ज़ करने का दिन,
अधिकारों का दिन, खाद्य उत्पादन का दिन,
पर्यावरण का दिन, धरती सम्पादन का दिन, 
शहीदों का दिन, सैलानियों का दिन ,
रीति रिवाजों का दिन, किताबों का दिन,
महिलाओं का दिन, उनके गुलाबों का दिन,
कभी खुशियों का दिन, कभी हताशाओं का दिन,,
पहले क्यों नहीं था इन दशाओं का दिन,
क्या उन्ही पुराने दिनों पर नए दिन चढ़ गए,
या हमारे बड़े होने से हमारे दिन भी बढ़ गए,
क्या हम पहले इन भावनाओं के बिन थे,
नहीं, शायद इनसे भरे हमारे सब दिन थे,

हम कैसे 'दिन' में 'दिनों' को खोने लगे,
अब प्यार बाँटने के भी 'दिन' होने लगे;

Thursday, February 9, 2012

मेरी गर्मजोशी पर लिहाफों का बोझ भारी है,
फरवरी बीच में है पर शीतलहर ज़ारी है,
रोज़ कहता हूँ कल सुबह कर दूंगा पर,
आँख खुलती नहीं, कल की फिर बारी है;