Wednesday, October 19, 2022

 

कैकेयी होना क्या है,
किसी राजा को बस में करना,
किसी वायदे का फायदा उठाना,
या मातृत्व के नाते,
अपने पुत्र को अधिकार दिलाना;

क्या कैकेयी होना,
दर्शाता है लोभ, मोह, माया,
या कोई पुराना किस्सा न बिसराना,
या फिर करते रहना प्रतीक्षा,
और समय आने पर उसको भुनाना;

या फिर यह सब कुछ भी नहीं,
बस नियम है इस सृष्टि का,
कि एक परिस्थिति बनाना,
अच्छाई को बुराई पर जिताना,
कैकेयी तो है सिर्फ बहाना।

 

Monday, October 10, 2022

 

ये नहीं उन्माद उसका,
घन ने जो ढँक लिया माँद,
दिख न पाया था ज़मीं से,
वह शरद पूनम का चाँद;

और हम बस यही समझे,
चाँद निष्ठुर हो गया है,
थी सुधा की आस पर अब,
भाग्य जैसे सो गया है;

सोच अपनी संकुचित है,
दृष्टि सीमित हो गयी है,
चीर जो देती थी घन को,
घन में जैसे खो गयी है;

अब नहीं है दवा बाकी,
क्षीण जो करती नशा को,
अब नहीं वह सूझ बाकी,
जो समझ पाती दशा को;

जब नहीं इच्छित हैं पाते,
भाग्य तब समझें गरल है,
ध्येय लेकिन जीवनी का,
अब भी समुचित है,सरल है;


 

Sunday, October 9, 2022

 

मन में कपट न मुख पर कोई निन्दा रखना,

मानव हो तो मानवता कुछ जिन्दा रखना,

माना मुमकिन नहीं देव बन रह पाना पर,
 
कुछ रावण ही अन्दर का शर्मिंदा रखना ।

 

Thursday, September 29, 2022

 

जब समझ का फेर है औ जब कथानक भिन्न है,
तब किसी भी प्रतिक्रिया से मन भला क्यों खिन्न है,
भिन्न है शैली कथन की, अभिव्यंजना भी भिन्न है,
अर्थ में समता अतः एक प्रश्नवाचक चिन्ह है ;

 

Friday, July 1, 2022

 

 

बादलों ने यूँ है घेरा,
सब तरफ छाया अँधेरा,
बिजलियाँ भी कड़कड़ा कर,
करती हैं रह रह के फेरा;
आज ये मौसम अड़ा है,
बन के इक तूफ़ां खड़ा है,
पर इसी ने है बताया,
वक़्त का पहिया बड़ा है;

हमने कब घड़ियाँ बुनी थी,
गड़गड़ाहट ही सुनी थी,
चल सकें बस इसलिए ही,
धूप थोड़ी सी चुनी थी;

आँधियां भी आँख मींचे,
चाहे जितना ज़ोर खींचे,
चल रहे हैं हम डगर पर,
मुट्ठियों में धूप भींचे ;

 

Thursday, April 28, 2022

 

रास्तों पर चलते हुए कैसे वहम ले लिए,
जो अपने थे ही नहीं, वो भी ग़म ले लिए ;

आज वो चराग़ भी बहुत दूर हमसे रौशन है,
जिसकी रौशनी के लिए, हमने तम ले लिए;

बँट रहे थे पुरज़े बदन, सूखे से हाशिये पर,
बारी आयी नयनों की तो, हमने नम ले लिए;

मानते थे,वक़्त के साथ हर ज़ख्म भर जाएगा ,
वाह ज़िंदगी हमने भी, ये कैसे भरम ले लिए;

उन चुनिंदा पलों को कब तक सहेज पाओगे,
लेना था जिसे ज़्यादा, उसको ही कम ले लिए;



 

Friday, April 8, 2022

 


जीत के द्वार हम तो पहुँच न सके,
पाँव के किन्तु छाले कई दिन जले ; 

ऋतु भी प्रतिकूल थी, वेग लहरों का था,
पर थी हमने भी हिम्मत जुटाई हुई, 
साथ अपने भी यूँ तो, कई लोग थे,
सब पर हमने थी दौलत लुटाई हुई,

हमने पतवार उनके ही हाथों में दी,
जो कि चालाक थे, पर थे लगते भले;
जीत के द्वार....... 

राह बढ़ती गयी साथ बढ़ता गया,
हम भी खुश थे कि इक कारवाँ चल पड़ा,
जब भी आएगी अड़चन अकेले न हों,
अचरज दुनिया का ये आठवाँ चल पड़ा,   

साथ होंगे सदा, आसरा जिनका था, 
पीछे देखा तो सब जन गए थे चले; 
जीत के द्वार.......

गिरते पड़ते अकेले में सीखा है ये,
वक़्त उग्र है कभी और कभी नम्र है,
भूलने का भी कितना ही कर लो जतन,
होती लम्बी बहुत ग्लानि की उम्र है ,  

मौन में भी सदा, मन में हँसते रहे, 
रोते भी हम कहाँ, किससे मिल कर गले;
जीत के द्वार.......

हौसला, इतनी कोशिश है,बाकी रहे,
राह पूरी, अकेले हो चलने का दम,
चाँद अपना भी हो, थोड़ा धुंधला सही , 
हम बचें चाहे पूरे या पूरे से कम,

अब तो इतनी सी इच्छा है नीरज रही,
चाँद पहले उगे, तब ये सूरज ढले;

जीत के द्वार हम तो पहुँच न सके,
पाँव के किन्तु छाले कई दिन जले ; 

Monday, April 4, 2022

 


सुनी हैं कितनी ही दास्तान,
कहीं राहें थी अनजान,
कहीं पीड़ा में ईमान,
नहीं मिला कोई हासिल,
न ही कोई अंजाम,
रह गयी मोहब्बत नाकाम;

पर मोहब्बत का,
किसी अंजाम तक न पहुँच पाना,
और सब छूट कर भी,
अंदर कहीं रह जाना,
असल में होता है,
उसका मुकम्मल हो जाना। 

 

जब होश में हैं दोनों तो फिर बहका क्या है,
ख़ामोशी के आलम में भला महका क्या है,
ये दुनिया घूम करअब हमको यकीं आता है,
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है;

Tuesday, March 22, 2022

 

बढ़ता हुआ भाव, घटता हुआ चाव,
न रहेगा ही ताव, न कोई हरा घाव, 
जब तक खुलेगी आँख, दो ही बचेंगे,
एक बिलखती नदी, एक टूटी हुई नाव

 

Monday, March 21, 2022

 

यूँ अनगिनत
विचारों की अमिता,
या शब्दों को
सजाने की रमिता,
साहित्य के
गोद की बबिता,
या उकेरती
समाज की पतिता,
दीवार के
उस पार की हरिता,
या कुछ अनछुए
भावों की रचिता,
मात्र कागज़ पर
भावों की सरिता,
या तिमिर में
जुगनू की सविता,
आखिर क्या होती है कविता?

 

Thursday, March 17, 2022

 

कोई खूब गुलाल अबीर बना, कोई खाली बर्तन रुसवाई,
कोई पिचकारी है पीतल की, कोई सरकारी नल दुखदायी,
हमने स्तर के अंतर से, नायाब से तोहफे थोपे हैं,
इन त्योहारों की जकड़न में, कोई रंग बना कोई परछाई।

 

Wednesday, March 9, 2022

 

जब खाली हो जाए तुम्हारा तरकश
तीरों से,
फिर भी घाव न कर पाए हों
मन मुताबिक़,
तब सोचना कि गलत था क्या निशाना,
या जादू था किसी के मरहम का;

जब व्यर्थ लगे इन राहों की लकीरें,
और अर्थ न मिल पाए
 सृजन का,
तब तुम शब्द बन जाना,
और यूँ ही
 हवा में लहराना,

हवा में लहराते विभिन्न शब्द,
मिलकर कभी
वाक्य बन जाएंगे,
राहों की गणित शायद
फिर भी न हो मुमकिन,
पर कुछ शब्दों के अर्थ निकल आएंगे ;

 

 

चर्चा होगी जब भाषा की, तब ये ज़िक्र में आएंगे,
बात करेंगे तरकश की, या मरहम कभी लगाएंगे,
नहीं कमाया ऐसा कुछ भी, जिससे कोई याद करे, 
मिट जाएंगे हम खुद भी, ये शब्द मगर रह जाएंगे। 

 

Tuesday, March 8, 2022

 

कुछ शब्द कभी झकझोर गए,
कुछ रस खट्टा सा निचोड़ गए,
कुछ शब्द रह गए होंठों तक,
कुछ जुड़ते जुड़ते तोड़ गए।

कुछ शब्द बने हमसाया से,
कुछ वक़्त पर हुए ज़ाया से,
कुछ शब्द जो निकले तरकश से,
कुछ अपने हुए पराया से।

कुछ शब्द भले ही कच्चे हैं,
कुछ लेकिन अब भी सच्चे हैं,
कुछ खुद अर्थों में सीमित हैं,
कुछ शब्द मूक ही अच्छे हैं।

 

Monday, March 7, 2022

 

 

कभी भरी आँखें,
कभी पेट खाली,
दिलो दिमाग पर,
बोझा भारी,
लंबा रास्ता,
सब्र की सवारी,
पलकों की हया,
आँचल की किनारी,
ख्वाबों में जुगनू,
उम्मीदें ढेर सारी,
....... नारी !!

Monday, February 28, 2022


कहीं इत्र, पान, चन्दन है,
मादक है खुशबु भीनी,
कहीं बेल पत्र में चेहरा,
कहीं भांग में है शौकीनी,

कहीं दुग्ध गाय की धारा,
केसर है, शहद, शमी है,
कहीं फूल मदार विवश है,
बेबस सी कहीं नमी है,

कोई याद करे उपवासों को,
कोई बिसर गया है सावन,
कोई रहा धतूरा जीवन भर,
कोई गंगाजल सा पावन,

रुँधने पर भी जो सरल रहे,
वह कंठ कहाँ हम पाते,
जो पी ले गरल आज मन का,
वह शिव हम कहाँ से लाते।

 

Thursday, February 17, 2022


 


सरकता हुआ तम पर भीतर से कुछ नम,
हल्की सी सनक पर उन्माद से कुछ कम,
कहाँ जानते थे, चहलकदमी में साथ होंगे,
यह सुबह का पूरा चाँद और थोड़े से हम।