Tuesday, June 30, 2020

उम्र की वीरानियों से,
सीख ये हमको मिली थी,
जो दिखती सच की गोलियां थी,
झूठ में पोसी पली थी,
तब हमारी चाहतें भी,
वक़्त से काफी बड़ी थी,
आज लगता झूठ था वो,
खुद में ही बातें बनाना,
झूठ था वो पाठ जिसमें,
राज़ था पैसे कमाना;

उँगलियों पर जो कसे थे,
सोने चांदी के कवच में,
लाल पीले रत्न जैसे,
खर्च जिसमें हुए पैसे,
आज भी बेसुध पड़े हैं,
जो लड़े हम खुद लड़े हैं,
आज लगता झूठ था वो,
रत्न से किस्मत बनाना,
झूठ था वो ज्योतिषी का,
हाथ पर रेखा गिनानां;

अब भी दरिया के किनारे,
लोग दिखते कितने सारे,
पर कहाँ वो दीखते हैं,
जो थे तिनकों के सहारे,
पाँव हमने भी धरे थे,
​पर लहर की गति से हारे,​
आज लगता झूठ था वो,
​​रेत पर खींची बहारें,
झूठ था मौज़ूदगी का,
वादा जब भी हम पुकारें;

ये मनुज की खासियत है,
जब भी पड़ता है अकेला,
जब कोई दूजा न दिखता,
ख़त्म हो जाता है मेला,
तब वो पानी खींचता है,
खुद ही खुद को सींचता है,
आज लगता झूठ था वो,
​​आसरे में कैद होना,
झूठ था सपनों को अपने,
हौसलों से न सँजोना;

Monday, June 29, 2020

न ही देर तक साथ चलने की अपेक्षा थी,
न ही दूसरी राह मुड़ने का वियोग था,
हमारा राही होना तो पहले से तय था,
तुम्हारा राह में होना एक संयोग था।

Friday, June 26, 2020

देखा होगा अक्सर,
राह चलती गाय को,
चबाते पॉलिथीन,
या फिर यूरिआ के अल्सर,
पेट में पाले हुए,
खेतों के चेहरे ग़मगीन;

देखा होगा अक्सर,
लोकल ट्रेनों में,
खचाखच भरे लोग,
या बच्चों से भरे घर,
न ही शिक्षा का योग,
न भोजन का संयोग,
फिर बड़ों का अनूठा पराक्रम,
और बुढ़ापे का वृद्धाआश्रम;

देखा होगा और भी बहुत कुछ,
रोज़ घटते बाग़ बाग़ान,
लुप्त होते,
जंगलों के परिधान,
सड़कों पर कूड़े का अम्बार,
बजबजाती नालियाँ,
मलेरिया डेंगू के सामान,

देखा ही होगा,
घटती और बेमौसम बारिशें,
फिर भी जगह जगह बाढ़,
हवा में घुलती कालिख,
फेफड़ों पर बढ़ता भार,
बचपन की आँखों पर चश्मे,
जवानी में मधुमेह की मार,
एंटीबायोटिक का कोर्स,
उच्च रक्तचाप का संसार,

और साथ ही देखा होगा,
ऊँची अट्टालिकायें,
गगनचुम्बी मूर्तियां,
क्रूज की नौकाएँ,
देखी ही होगी गति,
और छोटी होती दूरियां,
तेज़ भागता समय,
और उसको पकड़ने की मज़बूरियां,
देखा होगा मोबाइल,
और गायब होती लोरियाँ;

हमने अपने लिए,
कितना साज़ो सामान जुटाया है,
पर भूल जाते हैं हम,
कि कितना कुछ लुटाया है,
कल हम और जुटायेंगे,
और अधिक डेवलप्ड कहलायेंगे,
यूँ तो चढ़ते रहते हैं हम,
कभी न ख़त्म होने वाली,
सीढ़ियों पर,
पर छोड़ जाते हैं,
अपनी लापरवाहियों के निशां,
आने वाली पीढ़ियों पर।
इस कोरोना ने हम सब को,
कुछ यूँ दिया है झटका,
 
जैसे भरते रहे ऊपर से,
पर नीचे फूटा हो मटका,

जैसे गिरा हो आसमान से,
पर रहे ख़जूर पर अटका,

जैसे लटकाई हो नीम्बू मिर्च,
पर फेल हो गया हो टोटका, 

जैसे चढ़ाया हो मास्क,
और थूक दिया हो गुटखा,

Wednesday, June 24, 2020

एक दिन खिलौना टूट गया,
और फिर जुड़ा नहीं,
बच्चा रोया घंटा भर,
फिर भूल गया,
रोने में नहीं था कोई सम्मान,
भला कहीं खिलौने में भी ,
होती है जान !

एक दिन किसी अपने की,
टूट गयी सांसें,
फिर न लौटीं,
हमने भी इंतज़ार नहीं किया,
पता था की टूटी सांसें,
फिर जुड़ती नहीं,
बस दिल में बसा ली यादें,
जीवन भर के लिए !

​एक दिन टूट गया दिल,
और लगा की फिर जुड़ेगा नहीं,
​पर ऐसा हुआ नहीं,
वक़्त से साथ पता लगा,
दिल की तो फितरत है,
जुड़ना टूटना और फिर जुड़ना !

हम भूल जाते हैं कि,
मायूसी की उमर,
अधिक से अधिक
एक रात होती है,
उसके बाद की ग्लानि,
हमारे अपने हौसले पर,
आघात होती है।

Saturday, June 20, 2020

अबकी,
जो गए तुम,
तो आये हो,
फूलों से लदे,
बड़की ट्रक में,
कितनी बड़ी फोटू लगी है,
तुम्हारी हर जगह,
बीसन गांव के लोग,
सड़क पर जमा हैं,
बड़ी जयकार हुई है,
तोहरे नाम की,
बाबू न कहते थे,
बड़े गाजा बाजा के साथ,
आएगा एक दिन,
तिलक बेटवा का,
पर अबकी माई,
शरबत न घोली,
न ही माठा गुड़ लाई,
बस बैठी रही दुआरे,
दूसरी औरतन के बीच,
अबकी बाबू भी न बोले कुछ,
​उनको झण्डा मिला है,
जन गन मन वाला,​
बड़के ओसारे में,
खूँटी के ऊपर,
है फोटू तुम्हारी,
और खूँटी पर,
टांग दिया है हैंगर में,
वो चितकबरी वर्दी,
जो थी,
तुम्हारी दूसरी चमड़ी।  

Friday, June 19, 2020

जब से डर था कि मौसम रहे न रहे,
तब से बूंदों में बदरी बहक आयी है।
रात भर आँधियों में छुपी सिसकियाँ,
दिन में पलकों पे सिहरन सिमट आयी है।
प्रीत के पाँव में जब से छाले पड़े,
तब से राहों की किस्मत उभर आयी है।

एक उम्मीद में है ये कैसा असर,
घर से लेने उसे पालकी आयी है।

धूप में तर बतर जो थे अरमां हुए,
चांदनी में फ़िज़ां देखो छत आयी है।
उसके रहने का ऐसा असर कुछ हुआ,
फिर से चेहरे पे रंगत निखर आयी है।

Wednesday, June 17, 2020

हमारे मूंह का निवाला ही तुम्हारे शाम की बोटी है,
ये जो परदों पर कहते हो तुम, हर एक बात खोटी है,
कोई तो बड़ा डर तुम्हें ज़रूर रहा होगा वरना,
हमारी तो हसरत भी तुम्हारी कामयाबी से छोटी है।

Saturday, June 13, 2020

पिछले दो दिन दर्द में गुज़रे ; दर्द जिसका कोई एक रूप नहीं होता।  जिसे कभी कभी सहन करते हुए हम पहन भी लेते हैं और फिर जल्दी उतार नहीं पाते।  लगातार दो दिन उमस से हावी रहा और शाम को आंधी बारिश की सौगात मिली; फिर साथ ही मिली बिजली की कटौती जो देर रात तक न जुड़ी।  बचपन में गांव का घर कच्चा था और रोज़ रात दुआरे खटिया डाल कर उस पर कथरी बिछा देते थे।  तारों को निहारते कहीं से नींद चुपके से आ जाती थी ; भोर हमेशा एक सौगात होती थी जो हम आम के बागों में खर्च कर देते थे। आज बिजली न होना भी दर्द हो गया है ; हालाँकि बाकी मिले दर्द से ये सब से कम था।

उमस के साथ पुरानी स्लिप डिस्क नींद से जग गयी और आज तीसरे दिन भी नहीं सोयी; ये जब भी जगती है, हफ्ते भर के पहले नहीं सोती।
तब बैठना भी किसी कठिन व्यायाम जैसा ही लगता है, एक मिनट से अधिक नहीं हो पाता। अधलेटा होकर लैपटॉप चलाने में महारत हासिल हो गयी है पिछले कुछ सालों में इसकी बदौलत। इसका दर्द एक सिहरन सी दौड़ा देता है ; जैसे कोई बिजली सी कौंधी हो अचानक पीठ से। कभी सोचा न था कि ये दर्द सच्चा साथी बन जाएगा।

एक दर्द आशंका से जन्मता है ; इस दर्द में मज़बूरी भी होती है और डर भी। ये कोरोना का भय नहीं था; किसी बेहद अपने के दिल के साथ दिल्लगी की चिकत्सीय प्रक्रिया थी। इस दर्द में आशा भी थी और आशंका भी।  ये रहेगी अभी कुछ दिन और आई सी यू के अंदर और बाहर; जीवन जीवित भी तब ही होता है जब वेंटिलेटर का साथ छोड़ देता है।

फिर एक दर्द और है जो है भी और नहीं भी।  जिस पर ऊँगली नहीं रख पाते; पर जिसे हम अनजाने में मोल ले लेते हैं किसी बिसाती से जो इसे बेचना नहीं चाहता। ये अजीब है, क्यूंकि इसे आप पर थोपा नहीं गया ; ये अजीब है क्यूंकि मिश्रित है।  ये हमें ऑक्सीजन नहीं देता पर जीने देता है।  ये तब होता है जब हम किसी को न समझ पाते हैं न ही समझा पाते हैं।  घर के अंदर भी और घर के बाहर भी; और खासकर के तब जब उम्मीद और हकीकत का समन्वय नहीं हो पाता।  जब हम जीवन से वो मांगने लगते हैं जो बिना आधे जीवन को नष्ट किये बगैर संभव नहीं होता।

पर ये सब दर्द मेरे अपने हैं ;

Friday, June 12, 2020

जो साथ बिताये लम्हे हैं, वो सब तो याद रहेंगे ही,
जो साथ बिताया दुरी से, तुम उसको नहीं भुला देना।

वो बातें जो गुपचुप से की, उनकी ठंडी तासीर रही,
वो जम जायेंगी चुप्पी में, उन्हें थोड़ा हिलाडुला देना।

जो धुएँ में लिपटे लम्हे थे, जो कांच सरीखा शामें थी,
वो अलग अलग हो जायेंगे, उनको भी मिलाजुला देना।

अंदेशा कुछ पहले से था, जो राज़ बताये थे तुमने,
मैंने भी ठान लिया था तब, बस सुनकर उन्हें सुला देना।

वो साथ ठिठोली बातों का, वो मस्त ठहाका जीवन का,
मैं साथी मुक्त हँसी का हूँ, तुम मुझको नहीं रुला देना।

Thursday, June 11, 2020

एक दिवस,
जब गल जाए साबुन सारा,
और उड़ जाए सेनिटाइज़र की अलकोहल,
जब बंद हो जाएँ मास्क के छिद्र,
और दो गज दो कोस लम्बा हो जाये,

एक दिवस,
जब रेल  की जगह ,
बैलगाड़ियाँ हों पटरी पर,
जब माँग सूनी हो सड़क की,
और हवाई यात्रा हो बस परिंदों की,

एक दिवस,
जब टूटी पड़ी हों,
ऑफिस की कुर्सियां,
और छत्तों की तरह लटके हों,
चमगादड़ ऊँची ऊँची बिल्डिंग में,

एक दिवस,
जब जंग लग गया हो,
नाल में बन्दूक की,
और तोप टैंकों पर खेलते हों,
बन्दर उछल उछल कर,

उस दिवस भी,
बहेगी कविता निश्छल,
और हम रहेंगे दूर उतना ही,
जितना रहते हैं इन दिनों,
उस दिवस भी रहेंगे हम अनुमान ही 


Saturday, June 6, 2020

बीते कुछ दिनों से एक अजीब सी आशंका ने कहीं कोने में अपनी एक चारपाई डाल दी है। अजीब इसलिए क्यूंकि ये भयभीत नहीं करती किन्तु किसी अनहोनी की एक दरी बिछा देती है उस चारपाई पर। ये ज़िंदगी ख़त्म करने का अंदेशा नहीं देती पर ज़िंदगी बढ़ने में कुछ रोड़े अटका देती है। रोज़ रात ये चारपाई मेरे करीब खिसकती रहती है, और मैं रोज़ ज़मीन पर अपना बिछौना थोड़ा और दूर कर लेता हूँ। भय से नहीं, आशंका से।  यूँ भी हम स्वप्न में अनहोनी के लिए कहाँ तैयार रहते हैं, और हक़ीक़त में तो बिलकुल नहीं। पर बीते कुछ दिनों से मैं ज़मीन पर ही सोता हूँ। 

सोमवार से ऑफिस खुल जाएगा शायद और उसके साथ ही समाप्त हो जायेगी दो महीने की मशक्कत जो  घर बैठ कर की......... उस ऑफिस के लिए जो एक हफ्ते में हमें रिप्लेस कर देगा यदि कल हम न रहे। सब निरर्थक जान पड़ता है, कहाँ जा रहे हैं, क्यूँ जा रहे हैं , जा  भी रहे हैं या वहीँ खड़े हैं....... कितने ही प्रश्न रोज़ दफ़्न हो जाते हैं और मिट्टी गीली रहती है अगले दिन भी। कोई तो है जो इसे सूखने नहीं देता.......पर कौन....... अपना बिछौना थोड़ा और खिसका लेता हूँ।

Friday, June 5, 2020

मंज़र हसीन था पर देर तक रहा नहीं,
एक सच वो भी है जो हमने कहा नहीं,
बात आंकने की वजह ज़रूर होगी पर,
एक सच वो भी है जो तुमने सुना नहीं;

Tuesday, June 2, 2020

वो जो तुम कहते थे कि ये वक़्त न चुकेगा,
और कुछ भी हो मौसम पर प्रेम न झुकेगा,
वो सब अब थोड़ा खोखला लगता है मगर,
मेरा इंतज़ार भी तुम्हारे चलने तक रुकेगा।

Monday, June 1, 2020

एक दिन जब अड़ जाए ऊष्मा,
और शीत ढूंढ़ती रहे ठिकाना,
एक दिन जब पिघल जाएँ मेघ,
पर तर न हो पाए वसुंधरा,
एक दिन जब न उठ पाएं हम,
और सुबह सुबकी हुई आये,
एक दिन जब तुम पीछे देखो,
और पाओ पैरों के निशां,
उस दिन, केवल उस दिन,
याद करना वो एक मील,
साथ चला था जिसे,
उन बोझिल दिनों में,
उस दिन, केवल उस दिन,
जगा देना हमें,
चंद लम्हों के लिए।