जिस तरफ चूल्हा है, उस तरफ की मिटटी की दीवार काली पड़ गयी है। चूल्हे के थोड़ा ऊपर लगभग छह फीट पर दीवार को काट कर एक जँगला बनाया है और उसमें बांस की छड़ लगा दी है। पर इतना धुआँ इस जँगले से नहीं निकल पाता और नतीज़न दीवार दिन पर दिन और करिया होती जाती है। यूँ भी अमूमन ऐसे कच्चे घरों में धुआँ ही ज्यादा होता है ; आग तो बस पेट तक सीमित रहती है।
इस बड़े से हालनुमा मिटटी की कोठरी में कोई किवाड़ न था; दो खूंटी पर अम्मा की पुरानी धोती टांग दी गयी है जो दरवाज़ा भी है और शर्म भी। कोठरी के दूसरी तरफ दो बड़े बड़े मिटटी के घड़े रखे हैं जिन्हे प्रतीक्षा है कि कभी ये फिर भरे जाएंगे। बाबू के जाने से तीन बरस पहले बहुत धान हुआ था ठाकुर साहेब के खेत में। तब बाबू को इतना धान मिला था मजूरी में कि दोनों घड़ा भर गया था। फिर लगातार सूखा रहा ; ज़मीन में पहले पपड़ी पड़ी फिर दरार पड़ गयी। खेत खलिहान सब सूखे रहे। बहुत दिनों तक बाबू इधर उधर काम खोजते रहे; जब सड़क का काम चल रहा था तो बाबू तीन कोस जाते थे। उस दिन बड़ा तेज़ सूरज था और बाबू गमछा में थोड़ी उबली मटर गठिया कर निकल गए थे। छेदी चाचा और तीन लोग फिर उन्हें खटिया पर लादकर लाये थे; अम्मा दहाड़ मार मार कर रोई थी, भुरिया तब बहुत छोटी थी। बाबू मर गए थे। कोठरी की दीवार पर लगे चटके शीशे के बगल में एक अंगूठे जितनी बड़ी मटमैली फोटू चिपकी हुई है बाबू की। कभी कभी अम्मा अपनी धोती के आँचल से उसे साफ़ करती हैं; उसने देखा है। गरीबी की जात नहीं होती पर उसकी फोटू भी मटमैली ही निकलती है।
चूल्हे के आगे ढेर सारी जलाऊ लकड़ी रखी है जिसे अम्मा और भुरिया सारी दुपहरी बिन कर लाये थे। अभी सूरज काफी ऊपर ही है पर चूल्हा जल गया है। आज अम्मा के चेहरे पर संतोष का भाव है ; बगल में मचिया पर भुरिया बैठी है; अम्मा जो भी कहती हैं वह भाग भाग कर लाती है। आज पेट भर के चावल दाल मिलेगा, और आलू का चोखा भी। आज कल्लू सात दिन बाद घर लौटा है ; शहर से कमाकर लाया है। एक हज़ार रूपया कमाई और एक धोती अम्मा को दिया, भुरिया को मिली कान की बाली और फराक; आज बहुत दिन बाद कुछ दिनों की खुशहाली लौटी है। अम्मा का कल्लू अब बड़ा हो गया है।
कोठरी के बाहर दुआरे पर मूँज की खाट पर कल्लू लेटा हुआ सोच रहा है ; अपनी उधड़ी हुई पैंट की जेब से पैसे निकाल कर फिर से गिनता है। सब मिलाकर दो हज़ार तीन सौ तीस रुपये बचे हैं। दिमाग में युद्ध चल रहा है ; ये उसकी पहली कमाई है। कल सुबह ही तीस की ताड़ी पियेगा; फिर दिन भर सोयेगा। दो हफ्ता तो आराम से निकल ही जाएगा ; इसके बाद शहर के दूसरे इलाके में जाएगा। पिछली जगह पर ज़रूर ठेकेदार को शक हो गया होगा। ऐसे तो कई लोग काम से भाग जाते हैं पर वह तो ठेकेदार का पांच हज़ार चुराकर भागा था। सत्तर की दिहाड़ी से काम करता तो इतने पैसे कमाने में अढ़ाई महीना लग जाता। गरीबी और मज़बूरी का कोई संस्कार नहीं होता; कोई सभ्यता भी नहीं ; होता है तो बस कुछ तस्वीरें जो सूखी आँखों में रोज़ हंसती हैं। खटिया पर लदा बाबू का शरीर, लकड़ी बीनती नन्ही सी भुरिया , जंगल से महुआ चुन कर लाती और रोज़ धुआँ पकाती अम्मा, सब हँसता है आँखों में। दिहाड़ी से गरीबी नहीं जाती; गरीबी जाती है लड़ने से। कल्लू किसी का बुरा नहीं चाहता, किसी को मारना भी नहीं; पर ज़िंदा रहना चाहता है, अम्मा और भुरिया का पेट भरना चाहता है। ईमानदारी उसे एक समय का चावल भी तभी दे सकती है जब काम मिले।
उसने सुना है कई लोगों से लाल सलाम के बारे में।