Thursday, March 29, 2012

धूप में कालीन सी फैली हरी घास,
और उस पर तालाब बनाता पानी,
चिड़ियों का फुदकना और कुछ चुनना,
और जब चाहे उड़ जाने की मनमानी,
जब उड़ने की आजादी हम में जिंदा है,
फिर मनमानी से क्यों ये मन शर्मिंदा है;

Monday, March 26, 2012

क्यों बदलना चाहते हो उसे,
अपनी तरह,
रहने क्यों नहीं देते उसे,
उसकी तरह,
उसमे उसको देखना चाहते हो,
या खुद को,
क्या प्यार उसको करते हो,
या अपने बुत को;

Saturday, March 24, 2012

बिखरा हुआ ठहराव

लगता है कितना कुछ बिखरा हुआ है...... एक गाँव है, पूर्वांचल की धरती पर, उजड़ते बागों और सिमटते खलिहानों के बीच ;  अधपक्के मकान के सामने से गुज़रती हुई पक्की सड़क और उस पर तन्द्रा भंग करती भागती खिसकती गाड़ियाँ; मेरे कुछ अपने रहते हैं वहां... ठिठुरती सर्द और लपलपाती लू के दरमियाँ वहां जीवन अब भी पलता है; अब मैं अक्सर वहां नहीं जा पाता, हाल खबर मिलती रहती है; वहां ज्यादा कुछ नहीं बदलता...सब कुछ अपनी गति से चलता रहता है...जैसे ठहरा हुआ हो.

गाँव से कुछ बीस कोस दूर एक शहर है; गंगा जमुनी भूगोल में सांस लेता हुआ...कहते है यहाँ बुद्धिजीवी रहते हैं, या शायद रहते थे क्योंकि अब दिखाई नहीं देते;  शहर की सीमा के छोर पर राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे ठहरा हुआ एक हवाई अड्डा, और उसी से सटी एक भूतपूर्व सैनिकों की कालोनी....यहाँ एक मकान है बड़ा सा, सीमेंट और लोहे से भरा जहाँ मेरे अपने बुढ़ापा काट रहे हैं, बुढापे के तमाम रोगों और कुछ किरायेदारों के साथ;  टेलीफोन में उनकी औलादें अक्सर दिखती हैं...कहीं दूर..थोड़ी चिंता, थोड़ी मजबूरियां , थोड़ी जिद्द , ढेरों मानताओं और आशंकाओं के मध्य जीवन यहाँ भी चलता है...गुमसुम सा ...बेनाम...जैसे अपनी पहचान अतीत में छोड़ आया हो..रोज़ यहाँ एक सा होता है..ठहरा हुआ.

इस देश के मध्य में एक स्टील का कारखाना है, और उसके इर्द गिर्द बसा हुआ है एक छोटा सा शहर; कोई रहता हैं वहां जिसकी भेजी हुई राखी और प्रार्थनाएं सदैव सुख फैलाती हैं... जिसने परिवर्तित कर दिया कठिनाई को सहूलियत में...वह उसका घर है जिसमे से बहे पसीने की महक नहीं जाती; पसीने का रंग अब चटक हो चला है, संवरते दिन रोज़ कुछ नया विचार लाते हैं, कुछ भविष्य जगमगाते हैं; यहाँ दिन बदलते रहते हैं...घर के जवान प्राणियों के आवागमन के बीच...ठहराव तो है पर रुका भी नहीं है.

कुछ समंदर पार वह गोरे लोगों की नगरी है...व्यवसाय और बेहतरी की आकांशा कितनो को ही वहां उड़ा ले गयी,  कुछ ऐसे भी हैं जिनके पाने की इच्छा खोने के डर पर भारी थी...साहसी और समझदारों की दुनिया है वो...जिन्हें कोई शक नहीं की वो क्या चाहते हैं और उसे कैसे पा सकते हैं; वहां भी एक बड़ा घर है, बेहतरीन और सुसज्जित...तस्वीरों में देखा हैं मैंने...वहां भी है मेरी दुनिया का एक कोना; छोटी छोटी परियां जो शायद रोज़ बढ़ती हैं, और वहां है एक एहसास का किस्सा...एक खून का हिस्सा;  निश्चित ही ठहरा हुआ होगा क्योंकि अक्सर दिखता नहीं है...पर एहसास कभी कम नहीं होता.

फिर यहाँ मैं हूँ , अपने दूसरे आधे के साथ और साथ में हमारी पूरी बड़ी होती दुनिया और किराए का मकान...गुज़रते दफ्तरों के दिन, चहलकदमी करती रातें, टूटते, बिखरते, संवरते, संजोते सपने और अपनों में ही मशगूल अपने... पेट्रोल और दूध की थैलियों के साथ आशाओं में पनपता जीवन, खोजने और पाने की कोशिशों में बहकते विचार, और अरसे बाद फिर से चलती एक कलम; और यहीं मेरे साथ ही रहते हैं एहसास जिनमे हैं शामिल मेरा गाँव, अपनों का बुढ़ापा, कारखाने का नगर और समंदर पार दूसरे ज़मीं की गहराइयाँ...इसमें ही शामिल हैं दोस्त जो छिटके हुए हैं असीमित धरती की सीमित दूरियों में, या फिर बंद रहते हैं कंप्यूटर की घड़ियों में...इसमें हैं सहपाठी, सहकर्मी, पड़ोसी, और कुछ विदेशी...इन्ही एहसासों में है कल का कलरव, और इसी में आज का सच है, इसी में कल की भागदौड़ है और इसी में में बंद एक जहाँ और है;  यह सब चलता है...रुका हुआ नहीं है, पर इसमें भी ठहराव है...दिखता नहीं है पर रहता है...मुस्कुराते हुए, मुहं बाए हुए, मैं इसी ठहराव में चलता हूँ, हँसता हूँ, रोता हूँ, बदलता हूँ, सिंचता हूँ, भीगता हूँ, सूखता हूँ...परिवर्तन होता रहता है पर मेरा बिखरा हुआ ठहराव साथ रहता है...वो मेरा अपना है.

Friday, March 23, 2012

जब करो इंतज़ार तब घटा नहीं छाती,
बाग़ से सूखी मिटटी की महक नहीं जाती,
इतराना चाहता नीरज, फूलों के समंदर में,
पर तितलियों की बोली समझ नहीं आती;

Thursday, March 22, 2012

तुम्हारी सरफरोशी हम क्यूँ नहीं समझते,
देशप्रेम की मदहोशी हम क्यों नहीं समझते;
अब तो मनाते हैं हम भ्रष्टाचार की दिवाली,
और चुपचाप हैं देखते कोयले की दलाली,
कैसे कैसे गद्दारों को अब हम हैं सहते,
तेरे देश की संपत्ति को जो विदेश में रखते,
शर्मसार हैं हम, देश के सच्चे बन नहीं पाए, 
तुम्हारा बलिदान सार्थक कर नहीं पाए,
सीनों पर खायी गोली हम क्यूँ नहीं समझते,
कुर्बानियों की होली हम क्यूँ नहीं समझते;

Wednesday, March 21, 2012

Passing by the stream on way home, heard frogs croaking. Sighted a little snake yesterday morning surfing over a stone. Flowers, the birds, lightness in the breeze....nature is out of its winter hibernation.
For last few months winter silence prevailed over these mountains. Within, what seems like few days, trees are chirping with flowers and leaves. Birds now fly wearing bright colors and the Sun has a loving warmth.
Seeing the season change.

By: Jyoti Patil

उस छोटी सी पानी की पहाड़ी धारा से गुज़रते वक़्त मेढकों का टर्राना अब सुनाई देने लगा है; रोज़ यहाँ से गुज़रती हूँ...कल सुबह तो एक छोटे से सांप को पत्थरों के ऊपर नर्म धूप सेंकते देखा था; ये फूल, चिड़ियाँ, हवा का हल्कापन...प्रकृति अपनी जाड़े की निद्रा से जाग चुकी है...
पिछले चंद महीनों में इन पर्वतों को सर्दियों के सन्नाटे ने जकड़ रखा था...अभी कुछ ही दिनों से पेड़ों में फूल पत्तियां चहचहाने लगी हैं...पक्षी अब उजले और चटक रंगों में उड़ने लगे हैं, सूरज के पास फिर से प्यारी गुनगुनी धूप है...
मौसम को करवट लेते देख रही हूँ...

( I tried to interpret )

Monday, March 19, 2012

तब क्या करोगे

एक समय,
जब आइनों में पुराना चेहरा,
नहीं देख पाओगे,
और लाख कोशिशों के बाद भी,
बालों की सफेदी नहीं रोक पाओगे;
जब  रोज़ दफ्तर से लौटते हुए,
शरीर, दिमाग की तरह ही थक जाएगा,
करवटों में आराम खोजोगे,
पर अगली सुबह भी दर्द नहीं जाएगा;
जब शाम की चाय के पहले ही,
बच्चे गणित के सवालों का हल पूंछेंगे,
कुछ बुद्धि बची होगी तो बताओगे,
वरना रोज़ खाली होता सर खुजाओगे;
जब टी. वी और अखबार की तरह ही,
रोज़ इसबगोल चाटोगे,
अपनी दिन पर दिन बढ़ती व्यथा,
किस प्रभु से बांटोगे;
जब भविष्य की चिंता में,
अपनी बचत का पासा फेंकोगे,
और सड़क पर रेंगती सुंदरियों की बजाय,
 इन्वेस्टमेंट का स्टेटस देखोगे;
जब हर दिन, और दिनों की तरह,
इन्ही उलझनों में निकल जाएगा,
तब कहाँ से स्फूर्ति लाओगे,
नया दिन कहाँ से आएगा;
इस सरपट भागते जीवन का,
ये भी एक अभिन्न  कोना है,
और कितना भी बीच में रहना चाहो,
कभी इस कोने में सब को होना है;
ज़रूरत यह है कि और रंगों कि तरह,
इस रंग से भी न इनकार करो,
बेशक बालों को रंगों कृत्रिम,
पर सफेदी को भी स्वीकार करो;
पुराने गाढे रंगों में,
थोड़ी सी सफेदी मिलाओ,
कुछ इधर से निकालो, कुछ उधर से डालो,
एक और नया रंग बनाओ;
बच्चों को स्कूल कि गणित न सही,
जीवन कि गणित पढ़ाओ,
इन्ही रास्तों पर रोज़ नए आयाम मिलेंगे,
थोड़ा सा हाथ बढाओ;

on railway budget 2012

हर साल चलाई जाती हैं नई गाड़ियाँ,
बदले जाते हैं टिकट बुकिंग के नियम,
पर कभी भी नहीं मिलता रिज़र्वेशन,
भारतीय रेल है या कागज़ का सनम;

Saturday, March 10, 2012

तेरी आवाज़ को वो सोचते हैं कैसे दबाएँ,
सियासत की नई कोई तरकीब लगायें,
नादान हैं ये हौसलों का इल्म नहीं इनको,
चलेंगे पैर इतने, पत्थरों में छाले पड़ जाएँ,


देख कर मंज़र ये ऐसा क्यों लगा,
मन भरा पर आँख बाकी रह गयी,
देर से पहुंचा सवेरा आज क्यों,
रात की कुछ बात बाकी रह गयी,

Tuesday, March 6, 2012

एक और रंग चढ़ने दो,
इस होली,
कुछ और बढ़े न बढ़े,
प्यास अपनी बढ़ने दो;
जैसे उम्मीदें रखती है,
नव ब्याही,
शब्दों में भरो,
नई स्याही;
तो लो भाई,
लिखावट को नई लिपि,
हमने भी दे दी,
अब न रहेगी बेबसी,
और न ही उदासी;
अब भौहें रात में,
नहीं हैं सोचती,
बीते हुए कल को आँखें,
नहीं हैं कोसती,

क्योंकि अब जिंदगी से है,
हमारी भी दोस्ती;

 

Saturday, March 3, 2012



जो 'कल' मैं अपना बेकार नहीं करता,
तो आज अपने आप से नहीं लड़ता,
सोचता हूँ जिंदगी में कुछ तो कर लूँ,
अब महज़ लिखने से मन नहीं भरता,

Friday, March 2, 2012


कुछ अनकहे मौसम की तरह अपनी रुसवाई है,
जिस डगर को जब न चाहा, तब वही पाई है,
देखते हैं कि जलेंगे या बरस कर घुल मिलेंगे,
फिर वही चिर परिचित धूप नज़र आई है,