Monday, December 20, 2021

 

As a child I recollect the various conversations thread,
you have the talent to be rich; they always said;
Ohh my tender mind, the big dreams and the illusion,
with time there was less clarity and more confusion;
And as I succumbed to the chaos of over dreaming,
I could sense the heart silent, the mind screaming;
The uniform brought some sanity, and I realized,
that talent continues to sleep unless channelized;
Being rich isn't easy but can be very essential,
and equally important to know how much is substantial;
for money has a tendency to come, leave and come,
but talent when nurtured will stick like some gum;


Sunday, December 19, 2021

 

दिवस को आगाज़ दे दो,
स्वयं को आवाज़  दे दो,
पंख चाहे हों न हों पर,
सोच को परवाज़  दे दो। 

Monday, December 13, 2021

 

अपनी जिम्मेदारी निभाना भी साहस है,
 किसी गिरे हुए को उठाना भी साहस है,
 पर खुद के ग़मों को कर दरकिनार,
 दूसरों पर खुशियाँ लुटाना भी साहस है;

शिखर पर चढ़ते रहना भी साहस है,
फिसल कर उठते रहना भी साहस है,
पर इससे भी न मिल पाए मंज़िल तो,
मुस्कुरा कर गीत कहना भी साहस है;

जंगलों में रात बिताना भी साहस है,
शस्त्र कौशल सिखाना भी साहस है,
पर जहाँ ज़रूरत हो संयम रखने की,
वहाँ साहस न दिखाना भी साहस है;

सच है, कुछ अनजाने की आशंका संग है,
पर इन आशाओं का भी एक अनूठा रंग है,
दिनों के हौसले को रातों में रौशन रखना,
साहस अज्ञात के साथ एक प्रेम प्रसंग है;


Thursday, December 2, 2021

 

गांव गली सब घूम लिया,
बाग़ बगीचा घूम लिया,
सड़कें, रेलें और समंदर,
शहर समूचा घूम लिया;

घूम लिया जौ की रोटी औ,
गुड़ का शरबत घूम लिया,
टूटी खाट, सिकुड़ती चौखट,
और गरीबी घूम लिया;

घूम लिया मन की लाचारी,
तन का दर्पण घूम लिया,
साधू संत और व्यभिचारी, 
सब का अर्पण घूम लिया;

घूमे रिश्तों की तलहट में,
सब भावों को घूम लिया,
जीवन तेरे आधे जग में,
लगता ब्रह्माण्ड है घूम लिया। 


Monday, November 15, 2021

 

वो भी दिन थे,
जब सर्द रातों में भी,
हथेली पर पसीना आता था,
बस कभी कभी ही,
कोई जुगनू टिमटिमाता था;

अंधेरों में कितने ही सपने,
देखे, टूटे, फिर देखे,
ख़्वाहिश थी कुछ मिले रौशनी,
कोई सपन तो इक उम्र तक पले, 
फिर तुम दिखे तो दीये जले;

आशंकाओं की हथेली पर,
चाहे बीत गयी कितनी ही दिवाली,
पर रौशन रहे आँखों में चिराग,
कभी न बुझे,
जब से देखा है तुझे। 

Tuesday, November 2, 2021

 

सारे दोस्त तुम बेशक ही मवाली रखना,
पर कम से कम उनमें एक सवाली रखना;

मुसीबत कभी अकेली ही नहीं आती,
बन्दूक भी जो रखना तो दुनाली रखना;

ख़ुशहाली से नीयत भी बिगड़ सकती है,
कभी कभी अलमारी भी खाली रखना;

मुस्कुरायेंगे लोग कागज़ के फूलों जैसे,
पर तुम भी अदा अपनी निराली रखना;

जब न रहेंगे दीये घरों की चौखट पर,
तुम तब भी इन आँखों में दिवाली रखना। 

Monday, October 25, 2021


बताने में, मनाने में, जताने में, लुभाने में,
जो क़ैद हो गए थे लफ्ज़ सुनने में, सुनाने में,
इल्म था कि ये जागीर रहेगी साथ हमेशा पर,
कितने ही लफ्ज़ खो गए, जिम्मेदारियाँ निभाने में; 

Tuesday, October 5, 2021

 जिस तरफ चूल्हा है, उस तरफ की मिटटी की दीवार काली पड़ गयी है। चूल्हे के थोड़ा ऊपर लगभग छह फीट पर दीवार को काट कर एक जँगला बनाया है और उसमें बांस की छड़ लगा दी है।  पर इतना धुआँ इस जँगले से नहीं निकल पाता और नतीज़न दीवार दिन पर दिन और करिया होती जाती है।  यूँ भी अमूमन ऐसे कच्चे घरों में धुआँ ही ज्यादा होता है ; आग तो बस पेट तक सीमित रहती है। 

इस बड़े से हालनुमा मिटटी की कोठरी में कोई किवाड़ न था; दो खूंटी पर अम्मा की पुरानी धोती टांग दी गयी है जो दरवाज़ा भी है और शर्म भी। कोठरी के दूसरी तरफ दो बड़े बड़े मिटटी के घड़े रखे हैं जिन्हे प्रतीक्षा है कि कभी ये फिर भरे जाएंगे। बाबू के जाने से तीन बरस पहले बहुत धान हुआ था ठाकुर साहेब के खेत में। तब बाबू को इतना धान मिला था मजूरी में कि दोनों घड़ा भर गया था।  फिर लगातार सूखा रहा ; ज़मीन में पहले पपड़ी पड़ी फिर दरार पड़ गयी। खेत खलिहान सब सूखे रहे। बहुत दिनों तक बाबू इधर उधर काम खोजते रहे; जब सड़क का काम चल रहा था तो बाबू तीन कोस जाते थे। उस दिन बड़ा तेज़ सूरज था और बाबू गमछा में थोड़ी उबली मटर गठिया कर निकल गए थे। छेदी चाचा और तीन लोग फिर उन्हें खटिया पर लादकर लाये थे; अम्मा दहाड़ मार मार कर रोई थी, भुरिया तब बहुत छोटी थी। बाबू मर गए थे।  कोठरी की दीवार पर लगे चटके शीशे के बगल में एक अंगूठे जितनी बड़ी मटमैली फोटू चिपकी हुई है बाबू की।  कभी कभी अम्मा अपनी धोती के आँचल से उसे साफ़ करती हैं; उसने देखा है। गरीबी की जात नहीं होती पर उसकी फोटू भी मटमैली ही निकलती है। 

चूल्हे के आगे ढेर सारी जलाऊ लकड़ी रखी है जिसे अम्मा और भुरिया सारी  दुपहरी बिन कर लाये थे। अभी सूरज काफी ऊपर ही है  पर चूल्हा जल गया है।  आज अम्मा के चेहरे पर संतोष का भाव है ; बगल में मचिया पर भुरिया बैठी है; अम्मा जो भी कहती हैं वह भाग भाग कर लाती है।  आज पेट भर के चावल दाल मिलेगा, और आलू का चोखा भी। आज कल्लू सात दिन बाद घर लौटा है ; शहर से कमाकर लाया है।  एक हज़ार रूपया कमाई और एक धोती अम्मा को दिया, भुरिया को मिली कान की बाली और फराक; आज बहुत दिन बाद कुछ दिनों की खुशहाली लौटी है।  अम्मा का कल्लू अब बड़ा हो गया है। 

कोठरी के बाहर दुआरे पर मूँज की खाट पर कल्लू लेटा हुआ सोच रहा है ; अपनी उधड़ी हुई पैंट की जेब से पैसे निकाल कर फिर से गिनता है।  सब मिलाकर  दो हज़ार तीन सौ तीस रुपये बचे हैं।  दिमाग में युद्ध चल रहा है ; ये उसकी पहली कमाई है।  कल सुबह ही तीस की ताड़ी पियेगा; फिर दिन भर सोयेगा।  दो हफ्ता तो आराम से निकल ही जाएगा ; इसके बाद शहर के दूसरे इलाके में जाएगा।  पिछली जगह पर ज़रूर ठेकेदार को शक हो गया होगा।  ऐसे तो कई लोग काम से भाग जाते हैं पर वह तो ठेकेदार का पांच हज़ार चुराकर भागा था। सत्तर की दिहाड़ी से काम करता तो इतने पैसे कमाने में अढ़ाई महीना लग जाता। गरीबी और मज़बूरी का कोई संस्कार नहीं होता;  कोई सभ्यता भी नहीं ; होता है तो बस कुछ तस्वीरें  जो सूखी आँखों में रोज़ हंसती हैं।  खटिया पर लदा बाबू का शरीर, लकड़ी बीनती नन्ही सी भुरिया , जंगल से महुआ चुन कर लाती और रोज़ धुआँ पकाती अम्मा, सब हँसता है आँखों में। दिहाड़ी से गरीबी नहीं जाती; गरीबी जाती है लड़ने से।  कल्लू किसी का बुरा नहीं चाहता, किसी को मारना भी नहीं; पर ज़िंदा रहना चाहता है, अम्मा और भुरिया का पेट भरना चाहता है। ईमानदारी उसे एक समय का चावल भी तभी दे सकती है जब काम मिले।  

उसने सुना है कई लोगों से लाल सलाम के बारे में। 

Thursday, September 30, 2021



खपरैले उस कच्चे घर के,
प्रेम सरीखे प्रांगन में,
मटमैले से दो दो चूल्हे,
सजे हुए हैं आँगन में ;

आँख खुले देखा है हमने,
जीवन की परिपाटी से,  
रोज सवेरे अम्मा पोतें ,
चूल्हे चिकनी माटी से;

फिर लाएं गोबर के उपले,
डंठल अरहर राठी की,
चूल्हे के आगे रख दें फिर,
पीढा आम के काठी की;

कर स्नान करें फिर अम्मा,
आगी बारन की तैयारी,
एक बटुई पर राख लगाएं,
दाल चढ़ायें भर के सारी;

ढोंका नून और साबुत हल्दी,
मर्चा, धनिया कर के इकट्ठा, 
डाल बूँद पानी की थोड़ी,
पीसें अम्मा फिर सिल बट्टा;

डाल मसाला और खटाई,
चूल्हे की फिर आग बढ़ायें,
बार बार फुँकनी से फूंकें,
एकई बटुई भात चढायें;

बड़ी बड़ी और मोटी मोटी,
रोटी पोएँ फिर हथपोइया,
जैसे सिंकती जाए रोटी,
कहें हमें कि खाइ ल्या भइया;

दाल भात और मोटी रोटी,
बड़की कांसे की थाली,
कुछ अचार और थोड़ा सिरका,
भूख बढ़ा दे मतवाली;
 
न कोई पकवान न मीठा,
न भाजी ही कैसी भी,
देखी ही जीवन में हमने,
एक रसोई ऐसी भी।   

Thursday, September 16, 2021


बचपन में पढ़ी थी कहानी,
दी नाइटेंगल एंड दी रोज़,
बुलबुल और गुलाब,
क्या याद है जनाब ?

काँटे को चुभाती रही,
ह्रदय के अंदर, और अंदर,
बुलबुल रात भर,
और रिसता रहा रक्त,
लाल, और लाल होता गया गुलाब,
क्या याद है जनाब ?

लड़के ने जब दिया गुलाब,
लड़की ने कर दिया इंकार,
मर गई बुलबुल,
कुचला गया गुलाब,
क्या याद है जनाब ?

किसको मिली ख़ुशी,
किसको हुई वेदना,
किसने लुटाई जान,
कैसा त्याग, कैसा मान,
किसका हो सम्मान ?

याद आती है,
वो पंक्तियाँ धूमिल के मोचीराम से,
" सच कहता हूँ बाबूजी,
यदि ज़िंदा रहने के पीछे,
सही तर्क नहीं है,
तो राम नामी बेचकर,
या रंडियों की दलाली कर के,
रोज़ी कमाने में,
कोई फ़र्क़ नहीं है " 
पर ये सही तर्क क्या है,
कौन तय करे,
जिसको जो लगे ठीक,
वह उसकी जय करे,

हमारे अपने मापदंड हैं,
और है अपनी प्रवृत्ति,
जीवन के मर्म की,
अपनी समझ, अपनी संस्कृति,
त्याग, खुदगर्ज़ी, दयाभाव,
सब का है अपना स्वभाव;
तुम भी सही, हम भी सही,
अपने अपने तर्क हैं,
हर प्रवृत्ति की कीमत है,
जो करती हमें सतर्क हैं,
हर भाव में छिपा कर्म है,
और बेशर्मी में भी शर्म है ;

 

Monday, September 13, 2021

 

पहले आशाओं की हवेली ,
फिर आशंकाओं की पहेली,
कभी तो चमक आँखों में,
कभी पसीने की हथेली;

वो हाथ पैरों का फूल जाना,
वो बाकी सब कुछ भूल जाना,
कितना कुछ सोचना चुपचाप,
कभी कम या उच्च रक्तचाप;

डॉक्टर और बुजुर्गों की,
बातों का विरोधाभास,
वो कोख में होती हलचल,
और ममता का आभास ;

फिर पीड़ा  .... असहनीय,
वो स्थिति .... दयनीय, 
ससुराल की आशा, बाबुल का बंधन,
पल भर शांति, फिर परिचित सा क्रंदन,
 
कोख स्त्री के स्वयं का विस्तार होता है,
और जनना उसका नया अवतार होता है,

Thursday, September 9, 2021

 another perspective...

क्या तुम दहेज़ देना चाहती हो ?
नहीं  .... बिलकुल नहीं।
तो कैसा दूल्हा चाहिए तुम्हे ?
वह जो रख सके संभाल के,
जिम्मेदार हो, अच्छी नौकरी हो,
पैसे वाला हो, दिल का निराला हो,
जैसा मैं चाहती हूँ , वैसा परिवार हो ,
हट्टा  कट्टा, दिखने में शानदार हो। 

क्या तुम दहेज़ लेना चाहते हो ?
नहीं  .... बिलकुल नहीं।
तो कैसी दुल्हन चाहिए तुम्हे ?
वह जो गोरी हो, सुन्दर हो, सुशील हो,
पढ़ी लिखी हो, संस्कारी हो,
अच्छी कुक भी हो, नौकरी वाली हो,
जो मॉडर्न भी हो, और हो किस्मती भी,
अपने पुश्तैनी जायदाद का कानूनन हक़ ले सके,
हो इतनी हिम्मती भी। 

मैं भी सोचता हूँ, दहेज़ क्या है,
क्या वो जो माँगा जाता है, या दे दिया जाता है,
या कुछ और भी जो चाहते हैं हम,
क्या सब लड़के कमाऊ हैं या सब सब लड़कियाँ सुन्दर,
क्या मिल पाती है हर लड़की को उसका हिस्सा,
उसकी पुश्तैनी जायदाद से,
क्या दहेज़ करता है समझौता या भरपाई,
जहाँ नहीं हो पाती घरों में गाढ़ी कमाई,
मुझे सच में नहीं पता दहेज़ प्रथा है या सोच,
आपको पता हो तो बताना !

neeraj tripathi.....thinking aloud.

Wednesday, September 8, 2021


वो दिल थोड़ा बिस्मिल,
वो कुछ बातें अधूरी,
वो लम्हे जिन्हे बताना था मुश्क़िल, 
पर क़ैद करना था ज़रूरी,
वो शब्दों का अल्हड़पन,
वो टूटी फूटी शायरी,
अब भी जिंदा हैं वहां,
जहाँ है हमारी डायरी;

 

 

It was one thing that I liked most,
for here I was the guest, and was the host,
my memories stored in it like some treasure,
and which I often visited at my leisure, 
in which scribbled words lay scattered,
a few flashes of joy, some dreams shattered,
some moments of truth, some lies of time,
but whatever they were, they were all mine,
I cared and handled it with utmost care,
as best as I could, I carried it everywhere,
then came a time when my friend announced,
she was leaving the country, I felt trounced,
she spoke to me with her desires masked,
how would you like me to remember you, she asked,
I knew it wasn't a request, nor an inquiry,
taking it out quietly, I handed her my diary,
nothing is more valuable to me, I said,
she gleefully accepted it as the bonding thread,
it has been a little more than thirty years now,
I sometimes miss the friend, the diary and how,
Not sure where they are but I have made amends,
for after the diary I have only written for friends;


 वो जाड़ों के दिन,
दुआरे का अलाव,
उसकी कोख में सिंकते,
आलू और शकरक॔द,
कहाॅ था कोई अलगाव ;

वो बारीक कटी प्याज,
चार बूंद कच्चा कड़वा तेल,
पीसे हुए नमक से मेल,
हधपोई चूनी की रोटी,
काश, अमीरी में भी होती ;

वो भूॅजी लाई चना का चबैना,
एक ढोंका गुड़,
एक लोटा ताजा पानी,
और जीने की मनमानी,
अब किसने जानी;

वो नेवते का कोंहड़ा,
वो दोने में माठा,
मुट्ठी भर शक्कर,
सोहारी से चाटा,
वो स्वाद नहीं जाता;

वो रात की सहेजी रोटी,
वो बासी भात,
वो सिरका आम का,
सब क्या जानें,
गरीबी का ज़ायका ।

Wednesday, August 18, 2021

उम्मीदों के झूले,
लटके हैं पेड़ की शाखों से,
पर हौसलों की पेंग,
झांकती है, सलाखों से,

इस अफरा तफरी के बीच,
जो मन हो जाता पावन,
तब एक ही हो जाते,
तुम्हारा शिव, हमारा सावन,

पर अपना अपना शिव,
तय करती है जनता,
महज़ गरल पीने से कोई,
शिव नहीं बनता।   

Friday, August 6, 2021

 ये दिन आएंगे, जाएंगे,
कुछ लाएंगे, ले जाएंगे,
कुछ कर जायेंगे घाव ज़रा,
कुछ मन को ज़रा लुभाएंगे; 

कुछ रस जीवन में भर देंगे,
कुछ चटक रंग को कर देंगे,
कुछ लाएंगे खारा सागर,
कुछ नमक इकट्ठा कर देंगे;

यदि दूरी इनसे हम कर लें,
या बाहों में इनको भर लें,
ये आये हैं तो जाएंगे,
हम कितना भी इनको धर लें;

जब समय गुज़र ही जाता है,
जो लाया था, ले जाता है,
फिर भी क्यूँ रेत खिसकती है,
फिर क्या है जो रह जाता है; 

कहने को तो वह पहर गया,
वह राह गयी, वह शहर गया,
यूँ गयी सुबह औ शामें पर,
 इक लम्हा आँख में ठहर गया;

खपरैली छत का कहर गया,
निर्धनता का वह जहर गया ,
माँ के घुटनों का दर्द मगर,
जो आया तो फिर ठहर गया;

जो पाया था वह महर गया,
रंग भरा माट का अहर गया,
पर जाने से जो रिक्त हुआ,
वह रिक्त ह्रदय में ठहर गया;
 

Wednesday, July 28, 2021

 आमों की टहनियों में,
लटके हुए झूले,
उन घिरी घटाओं में,
बहुत भाये;

बेलपत्र, जौ की बालें,
धतूरा, मदार के फूल,
गाय का कच्चा दूध, 
शिव चढ़ाये;

हर साल कांवड़िये,
कांवड़ में, नंगे पांव,  ​
कितना ही गंगाजल,
कंधे पर लाये;​

सिंकती हुई धरती पर,
रिमझिम फुहारों ने,
हरियाली ठंडक के,
रंग बिछाए;

पर जीवन के सावन,
जो एक बार बीत गए,
अनायास भी,
फिर नहीं आये। 

Tuesday, July 27, 2021

 बात परस्पर सुने कहेंगे,
सुख लहरों में साथ बहेंगे,
सोचा था ऐसा ही होगा,
सोचा था सब साथ रहेंगे,

प्रेम किरण मतवाली होगी,
बेशक झोली खाली होगी,
कभी रात जो लम्बी आये,
विरह वेदना साथ सहेंगे,

देख नियति का यह सच कैसा,
कब सोचा था होगा ऐसा, 
झोली हरदम भरी रहेगी,
फिर भी खाली हाथ रहेंगे ; 

Wednesday, July 7, 2021

मृग से नयनों की आशा में,
या मरू की जटिल पिपासा में,
बन जाएं हम भी नट कोई,
फिर कह दें बात तमाशा में,

धुंधला बन किसी कुहासा में,
या वट की घनी दिलासा में,
या उन बातों का रस निचोड़,
हम दे दें किसी बताशा में,

भावों में,अभिलाषा में,
या बिन बोले जिज्ञासा में,
कैसे उनको चरितार्थ करें,
जो अर्थ छिप गए भाषा में;

 

Monday, July 5, 2021

यूँ स्थिर से नहीं ठहरते और तनिक सा हम बढ़ लेते,
जिसे देखते हैं घाटी से, वही शिखर हम भी चढ़ लेते,
प्रेम झलकता अल्फ़ाज़ों में, नाम भी होता, और हमारी,
कागज़ में तस्वीर झलकती,जो हम थोड़ा लिख पढ़ लेते;

अपने इस सूने प्रांगड़ में एक चहक हम भी गढ़ लेते,
इंतज़ार की इस मुद्रा को प्रेम रत्न से हम मढ़ लेते,
नहीं विचरते आवारा से प्रणय सरीखी इन गलियों में,
कहीं दिलों में भी बस जाते,जो हम थोड़ा लिख पढ़ लेते;

 

Monday, June 28, 2021

रोज़मर्रा की,
आपी धापी में,
चाहतों से रहा,
हमेशा तनाव,
पर चाहतों की हद्द,
कौन तय करे,
कौन करे,
बेहतरी का चुनाव,
पर फिर भी,
​तुम्हारी हथेलियों से होकर,
गुज़रना चाहती है,
हमारी नाव।


 

Wednesday, June 23, 2021

उमड़ घुमड़ कर घिर आये बदरा,
सुधि में नैनन बह जाए कजरा,
विरह की बिजुरी अब तब चमके,
रैन भई है पिशाची रे,

कस अँखियन में सपन अनाना,
राज रंक भये एक समाना,
प्रिय वियोग में सब मिथ्या है,
सुख निद्रा ही साची रे,

मंद समीरण तन मन डोले,
अरुण हया के घूँघट खोले,
पृथक उषा का आशय जग में, 
मोर पिया मोहे प्राची रे,

 

Friday, June 18, 2021

कुछ कुछ खद्दर जैसी थी,
मखमली नहीं थी,
पर इस चादर से हम,
खूब काम लेते थे,
गर्मियों में बिछा लेते थे,
जाड़ों में ओढ़ लेते थे,
और कितनी भी आये आंधी पानी,
इसी चादर से ढक लेते थे।

इस अनोखी चादर की
कई परतें थीं,
और छिपी हुई थी हर परत में,
कितनी ही दास्तान,
कुछ से हम थोड़ा वाक़िफ़ थे,
कुछ से थे बिलकुल अनजान,
दफ्तर में बाबू की झिड़की,
घर में कम होता खाने का सामान,
कॉपी किताब के खर्चे,
बारिश में रिसता हुआ मकान,
रिश्तेदारों की खींचातानी,
और बिगड़ता सम्भलता सम्मान,
सब कैद हैं इस चादर की परतों में।

पर कभी चादर ने ये ज़ाहिर नहीं किया,
बार बार धुली, थापी से पीटी गयी,
निचोड़ी गयी, धूप में सेंकी गयी,
इसका रंग हल्का होता चला गया,
पर ये सिकुड़ी नहीं,
जिम्मेदारी से सदा व्याप्त रही,
और कितने ही बड़े हो गए हमारे पाँव,
हमेशा ये चादर पर्याप्त रही।

फिर धीरे धीरे चादर बूढी हो गयी,
और उधड़ कर,
फैलने लगे उसके धागे ज़मीन पर,
उस पुरानी चादर की बूढी कतरने,
कुछ रातें, कुछ दुपहरियाँ, कुछ सुबहें,
सफ़ेद धागे, झुर्रियों में सिमटे लम्हे,
लटकी चादर देखती रही धागों को गिरते,
उन धागों को इकट्ठा करने से फिर सुबह नहीं बनी,

एक चादर  …… पीड़ा और उम्मीद से लड़ती,
टूटे धागों का समूह  बन जाती है,
कितनी ही सोच, इच्छा, जिज्ञासा,
कितना कुछ……………  अधूरा,
फिर ख़ामोशी  .... शान्ति,
​चादर यहाँ थी भी और नहीं भी।

 

Friday, June 11, 2021

कुछ मिथ्य भी, कर गठजोड़ गए
कुछ सारा भाव निचोड़ गए,
दो किस्म की हमको चाह रही,
कुछ लूट गए, कुछ जोड़ गए।

छत से लटके थे सब तारे,
पर भू को थे सारे प्यारे,
खुद के गुरुत्व की आंधी में, 
कुछ टूट गए, कुछ तोड़ गए।

वो कशिश नवेली बातों में,
और राह कठिन, सौगातों में,
सीधा चलने की साज़िश में,
कुछ रूठ गए, कुछ मोड़ गए।

पर बात नियति ने कब मानी,
अँजुरि में रोपा था पानी,
चाहा था जिनको हद तक वे,
​कुछ छूट गए, कुछ छोड़ गए। ​

 

Tuesday, June 8, 2021

ये रात नहीं आती, ये दिन भी नहीं सोता,
बिरहा की वीरानी में रस्ता भी नहीं रोता,
आँखों का वो बादल भी यूँ सांझ न भिगोता
अमावस भी नहीं आती, चंदा भी नहीं खोता,

तू दोस्त ही रहता मेरा,  ऐसे न ज़ुदा होता,
यदि बस में मेरे होता, यदि मैं भी खुदा होता।

 

तब न कभी आपस में गिला करते थे,
खुशबू और हवा रोज़ मिला करते थे,
क्या हुआ कि काँटे भी नहीं बचे उस पर,
जिस हथेली पर गुलाब खिला करते थे।

 

Friday, June 4, 2021

 सोने और जागने के बीच की स्थिति है यह, न ही स्वप्न में रह पा रहे हैं और न ही हकीकत में। न ही ये थमा है और न ही चल रहा है। किसी को उम्मीद है कि किसी तरह भी कोई क्षति होने से से बच जाएगी, तो किसी को उम्मीद है कि जो क्षति हो गयी वह बिसर जायेगी। अब सड़कों पर वह सूनापन नहीं रह गया पर अंदर का सूनापन जाते जाते ही जाएगा।  उसपर आशंका का कोलाहल है जो सूनेपन की सफेदी में भी करिया दिखाई देता है। ये ढलान जानती है कि पहाड़ों से टूटकर गिरा पत्थर कहीं तलहटी में पहुँच कर ही विश्राम पायेगा। फिर वही पत्थर अपनी चोटों पर मलहम लगते हुए ऊपर देखेगा, जहाँ से वह गिरा है। पहाड़ हल्का हो गया है ज़रा सा पर अब भी बिलकुल स्थिर है।  और पत्थर हैं ऊपर जिन्हे संभालना होगा। स्वप्न और हकीकत का बीच यह जागने सोने का खेल है जिसमे हौसला ही खिलाड़ी है और संयम है रणनीति । अब यह आभास है कि समय जब ऊँघता है तो खर्राटों की आवाज़ नहीं आती।

Thursday, June 3, 2021

एक दिवस जब जीवन पथ पर,
भूख लगी थी हमको कस कर,
अभी दूर था हमको जाना,
भोजन का था नहीं ठिकाना,
पर किस्मत की अपनी आभा,
छोटा सा इक दिखा था ढाबा,
हम बिलकुल भी न सकुचाये,
गाड़ी रोकी कदम बढ़ाये,
जर्जर सी दीवार खड़ी थी,
जिस पर कालिख खूब चढ़ी थी,
उसपर सटी बांस की सीढ़ी,
जिसने देखी कितनी पीढ़ी,
क्रम में चार पड़ी थी खटिया,
सब पर एक बिछी थी पटिया,
हम भी इक खटिया पर बैठे,
मार पालथी थोड़ा ऐंठे,
पटिया को दे थोड़ा धक्का,
काला चश्मा उस पर रक्खा,
लगे देखने हम मोबाइल,
होठों पर आई स्माइल,
तभी एक आवाज़ ने रोका,
आँख उठा कर हमने देखा,
भाग्य बना था जिसका चालक,
सम्मुख था अबोध सा बालक,
आँखें बुझी हुई तारा सी,
उमर रही होगी बारह सी,
बाहें जैसे इक टहनी थी,
नेकर घुटनों तक पहनी थी,
काँधे पर मैला सा गमछा,
देख रहा था थोड़ा तिरछा,
बाल भी उसका बढ़ा हुआ था,
लिए गिलास जग खड़ा हुआ था,
भर गिलास में पानी आधा,
और जरा उचका कर कांधा ,
पूछा, साहेब क्या खाएंगे,
जो कहियेगा ले आएंगे,
हमने उसको ध्यान से देखा,
उसके माथे नहीं थी रेखा,
होती किस्मत ज्यादा, कम भी,
संभल गए थे अब तक हम भी,
जान भूख से जाने को है,
पूछा क्या क्या खाने को है,
भिंडी, पालक, आलू गोभी,
पीली दाल, छास भी होगी,
लेकिन राज़ की बात बताऊँ,
इच्छा हो तो बियर पिलाऊँ,
अपलक हमने उसको देखा,
माथे पर आ गयी थी रेखा,
हमने कहा नहीं, रहने दो,
रोटी दाल छास बहने दो,
अभी दूर जाना है हमको,
गाड़ी बहुत चलाना हमको,
जैसे तैसे खाना खाया,
रुपिया अस्सी नगद चुकाया,
सोचा मिले है क्या किसको भी,
रुपिया बीस दिया उसको भी,
रस्ते अपने बैठ सिकुड़ के,
एक बार देखा फिर मुड़ के,
गमछा टांग, पकड़ कर सीढ़ी
फूंक रहा था बालक बीड़ी,
एक दिवस जब जीवन पथ पर,
भूख लगी थी हमको कस कर ;

 

Tuesday, June 1, 2021

जब कि एक ही बगीचा,
दोनों को बराबर सींचा,
रखा दोनों के लिए,
एक ही भाव,
फिर क्यूँ हैं,
ये दो प्रभाव,
कैसे सीखा एक ने मुस्काना,
और दूसरे ने चुभ जाना;

बेशक दोनों को दिया,
समान प्यार, समान दुलार,
समान भाव,
पर दोनों के हैं,
पृथक स्वभाव,
जितना है ज़रूरी मुस्काना,
उतना ही ज़रूरी है चुभ जाना,
इस जगत में,
हर प्रभाव की ज़रूरत है,
और वास्तव में ये,
एक दूसरे का पूरक है;
स्वीकार करो कि हम सब,
एक ही प्रकृति की देन हैं,
​बेशक रखो,
सब के लिए समान भाव,
पर स्वीकार करो,
विभिन्न स्वभाव।

 

Wednesday, May 26, 2021

जीवन खुद ही स्मृतियों की बारात है,
उसपर शिक्षक होना अद्भुत सौगात है,
यूँ रहा ये सफर तीन दशकों से अधिक,
पर लगता है मानो कल की ही बात है;

इस सफर में हम स्वयं ही पढ़े भी, पढ़ाया भी,
इस सफर में हम स्वयं ही सीखे भी, सिखाया भी;
सबसे अहम् किरदार किन्तु साथ रहा है आपका,
इस सफर में संग जिसके बढ़े भी, बढ़ाया भी;

ये नहीं ख़्वाहिश है कोई नाम अपना याद रक्खे,
ये भी नहीं कि छात्र कोई काम अपना याद रक्खे,
आँख लेकिन छलछला जाएँगी अपनी जब कभी,
इस सफर की सीख से कोई नई बुनियाद रक्खे;

 

वो सूरज का छिपना, अँधेरे का आना,
वो सूनी सड़क पर, था मिलना मिलाना,
वो दिल का धड़कना, वो हिम्मत के फेरे,
वो नीड़ों  की चुप्पी,  चिड़ियों के बसेरे ,
वो कहना बहुत कुछ, मगर कह न पाना
वो चलते हुए,  उँगलियों का छू जाना ,
वो बातें, वो होठों पर प्यारी सी थिरकन,
वो गीतों का आँगन, वो शब्दों की उलझन,
वो बादल के चलने से चंदा की झलकें,
वो हल्की सी सिहरन, वो सहमी सी पलकें,
ये उस शाम का एक हिस्सा है अब बस;
ज़िंदगी का मेरी एक किस्सा है अब बस।

 

Monday, May 24, 2021

हाल के बीते ज़माने, शौर्य से भरपूर थे,
और अपने कारनामे, शहर में मशहूर थे;

भूल बैठे थे समय में समय की जादूगरी को,
सोचते तन मन भी अपने शस्त्र से तैमूर थे;

परचम भी फहरा रहा था, गर्व के ऊँचे शिखर पर,
कुछ असर था खून का, कुछ हम नशे में चूर थे;

थम गए लेकिन वहीँ पर, जब ली करवट वक़्त ने,
थीं भुजाएं साथ पर हम पैरों से मज़बूर थे;

व्यर्थ सा लगने लगा है, जो मिला था राह में,
रह गए हम उतने, जितने वक़्त को मंज़ूर थे;


 

Friday, May 21, 2021

आने वाला है वो समय,
तुम बनाओगी अपना जग,
अपने मज़बूत हाथों से,
उम्मीदों की हवेली पर;

पर कैसे भुला दूँ जब,
समेट लेती थी सारा जग मेरा,
तुम्हारी नन्ही उँगलियाँ ,
उस छोटी सी हथेली पर।

 

Tuesday, May 18, 2021

गर्व था मुझे अपनी पोशाक पर,
झूलने के तेवर पर, मंशा पाक पर,
फूल सरीखे जेवर, उनकी खुराक पर,
गर्व था मुझे अपनी ही शाख पर;

कुदरत भी कैसी जागीर लिखता है,
जिस पर गर्व किया वही बिकता है,
ढक लिया था जिसे पोशाक ने मेरी,
अब वह सारा आसमान दिखता है ;

 

Monday, May 17, 2021

अब तूफान की सूचना तूफान आने से पहले मिल जाती है। समय रहता है कि ऐसे प्रयास किये जाएं कि कम से कम जान माल की क्षति हो; या इतनी तैयारी हो कि नुकसान वाली स्थिति को जल्द से जल्द सामान्य किया जा सके।  हमारी सैटेलाइट अब समुद्र से बात कर सकती है और इतना अंदाजा लगा सकती है कि चक्रवात का मुँह किस तरफ को खुला है; कि उसके पैर किन रास्तों पर पड़ेंगे; कि किन रेतीले तटों में सुराख हो जाएगा; कि क्या डूब कर राख हो जाएगा।

हमने कोरोना की वैक्सीन बना दी; और कोरोना को रहने दिया ; मास्क बना दिए पर मुँह को खुला रखा ; सेनिटाइज़र बना दिए पर हथेलियां सूखी ही रहीं। पहले हमने अल्प को विस्तृत बनाया और विस्तृत हो जाने पर उसे अल्प ही रहने दिया। हमने डाटा बनाया भी और डाटा छिपाया भी ; ऑक्सीजन बनाई भी और जानें गँवाई भी। जलती चिता न पहले बात करती थी, न अब बात करती हैं।  इन्ही नदियों में राख भी बह  रही है और बह रहे हैं कुछ लावारिस भी। 

पता नहीं हमारा विज्ञान हमारी ज़रूरतों से जन्मा है या विज्ञान के जन्म के पश्चात हमारी ज़रूरतें बनायी गयी हैं। अद्भुत हैं हम और अद्भुत है हमारा विज्ञान; कितना कुछ जान गए हैं,कर रहे हैं......पर अरब सागर हो या ज़िंदगी, हम अब भी तूफानों को नहीं रोक पाते।

आने दो इन तूफानी हवाओं को भी..... शायद ये उन यादों को साथ ले जाएं जिनकी राख अभी ठंडी नहीं पड़ी....... उन वादों को भी जो पता लगा गलती से किये गए थे..... इस ज़िंदगी में।

 

Thursday, May 13, 2021

ये कहाँ आ गए हम,
ख़त्म होगा कैसे ग़म,
अपनों को देखते रहने,
की चाहत  में,
आज बेड पड़ गए कम,
उन  अस्पतालों में  ,
जिनसे सदा दूर रहते थे हम;​

एक इंजेक्शन की कीमत,
कई इंसानों से अधिक हो गयी,
जो ऑक्सीजन रिसती थी पीपल से,
वह सिलिंडर में बंद है,
ज़िंदगी बचाने की होड़ में,
जेब ही क्या, हिम्मत भी,
ऑक्सीजन विहीन हो गयी;

वहां आ गए हैं हम,
जहाँ से सृष्टि के अंत का,
आरम्भ है,
जीवन को हम अब,
खुदगर्ज़ी से परख रहे हैं,
जिन परदों से हम शर्म ढकते थे,
हवा और रौशनी भी,
​उन्ही से ​ढक रहे हैं।

 

Wednesday, May 12, 2021

इन दिनों रोज़ शाम को छत से डूबते सूरज को निहार लेता हूँ ; पश्चिमी भारत के इस भाग में अँधेरा जल्दी नहीं होता पर यूँ भी कौन चाहता है कि जल्दी अँधेरा हो जाए।  दिन भर घर के अंदर ही घर और ऑफिस खुला रहता है ; रोज़ के आँकड़ों के बीच कितनी ही कामनायें जीवित रहती हैं।  कितनी ही सड़कों का दम  घुट गया है इन दिनों क्यूंकि कोई गंतव्य नज़र नहीं आ रहा। पर गंतव्य तो होगा वरना क्यों रोज़ सूरज मेरी छत से आता जाता दीखता है। क्यों कबूतर अब भी अँधेरा होने से पहले बैठ जाते हैं अपने उन चिर परिचित स्थानों पर; क्यों सांझ होते ही बयार अपने अंदाज़ में बहने लगती है ; क्यों पश्चिम का आकाश फिर से नारंगी हो जाता है ; गंतव्य तो होगा ; नज़र आये शायद एक और रात के बाद , नज़र आये शायद अगली सुबह में।

उम्मीद एक ऐसा गहना है जिसे पहनो या न पहनो, शरीर उससे अलग कभी नहीं हो पाता ; हमारी आस्था प्रत्येक शाम घरों में होती आरती और तुलसी पर रखे दीये में सुरक्षित रहती है। हम शायद पहले से कहीं अधिक आध्यात्मिक हो गए हैं, और सहनशील भी। हमारा विश्वास है कि ये आंकड़े जल्द बदलेंगे और सड़कें फिर साँसें लेंगी ; विश्वास है हमें कि अस्पताल में जगह होगी और हम फिर भी वहाँ नहीं जायेंगे। विश्वास है हमें कि हमारी आशंकाओं पर जल्द विराम होगा और विश्वास है हमें कि मात्र ह्रदय में राम होगा। सूरज का डूबना ही उसके फिर से निकलने का संकेत है।  हर शाम अब विशेष है।

 

Monday, May 10, 2021

जब नहीं कोई हुनर था, तब नहीं कोई अहम् था,
साथ में विश्वास था तब, बचपना ही तब धरम था,
तब थे झगड़े क्षणिक होते, दो घड़ी में भूल जाते,
तू बड़ा या मैं बड़ा हूँ, तब नहीं कोई भरम था;

बुद्धि से लेकिन ये जाना, लिख पढ़े हम हो गए हैं,
पैर पर निर्भीक अपने, अब खड़े हम हो गए हैं,
कितना देखो बढ़ गया है, अब हमारा कार्य कौशल,
बचपना खुद सो गया , इतने बड़े हम हो गए हैं;

अब नहीं व्यवहार में, किंचित भी दिखता वह लड़कपन,
अब तो बस दिखती हैं कमियाँ, दूसरे में हमको छप्पन,
बात जो लगती थी भोली, लगती है अब तीखी छूरी,
इस सफर में किस तरह से आ गया हमको बड़प्पन;

कब गिरेगा बोझ भारी, यह अहम् जो ढो रहा है,
आज है एहसास इसका, आज फिर दिल रो रहा है,
मन है फिर से ढूंढ़ पाएं, द्वेष को रख कर किनारे,
नींद खुल जाए पुनः से, बचपना जो सो रहा है।

 

Tuesday, April 13, 2021

आशंकाओं की झड़ी,
चिंताओं की लड़ी,
जो हुआ उसका ग़म,
कब होगा दर्द कम,
बिछड़ी देह का बाशिंदा,
बस टूटे स्वप्न सह रहा है,
बुन नहीं रहा,
और एक ये समय है कि,
बस कह रहा है,
सुन नहीं रहा।

 

Thursday, March 18, 2021

स्कूल की अठखेलियों से,
तर बतर निकले थे हम,
खट्टी मीठी यादों के संग,
अरमां थे हमारे भी आसमानी,
बढ़ाना चाहते थे कदम,
पर पलक झपकते ही हम पर,
सज गयी थी फौजी वर्दी,
होने वाले थे अट्ठारह के हम;

कदम से कदम मिलाकर,
सीख गए कहीं भी आना जाना,
भूल गए एक पत्थर को,
स्कूल से घर तक ठोकरों से लाना;
चपाती की गोलाई भर कट गए बाल,
ऐसे शुरू हुआ अट्ठारहंवा साल,
जाना कि दुनिया सच में दिन में सोती है,
जाना कि सुबह चार बजे होती है,
भूल गए साम दाम, भूली ढिठाई भी 
यहाँ परेड भी की और की पढ़ाई भी,
भूले वो शामें, वो साइकिल भी,
यहीं पेन भी पकड़ी यहीं राइफल भी,
यूनिवर्सिटी का कहाँ नॉलेज हुआ,
ट्रेनिंग सेंटर ही हमारा कॉलेज हुआ;

अगले बीस साल हमारी जवानी रही,
पहले खाकी, फिर आसमानी और,
चितकबरी वर्दी की रवानी रही,
वो बिना रिजर्वेशन के डब्बे जनरल रेल के,
वो काला बक्सा, वो होल्डाल, वो दिन खेल के,
वो जगह जगह किराये के घर को सजाना,
वो बक्सों को जोड़ कर सोफा कम बेड बनाना,
वो भारत दर्शन का अंतहीन भ्रमण,
वो आगरा, मद्रास वो जामनगर,
बीकानेरी सेव, जम्मू का राजमा, हैदराबाद की गाली,
वो सफर में गुज़री होली और दिवाली;

न हुई कोई कोर्टशिप न की कभी डेटिंग,
बाहरी दुनिया में जीरो थी अपनी रेटिंग,
इसी जवानी में हुई हमारी शादी भी,
इसी में बढ़ाई हमने देश की एक आबादी भी,
लगता था रहते हैं चकाचौंध से बहुत दूर,
पर जो भी मिला उसको जिया हमने भरपूर,
कुछ भी हो लहू को नहीं दिया थमने भी,
इस तरह एक यौवन है जिया हमने भी। 


Tuesday, March 16, 2021

 वे सच हम खुद ही भूल गए,
जिन्हे समय पर बता न सके,
पर वे झूठ सच बन गए,
जिन्हें समय पर झुठला न सके;

लम्बी जद्दोज़हद के बाद ये जाना,
कि सच वही है, जो सब ने माना,
और ठहर जाता है पसर के,
झूठ भी, यदि पा जाए ठिकाना;

यदि समर्थ हैं हम अभिनय में,
तो हर मिथ्या के अर्थ हैं,
और यदि हैं जुड़े भावना से,
तो कुछ तथ्य बिल्कुल व्यर्थ हैं। 

Thursday, March 11, 2021

धंसे तीर से उपजा नीर ही सही,
कामना भी कुछ अधीर ही सही,
ये भी हासिल नहीं अधिकतर को,
प्रेम न बन सके तो पीर ही सही;

 

Tuesday, March 9, 2021

ये जो रह रह कर,
तुम्हारी कमर पकड़ लेती है,
और जिसे आमतौर पर,
सब बताते हैं,
स्लिप डिस्क के,
दूरगामी परिणाम,
ये असल में नतीजा है,
मैले हुए,
उन दिमागी चिंताओं का,
जिन्हें तुमने धोया नहीं,
उन बोझों का,
जिससे बचकर निकल गए तुम,
कभी ढोया नहीं।

 

Tuesday, March 2, 2021




कितने ही लोग मिलेंगे,
बांटने को सवेरे,
पर ढोने पड़ते हैं खुद ही,
अपने हिस्से के अँधेरे ....

 

Saturday, February 13, 2021

बचपने से ज्ञान को था बुद्धि पर मढ़ता रहा,
दर्शनों को बूझता और पुस्तकें पढ़ता रहा,
वेग लेकिन बाँध से जब भी कभी अड़ता रहा,
तब ह्रदय अविरुद्ध होकर बुद्धि से लड़ता रहा;

युद्ध भी और बुद्ध भी सब स्वयं का व्यवहार है,
जो मिला जीवन में वो व्यवहार का ही सार है,
एक नादानी का आलम आग सा तपता रहा,
कालिखेँ लगती गयीं और शोर भी बढ़ता रहा;

समय यूँ तो हर सितम का स्वयं ही उपचार है,
किन्तु पश्चाताप पर भी समय का अधिकार है,
बारिशों की रहमतों से ताप भी बुझता रहा,
कालिख़ें तो धुल गयीं लेकिन धुआं उठता रहा;

जो चमक है पुतलियों में हर्ष का अभिमान है,
वेदना भी किन्तु बीते हर्ष का परिणाम है,
कुछ परस्पर वेदना में ह्रदय था बंटता रहा,
झुर्रियाँ बढ़ती रहीं और केश था घटता रहा;

​द्वन्द में तो बुद्धि का भी क्रुद्ध होना आम है,​
​किन्तु मन की भावना भी चेतना का नाम है,​
क्रोध चाहे हर घड़ी अवरोध ही गढ़ता रहा,
बोध लेकिन हर विषम में सूर्य सा चढ़ता रहा;

 

Thursday, February 4, 2021

जेठ की दुपहरी में भी,
लू से दोस्ती की है,
नीम के आँचल तले,
छाँव से मसख़री की है,
तेरे हर ज़ुल्म पर शरारत की है,
ज़िंदगी तुझसे इतनी मोहब्बत की है;

सूख गयी थी आँखें फिर भी,
पलकों ने हिमाकत की है,
बन्द नज़र कर के हमने,
क़ैद पर रियायत की है,
क्या हुआ जो तुमने सियासत की है,
ज़िंदगी तुझसे इतनी मोहब्बत की है;

कलह  की ठंडी दीवारों पर,
आस की कढ़ाई की है,
तुमने जितना कसा हमको,
हमने उतनी ढिलाई की है,
वक़्त से भी कब शिकायत की है,
ज़िंदगी तुझसे इतनी मोहब्बत की है;


 

Friday, January 29, 2021

 

गरीबी लिखी, बेबसी लिखी,
लिखी तड़प, मायूसी लिखी,
लिखा दरिंदगी पर, अत्याचार पर,
समाज का बौनापन, व्यभिचार पर,
कुपोषण पर, विरोधी अधिवेशन पर,
नाकाबिल सरकार पर, शोषण पर,
बीमारी पर, और बेरोज़गारी पर,
पर क्यों नहीं लिखते कुछ सदाचारी पर,
काँटों की गलियों में पुष्प के व्यापारी पर,
क्यों नहीं लिखते वात्सल्य पर, करुणा पर,
या खुद को समर्पित करती वरुणा पर,
अमृत दोहन पर, प्रेम सम्मोहन पर,
कुछ तो लिखो मोहन पर,
कभी शाबाश भी लिखो, उल्लास लिखो,
कभी अभिलाश, कभी पलाश लिखो,
चलो कुछ हर्ष लिखो, ख़ुशी की लहर लिखो,
​कब तक लिखोगे रात, अब कुछ सहर लिखो। ​

Thursday, January 28, 2021

यादों के लिहाफ़ में जाड़ा कम न हुआ,​
​ओस में भीगते रहे, ज़ुदा ग़म न हुआ;

इसी आस में कि जियेंगे कभी अपने लिए,
हमने रुतबे भी सहे, घूँट गरल के पिए;

यूँ तो महफ़िलों में शामिल हम भरपूर हुए,
जितना सब से मिले उतना खुद से दूर हुए,

अब फ़क़त एक ख़्वाहिश रह गयी दिल में,
भूल न जाऊं स्वयं को अब मैं मुश्किल में;

खुद की खुद से ही बहुत मज़बूरियाँ रहीं,
शायद इसलिए जीवन भर ऐसी दूरियाँ रहीं।

 

Sunday, January 24, 2021

रास्ते वो घूरते हैं, जो चले थे साथ,
अब तो बस उस राह का आयाम रह गया;
 
अरमानों पर किया था तुमने इस कदर कब्ज़ा,
दिल से तो निकले मगर कोहराम रह गया;

​कब ये चाहा था कि बदनामी से हो शोहरत, ​
​बरी हुए इल्ज़ामों से हम, पर नाम रह गया;​

तुम तो कहते थे उतर जाएगा ये नशा,
पर हमारे हाथ अंतिम जाम रह गया;

अब खुली आँखें हैं लेती यादों की करवट,
भूलते कैसे, जब भूल का अंजाम रह गया;

 

वो हवा फिर लौट के घर जा न सकी,
जो इक जलता चराग बुझा न सकी;

उस चराग की लौ में पढ़ रहा था बच्चा,
चाह कर भी उसे वहाँ से हटा न सकी;

सिल रही थी उस उजाले में फटी चादर,
वह माँ जो कभी सर को झुका न सकी;

हिम्मत उनकी देख कर विषमताओं में,
हवा खुद का वेग ज़रा भी बढ़ा न सकी;

मोड़ लिया रुख हौसलों की कदर् में,
उस हवा ने जो कभी शरमा न सकी;

क्या कहेगी लोग पूछेंगे नतीजा,
इसलिए वह लौट के घर जा न सकी;

 

Friday, January 22, 2021

पुरानी चोटों का दर्द,
जोड़ों में इकठ्ठा हो जाता है,
और अँधेरे दिनों में,
धीरे धीरे रिसता है,
जैसे बीती बरसात का,
छत पर जमा पानी,
कमरे में बेमौसम,
टप टप टपकता है;
पर ये कोई अभिशाप नहीं है,
कोई सज़ा, कोई पश्चाताप भी नहीं,
कुछ पाने या खोने का,
उल्लास या संताप भी नहीं,
ये तो बस,
समय का सिद्धान्त है,
किन्ही गुज़री घटनाओं का,
उपरान्त है,
कोई बहुत बड़ी सीख या टीस नहीं,
ये तो बस,
एक यात्रा का वृत्तान्त है;

 

Wednesday, January 20, 2021

जहाँ अक्सर अपेक्षाओं का प्रवास होगा,
वहाँ कब तक ख्वाहिशों का निवास होगा;

कितने ही रोज़ महज़ पानी पर निकले,
और हम ये समझते रहे कि उपवास होगा;

आदतन फिर से हाथ बँध गए अपने,
जैसे डर था कि कोई आसपास होगा;

तुमसे कहने की तारीख मुक़र्रर की थी,
कब ये जाना था कि सफर में अवकाश होगा;

यही सोच सजाते रहे, लफ़्ज़ हम करीने से,
गज़ल हो न हो, लिखने का अभ्यास होगा;
 
सिमट गयी है कहानी दो ही पन्नों में,
और सब सोच रहे थे कि उपन्यास होगा;

इस चौखट को लगाते हुए कहाँ सोचा था,
कि जल्द ही इसी दरवाज़े से निकास होगा;

 

Monday, January 18, 2021

जो स्थिर था, पानी सा कहीं बह गया,
फिर जो वक़्त ने परोसा, सब सह गया,
सुना था वेदना की भी उम्र होती है पर,
वह जो अस्थिर था, बस वही रह गया।

 

Monday, January 11, 2021

Those days of sprints,
when the route was never treacherous,
and the path left enough hints,
and while time has overshadowed it,
with its fog and mist,
but if you can see through them,
you will still find the footprints.

 

Saturday, January 9, 2021

बताई है लोगों ने,
अपने संघर्षों की कहानी,
कभी आलेखों में,
कभी मुहँज़बानी;
वह बिजनेसमैन,
जिसने शुरू किया था एक दुकान से,
आज कई कंपनियों का मालिक है,
आज एकत्रित धन दौलत,
उन संघर्षों का परिणाम है;
वह खिलाड़ी,
निकला था गलियों से,
आज देश की शान है,
आज उसका रुतबा,यश,कीर्ति,
उसकी  ज़िंदगी भर की,
मेहनत का अंजाम है;
वह स्कॉलर,
बुद्धिजीवियों में जिसका नाम है,
बरसों की तपस्या,
लगन, जिज्ञासा से,
अर्जित किये हुए ज्ञान से,
जिसका सम्मान है;
और न जाने कितने ही लोग,
सफल हुए हैं,
अपने आदर्शों से,
जीवन के संघर्षों से;
ये संघर्षों की दुनिया है,
और इन संघर्षों को मापने के,
हमारे अपने मापदंड हैं,
जो अक्सर,
धन, दौलत, यश, कीर्ति,
सफलता, स्वास्थ्य,
और बुद्धि तक सीमित हैं,
पर कुछ और भी लोग हैं,
जो धन दौलत से अनजान हैं,
यश कीर्ति से कोसों दूर हैं,
बेशक इनके नाम नहीं हैं,
पर खुद में,
ये भी भरपूर हैं;
हम अक्सर भूल जाते हैं,
उस एक वर्ग को,
जिसका आज ज़िंदा बचा होना ही,
उसका अभिमान है,
और दुनिया में महज़ मौज़ूदगी ही,
उसके संघर्षों से उबरने की ,
पहचान है।

 

Wednesday, January 6, 2021

राह चलते मिल गए वो,
हमने पूछा जी कहाँ ?
उत्तर में वो पूछ बैठे,
तुम बताओ, तुम कहाँ;

​पुत्र को जब माँ ने पूछा,
चले कहाँ हो? शीघ्र आओ,
उत्तर में वह पूछ बैठा,
काम क्या है ये बताओ;​

​​कर्मचारी ने जो पूछा,
देख गड़बड़ कागज़ों से,
जानना है क्यों तुम्हें यह,
उत्तर आया अफसरों से;

किन्तु यह सब आम है अब,
प्रश्न ही अब सूझते हैं,
जो सदा थे मूक रहते,
प्रश्न वह भी पूछते हैं;

जो कलाई पर है रहती,
हर मिनट जो बूझती है,
क्या हुआ अच्छे समय को,
अब घड़ी यह पूछती है;

फूल कर आगोश में जो,
चुपड़ी घी में जश्न करती,
क्या तुम्हारी भूख हूँ मैं,
रोटियाँ अब प्रश्न करतीं :

रास्ते स्थिर थे रहते,
किन्तु अब भ्रम खा गए हैं,
चलते चलते पूछ बैठे,
ये कहाँ हम आ गए हैं ;

हम स्वयं भी उत्तरों के,
प्रश्न होकर रह गए हैं,
जो महल थे स्वप्न में वो,
रास्तों में ढह गए हैं;

प्रश्न हैं अब बोलियों में,
प्रश्न का समुदाय है,
प्रश्न ही हैं उत्तरों में,
प्रश्न ही अभिप्राय है ;