Sunday, July 31, 2011

ज़रा मुश्किल है

ज़रा मुश्किल है,
पर संभव है,
भटके वादों में,
बिखरी यादों में,
उलझे रस्तों में,
बंद पड़े बस्तों में,
सूखी आँखों में,
बुझती साँसों में,
बहकी बातों में,
जगती रातों में,
खिलखिलाकर हँसना,
ज़रा मुश्किल है,
पर संभव है.

inspired by Neeraj Mala Sharma's creation,चलना ही है काम निरंतर.

तुम चलते हो तेज़ मैं आगे धीरे थोड़ा बढ़ता हूँ,
तुम पहुंचे फुनगी पर, मैं डाली डाली चढ़ता हूँ,
तुझमे मुझमे थोड़ा सा स्वाभाविक है गति का अंतर,
चलना ही है काम निरंतर.

न ही कविता सार बचा अब, न ही बचा कोई भवसागर;
जब से चलना सीखा तूने, छलकाती जाती है गागर,
मेरे क़दमों में बांधा था काल ने कोई जैसे बाधक,
पर तेरी खनकाती पायल बना गयी मुझको इक साधक,
चलता हूँ मैं धीरे क्योंकि नहीं जानता कोई जंतर,
चलना ही है काम निरंतर..

चलते चलते नया है पाया, किन्तु पुराना खोता आया,
जिस पनघट की डगर कठिन है, वहीँ मोक्ष था हमने पाया,
प्राची का पट खुल न पाया, तम की लम्बी इतनी काया,
किन्तु हमारे प्रबल स्वरों ने, नया सूर्य कोई उगवाया,
कठिन सहज सब एक सा लगता, दूर हुए थे सारे अंतर,
चलना ही है काम निरंतर...

करूँ वंदना कैसे तेरी, तुम सुलझे हो, समझाओगे,
पर मैं भी इक ऐसा पागल, जैसा कहीं नहीं पाओगे,
अपनी अपनी रातें हैं ये, अपना ही है कोई सवेरा,
जब सब कुछ ही छोड़ है जाना, फिर तेरा क्या, क्या है मेरा,
पर जब तक जिंदा हूँ माते, मेरा भी है एक दिगंतर,
चलना ही है काम निरंतर...

Thursday, July 28, 2011

गज़ब निकली

सांझ की बरसात गज़ब निकली,
तुम जगे तो रात गज़ब निकली,
अरमानों की बातें करते हुआ सवेरा,
फिर मुरादों की बारात गज़ब निकली;

क्या हुआ की कसक अब भी बाकी है,
राख में दबी आग अब भी बाकी है,
एहसान तेरा फिर भी रहेगा मुझपर,
तेरे सौगातों की तादाद गज़ब निकली;

रहो या न रहो तुम, ये राहें रहेंगी,
चमकेंगे जुगनू, फिजायें रहेंगी,
बेशक चले साथ पल भर ही नीरज,
उस पल भर की झंकार गज़ब निकली...

अरमां कहाँ से लाओगे

कई दिनों से घर के अन्दर खटिया तोड़ रहा हूँ,
कुछ अनसुलझे प्रश्नों को मन ही मन जोड़ रहा हूँ,
रह रह कर के आशंकाओं के मच्छर मंडराते हैं,
फेंक किनारे उनको, मैं फिर ख़्वाबों को मोड़ रहा हूँ;

पहले कैसे भाग दौड़ में दिन यूँ ही कट जाते थे,
अच्छे और बुरे कर्मों को जांच कहाँ हम पाते थे,
अब चिंतन का समय मिला तो ग्लानि निरंतर होती है,
कितनी बुरी जगह थी वह, रोज़ जहाँ हम जाते थे;

कभी कभी ये व्यस्त सा जीवन सीख नई सिखलाता है,
जब चिंतन का समय न हो तो खटिया कोई दिखाता है,
वक़्त रहे तुम संभल लो प्यारे वरना फिर पछताओगे,
जब कल दिल ही नहीं रहेगा, अरमां कहाँ से लाओगे...



Tuesday, July 26, 2011

लहरों का पानी

बड़े अरसे से हवाओं में समंदर डोलते थे,
भिगो जाती थी लहरें, चक्षु पानी सोखते थे,
दिलों में टीस बनकर रेत की मानिंद यादें,
गुज़र जाती थी ज्यों ही मुट्ठियाँ हम खोलते थे;

नहीं अब कुछ बचा कि आया शायद ज़लज़ला होगा,
कहीं रेतों कि गहराई में औंधा मन दबा होगा,
किनारों से गुज़रती हैं हवाएं अब भी ऐ नीरज,
मगर लहरों का पानी आँख से शायद बहा होगा...

Sunday, July 17, 2011

क्यों ज़ुदा देखा

देखने को तो एक ही मंज़र था,
तेरी आँखों ने क्यों ज़ुदा देखा;

अपनी रातों की बात करते हो,
हमने दिन का भी फासला देखा;

ऐसा लगता था लौट आये हो,
घूम कर हमने आइना देखा;

आज़ दीवारें भी नहीं सुनती,
हमने फिर से नया मकां देखा;

जिंदगी एक सी नहीं रहती,
वक़्त ने वक़्त का सिला देखा;

Saturday, July 16, 2011

बूंदों का बहना स्वीकार करो.

फुहारों में रिमझिम बरसती,
या पेड़ों के,
मादक पत्तों से,
रिस रिस कर गिरती,
ये पानी की बूँदें हैं,
इनका मौसम से,
अपना सरोकार होता है,
और ज़रा गौर करेंगे तो,
हर बूँद का,
अपना आकार होता है...

बादलों से निकलती हैं,
तो बारिश बन जाती हैं,
अनुपात में गिरें तो जीवन,
वरना बहुत कहर ढाती हैं,
अधिक होने पर,
सैलाब आता है,
और हम आप कितना भी कर लें,
धरती का दर्द,
इन्हें सोख नहीं पाता है,
और यदि ये न बरसें,
तो जीवन कुछ यूँ पलता है,
जैसे ज़मीं की दरारों में
दिन रात कोयला जलता है...

कुछ ऐसी ही बूँदें हैं,
जो लोचनों में रहती हैं,
कभी पुतलियों में छलक आती हैं,
कभी गालों से होकर,
ज़रा चुपचाप बहती हैं,
पर ये मौसमी नहीं हैं,
कभी भी,
इनका आना हो सकता है,
इसलिए क्या आँखों से बेहतर,
इनका कोई ठिकाना हो सकता है..

ये भावनाओं को समझती हैं,
और सदा तैयार रहती हैं,
ये ग़मों को और खुशियों को,
इकट्ठा कर तरसती हैं,
और जब जिगर भर जाता है,
ये पलकों से बरसती हैं,
गालों से होकर जो टपक जाती हैं,
कभी कभी शर्म से,
खुद को आंसू बताती हैं,
कभी कभी हथेलियाँ,
इन्हें प्यार से रोप लेती हैं,
और हम मानते हैं,
की ये बूंदें नहीं मोती हैं...

ये सब के पास होती हैं,
बारिश की ही तरह,
गरीब अमीर नहीं सोचती हैं,
और आँखें बंद रखो या खुली,
ये अपना रास्ता खुद खोजती हैं,
कुछ लोग इन्हें रोक लेते हैं,
दिमागी शक्ति से टोक देते हैं,
तब ये कुछ मजबूर नज़र आती हैं,
आँखों से नहीं रिसती,
पर दिल में आंसुओं का,
तालाब बनाती हैं,
अज नहीं तो कल ये तालाब भरता है,
और तब कितनी भी कोशिश कर लें,
कहाँ कोई बाँध ठहरता है...

बारिश का धरती से,
जो अटूट रिश्ता है,
वही बंधन शरीर का,
आंसुओं से दिखता है,
इसलिए इन्हें मत रोको, बह जाने दो,
ये ख़त्म नहीं होते,
ज़रा सा दर्द तो और आने दो,
इसमें कोई शर्म नहीं, यह सदा से होता है,
इस धरती पर कभी न कभी,
हर शख्श रोता है,
इसलिए इन बूंदों का,
मत तिरस्कार करो,
खुश रहने के लिए हो या,
दिल के हल्केपन के लिए,
कभी कभी इन आँखों से,
बूंदों का बहना,
स्वीकार करो.

Thursday, July 14, 2011

मिश्रण iii

"We are what we think. All that we are arises with our thoughts. With our thoughts, we make the world."
हम विचारों से ही स्वयं को संजोते हैं,
विचारों से ही जगत के बीज बोते हैं,
और कितना भी बनावटी बनना चाहें हम,
हम वही होते हैं जो वास्तव में सोचते हैं ...
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The sun refuses to shine and the clouds refuse to rain,
Its a little dark but strangely no pain,
And whatever happens, i have everything to gain.....

न ही सूरज चमक पाता है, न बादल बरस पाते हैं,
तनिक तम ही सही पर आश्चर्य है,
अब दर्द के गुबार नहीं आते हैं,
और चाहे तुम चमको या बरसो मेरे मौला,
मेरे लिए ये महज़ तारों का टूटना है,
हम जो चाहते हैं वो पाते हैं...
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ह्रदय की रोशनी है, रात में अस्त नहीं होगी,
हौसलों की धाविका है, अब पस्त नहीं होगी,
वो गुज़रे ज़माने हैं जब हम हारा करते थे,
अब जीतें या न जीतें पर शिकश्त नहीं होगी;
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 तुम जो कह दो तो हर आह वाह लगती है;
मेरे सपनों में भी इक खोयी रात जगती है....
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आज सूरज बादलों की ओट से निकला और कुछ ही देर में फिर बादलों में ही खो गया; मैं चाहता हूँ की बरस कर ये बादल छंट जाएँ,  पर अगर ये न भी बरसे तब भी मुझे एहसास है की सूरज इनके ऊपर ही है...बादलों को चीर कर आती रोशनी इसका प्रतीक है; मखमली घास पर फुदक फुदक कर कुछ चुनती वह चिड़िया मुझे साफ़ दिखाई देती है..................
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जब कुछ जले तो धुआं होता है,
जब कुछ बुझे तो धुआं होता है,
दिलों की बात जो अक्सर करते थे,
वो चुप रहें तो धुआं होता है;
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हिन्दुस्तान मेरा था

तुम्हारे दर पे वो सारा सामान मेरा था,
गली के दायें से चौथा मकान मेरा था,
और तुम जिसे कहते हो पाक़ मुल्क हुज़ूर,
पुराने वक़्त में हिन्दुस्तान मेरा था;

आज तुम मानवता की सारी मिसाल भूल गए,
पडोसी होकर के अपनी दीवार भूल गए,
हमें देखकर नुक्लिअर होना याद रहा,
हम सब का एक ही 'परवरदिगार' भूल गए;