कई दिनों से घर के अन्दर खटिया तोड़ रहा हूँ,
कुछ अनसुलझे प्रश्नों को मन ही मन जोड़ रहा हूँ,
रह रह कर के आशंकाओं के मच्छर मंडराते हैं,
फेंक किनारे उनको, मैं फिर ख़्वाबों को मोड़ रहा हूँ;
पहले कैसे भाग दौड़ में दिन यूँ ही कट जाते थे,
अच्छे और बुरे कर्मों को जांच कहाँ हम पाते थे,
अब चिंतन का समय मिला तो ग्लानि निरंतर होती है,
कितनी बुरी जगह थी वह, रोज़ जहाँ हम जाते थे;
कभी कभी ये व्यस्त सा जीवन सीख नई सिखलाता है,
जब चिंतन का समय न हो तो खटिया कोई दिखाता है,
वक़्त रहे तुम संभल लो प्यारे वरना फिर पछताओगे,
जब कल दिल ही नहीं रहेगा, अरमां कहाँ से लाओगे...
कुछ अनसुलझे प्रश्नों को मन ही मन जोड़ रहा हूँ,
रह रह कर के आशंकाओं के मच्छर मंडराते हैं,
फेंक किनारे उनको, मैं फिर ख़्वाबों को मोड़ रहा हूँ;
पहले कैसे भाग दौड़ में दिन यूँ ही कट जाते थे,
अच्छे और बुरे कर्मों को जांच कहाँ हम पाते थे,
अब चिंतन का समय मिला तो ग्लानि निरंतर होती है,
कितनी बुरी जगह थी वह, रोज़ जहाँ हम जाते थे;
कभी कभी ये व्यस्त सा जीवन सीख नई सिखलाता है,
जब चिंतन का समय न हो तो खटिया कोई दिखाता है,
वक़्त रहे तुम संभल लो प्यारे वरना फिर पछताओगे,
जब कल दिल ही नहीं रहेगा, अरमां कहाँ से लाओगे...
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