Friday, January 29, 2021

 

गरीबी लिखी, बेबसी लिखी,
लिखी तड़प, मायूसी लिखी,
लिखा दरिंदगी पर, अत्याचार पर,
समाज का बौनापन, व्यभिचार पर,
कुपोषण पर, विरोधी अधिवेशन पर,
नाकाबिल सरकार पर, शोषण पर,
बीमारी पर, और बेरोज़गारी पर,
पर क्यों नहीं लिखते कुछ सदाचारी पर,
काँटों की गलियों में पुष्प के व्यापारी पर,
क्यों नहीं लिखते वात्सल्य पर, करुणा पर,
या खुद को समर्पित करती वरुणा पर,
अमृत दोहन पर, प्रेम सम्मोहन पर,
कुछ तो लिखो मोहन पर,
कभी शाबाश भी लिखो, उल्लास लिखो,
कभी अभिलाश, कभी पलाश लिखो,
चलो कुछ हर्ष लिखो, ख़ुशी की लहर लिखो,
​कब तक लिखोगे रात, अब कुछ सहर लिखो। ​

Thursday, January 28, 2021

यादों के लिहाफ़ में जाड़ा कम न हुआ,​
​ओस में भीगते रहे, ज़ुदा ग़म न हुआ;

इसी आस में कि जियेंगे कभी अपने लिए,
हमने रुतबे भी सहे, घूँट गरल के पिए;

यूँ तो महफ़िलों में शामिल हम भरपूर हुए,
जितना सब से मिले उतना खुद से दूर हुए,

अब फ़क़त एक ख़्वाहिश रह गयी दिल में,
भूल न जाऊं स्वयं को अब मैं मुश्किल में;

खुद की खुद से ही बहुत मज़बूरियाँ रहीं,
शायद इसलिए जीवन भर ऐसी दूरियाँ रहीं।

 

Sunday, January 24, 2021

रास्ते वो घूरते हैं, जो चले थे साथ,
अब तो बस उस राह का आयाम रह गया;
 
अरमानों पर किया था तुमने इस कदर कब्ज़ा,
दिल से तो निकले मगर कोहराम रह गया;

​कब ये चाहा था कि बदनामी से हो शोहरत, ​
​बरी हुए इल्ज़ामों से हम, पर नाम रह गया;​

तुम तो कहते थे उतर जाएगा ये नशा,
पर हमारे हाथ अंतिम जाम रह गया;

अब खुली आँखें हैं लेती यादों की करवट,
भूलते कैसे, जब भूल का अंजाम रह गया;

 

वो हवा फिर लौट के घर जा न सकी,
जो इक जलता चराग बुझा न सकी;

उस चराग की लौ में पढ़ रहा था बच्चा,
चाह कर भी उसे वहाँ से हटा न सकी;

सिल रही थी उस उजाले में फटी चादर,
वह माँ जो कभी सर को झुका न सकी;

हिम्मत उनकी देख कर विषमताओं में,
हवा खुद का वेग ज़रा भी बढ़ा न सकी;

मोड़ लिया रुख हौसलों की कदर् में,
उस हवा ने जो कभी शरमा न सकी;

क्या कहेगी लोग पूछेंगे नतीजा,
इसलिए वह लौट के घर जा न सकी;

 

Friday, January 22, 2021

पुरानी चोटों का दर्द,
जोड़ों में इकठ्ठा हो जाता है,
और अँधेरे दिनों में,
धीरे धीरे रिसता है,
जैसे बीती बरसात का,
छत पर जमा पानी,
कमरे में बेमौसम,
टप टप टपकता है;
पर ये कोई अभिशाप नहीं है,
कोई सज़ा, कोई पश्चाताप भी नहीं,
कुछ पाने या खोने का,
उल्लास या संताप भी नहीं,
ये तो बस,
समय का सिद्धान्त है,
किन्ही गुज़री घटनाओं का,
उपरान्त है,
कोई बहुत बड़ी सीख या टीस नहीं,
ये तो बस,
एक यात्रा का वृत्तान्त है;

 

Wednesday, January 20, 2021

जहाँ अक्सर अपेक्षाओं का प्रवास होगा,
वहाँ कब तक ख्वाहिशों का निवास होगा;

कितने ही रोज़ महज़ पानी पर निकले,
और हम ये समझते रहे कि उपवास होगा;

आदतन फिर से हाथ बँध गए अपने,
जैसे डर था कि कोई आसपास होगा;

तुमसे कहने की तारीख मुक़र्रर की थी,
कब ये जाना था कि सफर में अवकाश होगा;

यही सोच सजाते रहे, लफ़्ज़ हम करीने से,
गज़ल हो न हो, लिखने का अभ्यास होगा;
 
सिमट गयी है कहानी दो ही पन्नों में,
और सब सोच रहे थे कि उपन्यास होगा;

इस चौखट को लगाते हुए कहाँ सोचा था,
कि जल्द ही इसी दरवाज़े से निकास होगा;

 

Monday, January 18, 2021

जो स्थिर था, पानी सा कहीं बह गया,
फिर जो वक़्त ने परोसा, सब सह गया,
सुना था वेदना की भी उम्र होती है पर,
वह जो अस्थिर था, बस वही रह गया।

 

Monday, January 11, 2021

Those days of sprints,
when the route was never treacherous,
and the path left enough hints,
and while time has overshadowed it,
with its fog and mist,
but if you can see through them,
you will still find the footprints.

 

Saturday, January 9, 2021

बताई है लोगों ने,
अपने संघर्षों की कहानी,
कभी आलेखों में,
कभी मुहँज़बानी;
वह बिजनेसमैन,
जिसने शुरू किया था एक दुकान से,
आज कई कंपनियों का मालिक है,
आज एकत्रित धन दौलत,
उन संघर्षों का परिणाम है;
वह खिलाड़ी,
निकला था गलियों से,
आज देश की शान है,
आज उसका रुतबा,यश,कीर्ति,
उसकी  ज़िंदगी भर की,
मेहनत का अंजाम है;
वह स्कॉलर,
बुद्धिजीवियों में जिसका नाम है,
बरसों की तपस्या,
लगन, जिज्ञासा से,
अर्जित किये हुए ज्ञान से,
जिसका सम्मान है;
और न जाने कितने ही लोग,
सफल हुए हैं,
अपने आदर्शों से,
जीवन के संघर्षों से;
ये संघर्षों की दुनिया है,
और इन संघर्षों को मापने के,
हमारे अपने मापदंड हैं,
जो अक्सर,
धन, दौलत, यश, कीर्ति,
सफलता, स्वास्थ्य,
और बुद्धि तक सीमित हैं,
पर कुछ और भी लोग हैं,
जो धन दौलत से अनजान हैं,
यश कीर्ति से कोसों दूर हैं,
बेशक इनके नाम नहीं हैं,
पर खुद में,
ये भी भरपूर हैं;
हम अक्सर भूल जाते हैं,
उस एक वर्ग को,
जिसका आज ज़िंदा बचा होना ही,
उसका अभिमान है,
और दुनिया में महज़ मौज़ूदगी ही,
उसके संघर्षों से उबरने की ,
पहचान है।

 

Wednesday, January 6, 2021

राह चलते मिल गए वो,
हमने पूछा जी कहाँ ?
उत्तर में वो पूछ बैठे,
तुम बताओ, तुम कहाँ;

​पुत्र को जब माँ ने पूछा,
चले कहाँ हो? शीघ्र आओ,
उत्तर में वह पूछ बैठा,
काम क्या है ये बताओ;​

​​कर्मचारी ने जो पूछा,
देख गड़बड़ कागज़ों से,
जानना है क्यों तुम्हें यह,
उत्तर आया अफसरों से;

किन्तु यह सब आम है अब,
प्रश्न ही अब सूझते हैं,
जो सदा थे मूक रहते,
प्रश्न वह भी पूछते हैं;

जो कलाई पर है रहती,
हर मिनट जो बूझती है,
क्या हुआ अच्छे समय को,
अब घड़ी यह पूछती है;

फूल कर आगोश में जो,
चुपड़ी घी में जश्न करती,
क्या तुम्हारी भूख हूँ मैं,
रोटियाँ अब प्रश्न करतीं :

रास्ते स्थिर थे रहते,
किन्तु अब भ्रम खा गए हैं,
चलते चलते पूछ बैठे,
ये कहाँ हम आ गए हैं ;

हम स्वयं भी उत्तरों के,
प्रश्न होकर रह गए हैं,
जो महल थे स्वप्न में वो,
रास्तों में ढह गए हैं;

प्रश्न हैं अब बोलियों में,
प्रश्न का समुदाय है,
प्रश्न ही हैं उत्तरों में,
प्रश्न ही अभिप्राय है ;