पीली सरसों थी यूँ फूली,
जैसे प्रियतम का तेज़ मिला,
प्यासी माटी थी यूँ उपजी,
ऊसर में जैसे धान खिला,
बिखरा था इत्र हवाओं में,
जैसे मनमोहक ज्ञान मिला,
कैसे वह सीना तान चले,
तगमे का जैसे मान मिला,
फिर फेर हुआ ऐसे कैसे,
क्या कोई सुनामी आया था,
क्या कांपी थी धरती मनवा,
या फिर बैरागी आया था,
ये वेग चला और पेंग बढ़ा,
झूले पर काबू नहीं मिला,
पलकें आंधी में यूँ झूली,
नयनों में सोता स्वप्न हिला..
जैसे प्रियतम का तेज़ मिला,
प्यासी माटी थी यूँ उपजी,
ऊसर में जैसे धान खिला,
बिखरा था इत्र हवाओं में,
जैसे मनमोहक ज्ञान मिला,
कैसे वह सीना तान चले,
तगमे का जैसे मान मिला,
फिर फेर हुआ ऐसे कैसे,
क्या कोई सुनामी आया था,
क्या कांपी थी धरती मनवा,
या फिर बैरागी आया था,
ये वेग चला और पेंग बढ़ा,
झूले पर काबू नहीं मिला,
पलकें आंधी में यूँ झूली,
नयनों में सोता स्वप्न हिला..