Monday, October 31, 2011

फेर हुआ ऐसे कैसे

पीली सरसों थी यूँ फूली,
जैसे प्रियतम का तेज़ मिला,
प्यासी माटी थी यूँ उपजी,
ऊसर में जैसे धान खिला,
बिखरा था इत्र हवाओं में,
जैसे मनमोहक ज्ञान मिला,
कैसे वह सीना तान चले,
तगमे का जैसे मान मिला,
फिर फेर हुआ ऐसे कैसे,
क्या कोई सुनामी आया था,
क्या कांपी थी धरती मनवा,
या फिर बैरागी आया था,
ये वेग चला और पेंग बढ़ा,
झूले पर काबू नहीं मिला,
पलकें आंधी में यूँ झूली,
 नयनों में सोता स्वप्न हिला..

Sunday, October 30, 2011

दिवाली

धमाकों का शोर शांत हुआ,
दीयों ने छोड़ा दिल जलाना,
हुई हैं रातें फिर से अपनी,
वही है जलता बल्ब पुराना,
क्या सोचा था, बदल जाएगा !
इक त्योहार से तेरा फ़साना ?


अब भी गरीब की बेबसी दिखती है,
जहाँ जहाँ भी नज़र गयी,
पर देखो कितनी मासूमियत से,
एक दिवाली और गुज़र गयी;

Thursday, October 20, 2011

असमंजस

जीवन में कुछ ऐसे भी बेबस से लम्हे आते हैं,
जब प्यारे से रिश्ते भी असमंजस बन जाते हैं,
जब आशंका की बदरी, अपना पुरज़ोर पकड़ती है,
तो साँसों की पुरवायी भी, कुछ थम थम कर चलती है,

ऐसे मौकों पर प्यारे तुम मायूसी में मत सोना,
थोड़ा कष्ट रहेगा पर तुम अपना संयम मत खोना,
सदा रहेगा साथ तुम्हारे, दिल से जिसका नाता है,
ऊँगली में यदि लगे चोट तो हाथ न काटा जाता है,

Friday, October 14, 2011

सब कुछ खो जाने पर भी

कल अपना था, आज पराया,
जब ये पचा न सको,
लाख कोशिशों के बाद भी,
जब कुछ बचा न सको,
तब भी बोझिल मत होना,
बेशक थोड़ा रो लेना,
पर साँसों को मत खोना,
जीवन में ऐसे मौके,
बस आते जाते रहते हैं,
रोज़ खिले हैं फूल यहाँ,
रोज़ कुम्हलाये रहते हैं,
जो आता है, जाएगा भी,
जो खोता है, पायेगा भी,
जो होनी है सो होनी है,
तब खोना कैसी अनहोनी है,
ऊपर बैठा करे तमाशा,
सारी श्रृष्टि रचा करता है,
पर सब कुछ खो जाने पर भी,
एक भविष्य बचा रहता है,

Wednesday, October 12, 2011

पतझड़ की तरह

वह सर्वस्व लुटा कर भी ऐतबार करता है,
कैसे कोई पतझड़ की तरह प्यार करता है,

ये आवाज़ भी यूँ रूह तक पहुँचती है,
जैसे कोई हमशक्ल इंतज़ार करता है,

जब वह न मिला तो उसका ग़म ही सही,
ऐसा इंसाफ़ भी परवरदिगार करता है,

ये फ़कत मौसम हैं, एक से नहीं रहते,
वो उम्मीदों में अपना श्रृंगार करता है,

ये कमजोरी नहीं, समझौता है 'नीरज',
किसी के दर से कोई क्यों गुहार करता है,

वो मिले, न मिले, या सवालों में रहे घिरकर,
जवाबों में क्या है, वो तो यूँ ही हिसाब करता है,

जब लुत्फ़ मिलने लगे सर्वस्व लुटाने में,
जान जाओगे कोई क्यूँ प्यार करता है...

Monday, October 3, 2011

कुछ तो कम है

जब भीड़ में भी आँखें शून्य ही निहारती हैं,
जब रातों की भागी नींद दिनों में सताती  है,
जब यादों में यादें ही बेबस पहचान भुलाती हैं,
जब पहचानी सी पदचापें अनायास रुलाती हैं,
तब कुछ तो ग़म है,
तब कुछ तो कम है !!!