वे दिन,
जो गर्मियों में पिघलते नहीं थे,
बारिशों में भीगते नहीं थे,
और कितनी भी बर्फ हो जीवन में,
ठंडियों में जमते नहीं थे,
वे दिन,
जिन्हे पैरों से नापा था,
जिन्हे बेमौसम गाता था,
जिनका मेरे जीवन से,
इंद्रधनुषी नाता था,
वे दिन,
जो अब न रहे,
पर कैद हैं स्मरण में,
कभी दस्तक दे जाते हैं,
किसी अनायास भ्रमण में,
वे दिन,
जिन्हें टाँग दिए थे डोरियों पर,
जेठ के महीने में,,
अब भी,आज भी,
आषाढ़ की तरह गीले हैं।