Tuesday, March 22, 2022

 

बढ़ता हुआ भाव, घटता हुआ चाव,
न रहेगा ही ताव, न कोई हरा घाव, 
जब तक खुलेगी आँख, दो ही बचेंगे,
एक बिलखती नदी, एक टूटी हुई नाव

 

Monday, March 21, 2022

 

यूँ अनगिनत
विचारों की अमिता,
या शब्दों को
सजाने की रमिता,
साहित्य के
गोद की बबिता,
या उकेरती
समाज की पतिता,
दीवार के
उस पार की हरिता,
या कुछ अनछुए
भावों की रचिता,
मात्र कागज़ पर
भावों की सरिता,
या तिमिर में
जुगनू की सविता,
आखिर क्या होती है कविता?

 

Thursday, March 17, 2022

 

कोई खूब गुलाल अबीर बना, कोई खाली बर्तन रुसवाई,
कोई पिचकारी है पीतल की, कोई सरकारी नल दुखदायी,
हमने स्तर के अंतर से, नायाब से तोहफे थोपे हैं,
इन त्योहारों की जकड़न में, कोई रंग बना कोई परछाई।

 

Wednesday, March 9, 2022

 

जब खाली हो जाए तुम्हारा तरकश
तीरों से,
फिर भी घाव न कर पाए हों
मन मुताबिक़,
तब सोचना कि गलत था क्या निशाना,
या जादू था किसी के मरहम का;

जब व्यर्थ लगे इन राहों की लकीरें,
और अर्थ न मिल पाए
 सृजन का,
तब तुम शब्द बन जाना,
और यूँ ही
 हवा में लहराना,

हवा में लहराते विभिन्न शब्द,
मिलकर कभी
वाक्य बन जाएंगे,
राहों की गणित शायद
फिर भी न हो मुमकिन,
पर कुछ शब्दों के अर्थ निकल आएंगे ;

 

 

चर्चा होगी जब भाषा की, तब ये ज़िक्र में आएंगे,
बात करेंगे तरकश की, या मरहम कभी लगाएंगे,
नहीं कमाया ऐसा कुछ भी, जिससे कोई याद करे, 
मिट जाएंगे हम खुद भी, ये शब्द मगर रह जाएंगे। 

 

Tuesday, March 8, 2022

 

कुछ शब्द कभी झकझोर गए,
कुछ रस खट्टा सा निचोड़ गए,
कुछ शब्द रह गए होंठों तक,
कुछ जुड़ते जुड़ते तोड़ गए।

कुछ शब्द बने हमसाया से,
कुछ वक़्त पर हुए ज़ाया से,
कुछ शब्द जो निकले तरकश से,
कुछ अपने हुए पराया से।

कुछ शब्द भले ही कच्चे हैं,
कुछ लेकिन अब भी सच्चे हैं,
कुछ खुद अर्थों में सीमित हैं,
कुछ शब्द मूक ही अच्छे हैं।

 

Monday, March 7, 2022

 

 

कभी भरी आँखें,
कभी पेट खाली,
दिलो दिमाग पर,
बोझा भारी,
लंबा रास्ता,
सब्र की सवारी,
पलकों की हया,
आँचल की किनारी,
ख्वाबों में जुगनू,
उम्मीदें ढेर सारी,
....... नारी !!