कुछ शब्द कभी झकझोर गए,
कुछ रस खट्टा सा निचोड़ गए,
कुछ शब्द रह गए होंठों तक,
कुछ जुड़ते जुड़ते तोड़ गए।
कुछ शब्द बने हमसाया से,
कुछ वक़्त पर हुए ज़ाया से,
कुछ शब्द जो निकले तरकश से,
कुछ अपने हुए पराया से।
कुछ शब्द भले ही कच्चे हैं,
कुछ लेकिन अब भी सच्चे हैं,
कुछ खुद अर्थों में सीमित हैं,
कुछ शब्द मूक ही अच्छे हैं।
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