जब खाली हो जाए तुम्हारा तरकश
तीरों से,
फिर भी घाव न कर पाए हों
मन मुताबिक़,
तब सोचना कि गलत था क्या निशाना,
या जादू था किसी के मरहम का;
जब व्यर्थ लगे इन राहों की लकीरें,
और अर्थ न मिल पाए
सृजन का,
तब तुम शब्द बन जाना,
और यूँ ही
हवा में लहराना,
हवा में लहराते विभिन्न शब्द,
मिलकर कभी
वाक्य बन जाएंगे,
राहों की गणित शायद
फिर भी न हो मुमकिन,
पर कुछ शब्दों के अर्थ निकल आएंगे ;
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