Monday, August 19, 2024

 

 

शरीर के हर हिस्से से,
ये जो खून बहता आया है,
बह रहा है,
इसके छींटें हम सब पर हैं,
ये कह रहा है।

हम सब आधुनिक गिद्ध हैं,
मरने से पहले,
और उसके बाद भी,
हमने कुछ नहीं सोचा है,
बस जिस्म नोचा है।

हैवानियत का नंगा नाच,
अबला हो या कोई निर्दोष,
घूमती कोई बस में हो,
या हो गले में स्टेथोस्कोप,
इस नाच को चाहे जिसने किया है,
पर उसे मंच हमने ही दिया है। 

हमारी आत्मा पर पसरा अँधेरा है,
जो मोमबत्तियों की लौ में,
उजागर नहीं होगा,
चलते रहें जुलूसों में,
या बैठे रहें धरने पर,
अब हम ज़िंदा नहीं होते,
बेटियों के भी मरने पर।

हमने मार दिया है विश्वास को,
मार दिया है माँ के वात्सल्य,
बाप की आस को,
हमने मार दिया है संस्कार को,
मार दिया है करुणा,
या मनुष्य के आकार को,
पर धन्य हैं हम,
कि हमने ज़िंदा रखा है,
दरिंदगी को,
राक्षसों की रियासत को,
धन्य हैं हम,
हमने ज़िंदा रखा है,
मुर्दों की सियासत को।