Wednesday, May 26, 2021

जीवन खुद ही स्मृतियों की बारात है,
उसपर शिक्षक होना अद्भुत सौगात है,
यूँ रहा ये सफर तीन दशकों से अधिक,
पर लगता है मानो कल की ही बात है;

इस सफर में हम स्वयं ही पढ़े भी, पढ़ाया भी,
इस सफर में हम स्वयं ही सीखे भी, सिखाया भी;
सबसे अहम् किरदार किन्तु साथ रहा है आपका,
इस सफर में संग जिसके बढ़े भी, बढ़ाया भी;

ये नहीं ख़्वाहिश है कोई नाम अपना याद रक्खे,
ये भी नहीं कि छात्र कोई काम अपना याद रक्खे,
आँख लेकिन छलछला जाएँगी अपनी जब कभी,
इस सफर की सीख से कोई नई बुनियाद रक्खे;

 

वो सूरज का छिपना, अँधेरे का आना,
वो सूनी सड़क पर, था मिलना मिलाना,
वो दिल का धड़कना, वो हिम्मत के फेरे,
वो नीड़ों  की चुप्पी,  चिड़ियों के बसेरे ,
वो कहना बहुत कुछ, मगर कह न पाना
वो चलते हुए,  उँगलियों का छू जाना ,
वो बातें, वो होठों पर प्यारी सी थिरकन,
वो गीतों का आँगन, वो शब्दों की उलझन,
वो बादल के चलने से चंदा की झलकें,
वो हल्की सी सिहरन, वो सहमी सी पलकें,
ये उस शाम का एक हिस्सा है अब बस;
ज़िंदगी का मेरी एक किस्सा है अब बस।

 

Monday, May 24, 2021

हाल के बीते ज़माने, शौर्य से भरपूर थे,
और अपने कारनामे, शहर में मशहूर थे;

भूल बैठे थे समय में समय की जादूगरी को,
सोचते तन मन भी अपने शस्त्र से तैमूर थे;

परचम भी फहरा रहा था, गर्व के ऊँचे शिखर पर,
कुछ असर था खून का, कुछ हम नशे में चूर थे;

थम गए लेकिन वहीँ पर, जब ली करवट वक़्त ने,
थीं भुजाएं साथ पर हम पैरों से मज़बूर थे;

व्यर्थ सा लगने लगा है, जो मिला था राह में,
रह गए हम उतने, जितने वक़्त को मंज़ूर थे;


 

Friday, May 21, 2021

आने वाला है वो समय,
तुम बनाओगी अपना जग,
अपने मज़बूत हाथों से,
उम्मीदों की हवेली पर;

पर कैसे भुला दूँ जब,
समेट लेती थी सारा जग मेरा,
तुम्हारी नन्ही उँगलियाँ ,
उस छोटी सी हथेली पर।

 

Tuesday, May 18, 2021

गर्व था मुझे अपनी पोशाक पर,
झूलने के तेवर पर, मंशा पाक पर,
फूल सरीखे जेवर, उनकी खुराक पर,
गर्व था मुझे अपनी ही शाख पर;

कुदरत भी कैसी जागीर लिखता है,
जिस पर गर्व किया वही बिकता है,
ढक लिया था जिसे पोशाक ने मेरी,
अब वह सारा आसमान दिखता है ;

 

Monday, May 17, 2021

अब तूफान की सूचना तूफान आने से पहले मिल जाती है। समय रहता है कि ऐसे प्रयास किये जाएं कि कम से कम जान माल की क्षति हो; या इतनी तैयारी हो कि नुकसान वाली स्थिति को जल्द से जल्द सामान्य किया जा सके।  हमारी सैटेलाइट अब समुद्र से बात कर सकती है और इतना अंदाजा लगा सकती है कि चक्रवात का मुँह किस तरफ को खुला है; कि उसके पैर किन रास्तों पर पड़ेंगे; कि किन रेतीले तटों में सुराख हो जाएगा; कि क्या डूब कर राख हो जाएगा।

हमने कोरोना की वैक्सीन बना दी; और कोरोना को रहने दिया ; मास्क बना दिए पर मुँह को खुला रखा ; सेनिटाइज़र बना दिए पर हथेलियां सूखी ही रहीं। पहले हमने अल्प को विस्तृत बनाया और विस्तृत हो जाने पर उसे अल्प ही रहने दिया। हमने डाटा बनाया भी और डाटा छिपाया भी ; ऑक्सीजन बनाई भी और जानें गँवाई भी। जलती चिता न पहले बात करती थी, न अब बात करती हैं।  इन्ही नदियों में राख भी बह  रही है और बह रहे हैं कुछ लावारिस भी। 

पता नहीं हमारा विज्ञान हमारी ज़रूरतों से जन्मा है या विज्ञान के जन्म के पश्चात हमारी ज़रूरतें बनायी गयी हैं। अद्भुत हैं हम और अद्भुत है हमारा विज्ञान; कितना कुछ जान गए हैं,कर रहे हैं......पर अरब सागर हो या ज़िंदगी, हम अब भी तूफानों को नहीं रोक पाते।

आने दो इन तूफानी हवाओं को भी..... शायद ये उन यादों को साथ ले जाएं जिनकी राख अभी ठंडी नहीं पड़ी....... उन वादों को भी जो पता लगा गलती से किये गए थे..... इस ज़िंदगी में।

 

Thursday, May 13, 2021

ये कहाँ आ गए हम,
ख़त्म होगा कैसे ग़म,
अपनों को देखते रहने,
की चाहत  में,
आज बेड पड़ गए कम,
उन  अस्पतालों में  ,
जिनसे सदा दूर रहते थे हम;​

एक इंजेक्शन की कीमत,
कई इंसानों से अधिक हो गयी,
जो ऑक्सीजन रिसती थी पीपल से,
वह सिलिंडर में बंद है,
ज़िंदगी बचाने की होड़ में,
जेब ही क्या, हिम्मत भी,
ऑक्सीजन विहीन हो गयी;

वहां आ गए हैं हम,
जहाँ से सृष्टि के अंत का,
आरम्भ है,
जीवन को हम अब,
खुदगर्ज़ी से परख रहे हैं,
जिन परदों से हम शर्म ढकते थे,
हवा और रौशनी भी,
​उन्ही से ​ढक रहे हैं।

 

Wednesday, May 12, 2021

इन दिनों रोज़ शाम को छत से डूबते सूरज को निहार लेता हूँ ; पश्चिमी भारत के इस भाग में अँधेरा जल्दी नहीं होता पर यूँ भी कौन चाहता है कि जल्दी अँधेरा हो जाए।  दिन भर घर के अंदर ही घर और ऑफिस खुला रहता है ; रोज़ के आँकड़ों के बीच कितनी ही कामनायें जीवित रहती हैं।  कितनी ही सड़कों का दम  घुट गया है इन दिनों क्यूंकि कोई गंतव्य नज़र नहीं आ रहा। पर गंतव्य तो होगा वरना क्यों रोज़ सूरज मेरी छत से आता जाता दीखता है। क्यों कबूतर अब भी अँधेरा होने से पहले बैठ जाते हैं अपने उन चिर परिचित स्थानों पर; क्यों सांझ होते ही बयार अपने अंदाज़ में बहने लगती है ; क्यों पश्चिम का आकाश फिर से नारंगी हो जाता है ; गंतव्य तो होगा ; नज़र आये शायद एक और रात के बाद , नज़र आये शायद अगली सुबह में।

उम्मीद एक ऐसा गहना है जिसे पहनो या न पहनो, शरीर उससे अलग कभी नहीं हो पाता ; हमारी आस्था प्रत्येक शाम घरों में होती आरती और तुलसी पर रखे दीये में सुरक्षित रहती है। हम शायद पहले से कहीं अधिक आध्यात्मिक हो गए हैं, और सहनशील भी। हमारा विश्वास है कि ये आंकड़े जल्द बदलेंगे और सड़कें फिर साँसें लेंगी ; विश्वास है हमें कि अस्पताल में जगह होगी और हम फिर भी वहाँ नहीं जायेंगे। विश्वास है हमें कि हमारी आशंकाओं पर जल्द विराम होगा और विश्वास है हमें कि मात्र ह्रदय में राम होगा। सूरज का डूबना ही उसके फिर से निकलने का संकेत है।  हर शाम अब विशेष है।

 

Monday, May 10, 2021

जब नहीं कोई हुनर था, तब नहीं कोई अहम् था,
साथ में विश्वास था तब, बचपना ही तब धरम था,
तब थे झगड़े क्षणिक होते, दो घड़ी में भूल जाते,
तू बड़ा या मैं बड़ा हूँ, तब नहीं कोई भरम था;

बुद्धि से लेकिन ये जाना, लिख पढ़े हम हो गए हैं,
पैर पर निर्भीक अपने, अब खड़े हम हो गए हैं,
कितना देखो बढ़ गया है, अब हमारा कार्य कौशल,
बचपना खुद सो गया , इतने बड़े हम हो गए हैं;

अब नहीं व्यवहार में, किंचित भी दिखता वह लड़कपन,
अब तो बस दिखती हैं कमियाँ, दूसरे में हमको छप्पन,
बात जो लगती थी भोली, लगती है अब तीखी छूरी,
इस सफर में किस तरह से आ गया हमको बड़प्पन;

कब गिरेगा बोझ भारी, यह अहम् जो ढो रहा है,
आज है एहसास इसका, आज फिर दिल रो रहा है,
मन है फिर से ढूंढ़ पाएं, द्वेष को रख कर किनारे,
नींद खुल जाए पुनः से, बचपना जो सो रहा है।