ये कहाँ आ गए हम,
ख़त्म होगा कैसे ग़म,
अपनों को देखते रहने,
की चाहत में,
आज बेड पड़ गए कम,
उन अस्पतालों में ,
जिनसे सदा दूर रहते थे हम;एक इंजेक्शन की कीमत,
कई इंसानों से अधिक हो गयी,
जो ऑक्सीजन रिसती थी पीपल से,
वह सिलिंडर में बंद है,
ज़िंदगी बचाने की होड़ में,
जेब ही क्या, हिम्मत भी,
ऑक्सीजन विहीन हो गयी;
वहां आ गए हैं हम,
जहाँ से सृष्टि के अंत का,
आरम्भ है,
जीवन को हम अब,
खुदगर्ज़ी से परख रहे हैं,
जिन परदों से हम शर्म ढकते थे,
हवा और रौशनी भी,
उन्ही से ढक रहे हैं।
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