Wednesday, January 17, 2018

वो, जो झरता है बातों से,
या मिलता है मुलाकातों से,
या छलकता है पैमानों की,
उन गुज़री हसीन रातों से,
वो जो रिसता है छत्तों से,
या बारिश में पत्तों से,
फूलों की छाती से,
या ख्वाबों की बाती से,
सब प्रेम से लस होता है,
और वास्तव में रस  होता है।

पर वह, जो सुनाई नहीं देता,
पर गूंजता रहता है हवाओं में,
यूँ तो दिखाई नहीं देता,
पर मौज़ूद रहता है फ़िज़ाओं में,

वह, जो कहते कहते,
होठों पर अटक जाता है,
और पलकों पर आने से पहले,
आँखों में ही भटक जाता है,
ये भी यूँ ही बरबस होता है,
पर सच,यह भी रस होता है।

​सूनी ह्रदय की नलियों में,
यही रस कभी जम जाता है,
उपाय करते हैं पिघलने का,
पर तब वक़्त थम जाता है,
कैसे बताऊँ तुम सब को,
तब छाती में दर्द सख़्त होता है,​
ये महज़ समय समय की बात है,,
वरना नीरस तो बस वक़्त होता है।

Monday, January 1, 2018

चूल्हा वही, बिजली वही, पानी वही,
दूध रख बिसर जाने की नादानी वही;
सूरज वही, जाड़ा वही, कोहरा वही,
मफलरों में काँपता चेहरा वही;

सड़कें वही, दफ्तर वही, गति भी वही;
वातावरण से श्वास की क्षति भी वही;
तुम भी वही, हम भी वही, जग भी वही;
औ धमनियों में बह रहा रंग भी वही;
जब दिन वही, शामें वही, रातें वही,
फिर क्या नया इस साल है, जब सब वही,
गम नहीं जो बिजली चूल्हा और है पानी वही,
कुछ नयी है भूख अपनी और नादानी नयी,
जाड़े कोहरे और सूरज से नहीं दुनिया वही,
जब हमारी सोच से है हृदय में गर्मी नयी,
चाहे हों सड़कें और दफ्तर और चाहे गति वही,
है नया कुछ रोज़ करना, दिल में कुछ चाहत नयी,

बेशक हैं हम तुम और अपने रक्त की रंगत वही,
पर नयी उम्मीद से नवरंग भरने हैं कई,
तो क्या हुआ जो दिन वही शामें वही रातें वही,
हों हौसले से नवदिवस, नवस्वप्न से रातें नयी,
यूँ तो दुनिया नज़र के बदलाव से लगती नयी,
पर है असल में तब नया जब दोस्त रहते हैं वही।

बंगाली है एक अनोखी भारत को सौगात,
मुहँ हम पूरा खोला करते जब करते हैं बात।
तभी भजन भोजन कहलाता हैप्पीनेस आनन्दो,
​नीरज की घोड़ी के देखो कांटे हो गए बोन्दो। 
​आज अपर्णा स्वयं अनिल को देती है आशीष,
रहो सुहागन तुम दोनों बच्चे हों पूरे बीस। ​
​और सखी है एक माधवी जिसकी लम्बी जीभ,
क्या जाने क्या होती है गंगा जमुनी तहज़ीब।
ना ही अहमदाबाद मिले ना मिले इलाहाबाद,
लेकिन यादों का जीवन तो सदा रहा आबाद।​