वो, जो झरता है बातों से,
या मिलता है मुलाकातों से,
या छलकता है पैमानों की,
उन गुज़री हसीन रातों से,
वो जो रिसता है छत्तों से,
या बारिश में पत्तों से,
या बारिश में पत्तों से,
फूलों की छाती से,
या ख्वाबों की बाती से,
सब प्रेम से लस होता है,
और वास्तव में रस होता है।
पर वह, जो सुनाई नहीं देता,
पर गूंजता रहता है हवाओं में,
यूँ तो दिखाई नहीं देता,
पर मौज़ूद रहता है फ़िज़ाओं में,
वह, जो कहते कहते,
होठों पर अटक जाता है,
और पलकों पर आने से पहले,
आँखों में ही भटक जाता है,
ये भी यूँ ही बरबस होता है,
पर सच,यह भी रस होता है।
सूनी ह्रदय की नलियों में,
यही रस कभी जम जाता है,
यही रस कभी जम जाता है,
उपाय करते हैं पिघलने का,
पर तब वक़्त थम जाता है,
कैसे बताऊँ तुम सब को,
तब छाती में दर्द सख़्त होता है,
तब छाती में दर्द सख़्त होता है,
ये महज़ समय समय की बात है,,
वरना नीरस तो बस वक़्त होता है।