Monday, April 30, 2012

जिन भी मैदानों में दौड़ लगायी,
बस रह गए ईनाम पाते पाते,
दौड़े तो थे, इसका संतोष रहा,
हताशा भी जाएगी जाते जाते,
कितनों ने समझाया था राहों में,
क्यों खुद को हो इस तरह सताते,
पर हमने न एक मानी किसी की,
अपने में ही रहे मुस्कुराते,
समझने के लिए ज़रूरत थी जिसकी,
अब वो दर्द हम कहाँ से लाते....

Friday, April 27, 2012

प्रश्न में ही उत्तर लिखित है,
ईमानदारी से पढो,
समस्या में समाधान निहित है,

जीवन की ऐसी ही व्यवस्था है,
धैर्य से लड़ो,
दुःख, सुख की पहली अवस्था है,

Thursday, April 26, 2012

 रात के बाद फिर रात आएगी; कभी सोचा न था,
 अश्कों पर भी धूल जम जायेगी; कभी सोचा न था,
 कि जिससे रहे पूछते प्रश्न सारी उम्र तुम 'नीरज',
 वो फितरत खुद प्रश्न बन जायेगी; कभी सोचा न था ;

Wednesday, April 25, 2012



वहां दुःख नहीं होता वहां आंसू नहीं होते,
कोई नहीं रोता वहां अपने नहीं खोते,
धन और कीर्ति का वहां कुछ मोल नहीं होता,
वैभव समृद्धि का झूठा कोई खोल नहीं होता,
वहां पर द्वेष नहीं होता वहां बिछोह नहीं होता,
बस प्रेम पनपता है वहां, विद्रोह नहीं होता,
जो भी करते हो उसका कोई बही नहीं होता,
गलत नहीं होता वहां कुछ सही नहीं होता,
वह केवल तब ही जगती है, जब पहली दुनिया सोती है,
बचपन से सुनता आया था, एक दूसरी दुनिया होती है,


Wednesday, April 18, 2012

क्या राज़ है जो नहीं खोल पाते हो

तिनका तिनका रोज़ कसमसाते हो,
क्या राज़ है जो नहीं खोल पाते हो,

है कोई ऐसी लिखावट बांच जो पाते नहीं हो,
या कोई भीतर झरोखा झाँक जो पाते नहीं हो,
या निगोड़ी चाकरी है व्यर्थ के संताप की,
स्वास्थ्य की कोई है चिंता बाँट जो पाते नहीं हो,

पूछने पर क्यों हिचकिचाते हो,
क्या राज़ है जो नहीं खोल पाते हो,

विरह का उदगार है या मिलन का विस्तार है,
भूलने की प्रतिक्रिया या स्मरण का आहार है,
ईश की है बंदगी या नव मनुज अवतार है,
तुम कभी खोते हो जिसमे कौन सा संसार है,

मानवीय सुख में भी झुंझलाते हो,
क्या राज़ है जो नहीं खोल पाते हो,

या ये सब कुछ भी नहीं बस ह्रदय का सूना सजल है,
बोल कुछ निश्चित नहीं पर गुनगुनी कोई ग़ज़ल है,
ख़ोज है एकाकी की ये, ठीक से निश्चित नहीं पर,
कुछ नहीं हो पाया जिसको पाने की इच्छा प्रबल है,

वियोग की छांव में मुस्कुराते हो,
क्या राज़ है जो नहीं खोल पाते हो,

Monday, April 16, 2012

उसके आने की वजह,
आदतन है,
इसके रहने की वजह,
भी आदतन है,
फिर संवरना क्यों नहीं भाया,
जब वह एक दिन नहीं आया;
सही गलत का प्रश्न नहीं,
अपना दृष्टिकोण है,
तुम भी सही, हम भी सही,
बस परिस्थिति कमज़ोर है,
पर भिन्न विचारों के बीच भी,
कितनी भव्यता है,
बदलती संस्कृति तो है,
पर पुरानी सभ्यता है;
उसे फौज के मायने नहीं मालूम,  उसे तो बस आदत है अपने पिता को छुट्टियों में आते जाते देखने की; वह खड़ी हो जाती है सामने पत्थर पर, नन्ही सी हथेलियाँ बच्ची की, अपने फौजी बाप को कन्धों पर होल्डाल लटकाए पहाड़ियों के टेढ़े मेढ़े रास्तों से उतरता देखती हैं....
यह अब आम बात है, रोज़मर्रा सी; इन पथरीले रास्तों से उतरते वक़्त निगाह रह रह कर ऊपर जाती है, वह अब भी खड़ी है...हाथ हिलाती हुई ; वह रोती नहीं है, जिद्द नहीं करती, कुछ नहीं मांगती, बस हाथ पकड़े कुछ दूर तक आती है; फिर उसकी मां उसे वापस ले जाती हैं...और वह दौड़ कर उस बड़े पत्थर पर चढ़ जाती है, हाथ अपने आप हवा में हिलने लगते हैं;
नीचे आधे घंटे की उतरन के बाद सड़क मिलेगी, और साधन भी...जमरू का घर निकल गया...उसकी मुर्गियां भी, ये पहाड़ी उबड़ खाबड़ रास्ते, मंदिर, एक मिनट का रुकना...फिर पत्थरों की ढलान पर कदम....बुधिया के आडू के पेड़...बस झरना आ ही गया समझो...इसके आगे एक घुमाव और फिर चार फलांग पर सड़क...शरीर फिर मुड़ता है...निगाहें ऊपर जाती हैं..कितना नीचे उतर आये..वह रहा मंदिर का लाल झंडा...और उसके ऊपर बड़ा पेड़...और ...वो अब भी दीखती है...हाथ हिलाती हुई.


Friday, April 13, 2012

एक पानी का सच

खेतों के बगल से निकला चकरोट कुछ दूर जाकर पगडण्डी में तब्दील हो जाता है / बायें हाथ पर सरसों फूल रही है, बीच बीच में मटर के पौधे भी हैं जिनके छोटे छोटे पत्तों पर पड़ी ओस अब छिटकने लगी है / दायें हाथ पर है पुराना बेल का पेड़; निगाह बरबस ही नीचे ज़मीन पर चली जाती है कि कहीं कोई बेल पक कर गिरा हुआ न हो / ये मेरी बहुत पुरानी आदत है, बचपन में जब एक बेल नीचे गिरा मिलता था था तो ये किसी लाटरी से कम नहीं होता था ; और खासकर के तब, जब पेड़ किसी और का हो / प्रकृति से हमारा रिश्ता आश्चर्यजनक है; बरसों बाद भी जब हम उन पहचाने पेड़ों से रूबरू होते हैं तो अनायास ही वही हरकत कर बैठते हैं , पहले जैसी / बूढ़ा पेड़ मानो झुक कर देखता है और पहचानी आकृति देख कर कहता है; बहुत दिनों बाद आये हो; कैसे हो ! कैसे बताऊँ; अब कहाँ आना हो पाता है, और जाड़ों में तो लगभग न के बराबर /

खेतों के सामानांतर नाली है, सिंचाई के लिए और साथ ही साथ बांटती है खेतों को; यहाँ तक ही मेरा है और इसके आगे भगेलू अहिर का / पगडण्डी के दायीं ऑर बेल के पेड़ के पीछे एक ट्यूबेल है; इन तमाम खेतों की कृत्रिम सिंचाई का इकलौता साधन / यह एक निजी ट्यूबेल है और खेत सींचने के लिए इसके मालिक के पास बुकिंग करानी पड़ती है; और करना पड़ता है बिजली आने का इंतज़ार / जाड़ों में बिजली अक्सर रात में आती है, कोई सात आठ घंटों के लिए; इन सर्द रातों में खेत सींचना किसी पर्बत श्रृंखला को पार करने से कम बड़ी उपलब्धि नहीं है / पर यहाँ यह एक आम काम है, बिलकुल वैसे ही जैसे आप और हम रात में भोजन करके सो जाते हैं / नालियाँ कई जगह से कट जाती हैं और बार बार पानी के कटाव को रोकना पड़ता है, हाथों में फावड़ा आराम नहीं कर पाता, क्योंकि ये पानी सस्ता नहीं आता / ये पानी महज़ पानी नहीं होता, यह एक साल का दाना भी होता है; कभी गौर करेंगे तो पायेंगे कि यहाँ पानी, पानी को सींचता है /

कभी ये नालियाँ पक्की हुआ करती थीं, पर वह सरकारी काम था और साल भर के अन्दर ही उसमे लगी ईंटें करवटें लेने लगीं / गाँव वालों ने उन्हें तल्लीनता से जगाया और उठाकर अपने घर ले आये /  मिटटी के गारे में इनके छूहे बनाये और उनपर बैठाया सरपत से बना छप्पर ; सरपत एक तरह की धार वाली घास है, जो कुछ दो मीटर तक बढ़ती है / यदि ध्यान न दिया जाए तो ये हाथ में से रक्त का रंग दिखा देती हैं; कुछ डेढ़ किलोमीटर दूर सई नदी के दूसरी तरफ ये बेपनाह उगती हैं , और ऊँटों पर, साइकिलों पर और कभी कभी ट्रैक्टर में भर कर इनका पदापर्ण गाँव में होता है  / फिर बांस के ढांचे पर इन्हें फैलाया जाता है और अरहर के भिगोये हुए राठे से इन्हें बाँधा जाता है; तैयार हो जाने पर गाँव के पुरुष इकठ्ठा होकर इसे उठाकर छूहों पर रख देते हैं / इसके नीचे सपोर्ट के लिए कुछ बबूल या बेर के पेड़ के मोटे तने लगा दिए जाते हैं जिन्हें थून कहते हैं / नालियों की ईंटें इन्ही  छप्परों के छूहों में अब तसल्ली से सोती हैं /

नाली के दूसरी ओर अरहर में कुहासा जगह जगह पर पसर गया है; जहाँ भी पौधों के बीच सांस है, कुहासे ने डेरा डाल रखा है / अक्सर सोचता हूँ की इस कुहासे की उम्र धरती पर कितनी कम है, रात से सवेरे तलक; अभी सूर्य देवता की किरणें इन्हें पिघला देंगी पर ये जम कर कहीं फिर इकट्ठा होंगे और रात में धरती की छाती पर तैरेंगे / इन खेतों के पीछे छोटा सा आमों का बाग़ है और उनके बीच है बांसों की कोठ जहाँ से रात में सियार बोलते हैं /  और उसी के साथ लगता हुआ है कुआं, जिसके छूहे कभी उज्जवल हुआ करते थे पर अब काले पड़ गए हैं / अम्मा बताती हैं की ये कुआं मेरे दादाजी के जन्म के समय बना था और गाँव के दो लोगों की मौत इसे बनाने में हो गयी थी/ इसलिए गांववालों ने इसको न इस्तेमाल करने का निर्णय लिया था / फिर एक दिन गाँव के सब कुओं और नलकूपों का पानी बदल गया; अब किसी भी पानी से दाल न पकती थी, दाल अलग रह जाती और पानी अलग / तब इस कुँए की याद फिर आयी और अब एक बाल्टी पानी गाँव के हर घर में इस कुँए से जाता है / कुर्बानी आज नहीं तो कल काम आती ही है /  खेतों और बाग़ के साथ सन्नाटे में पड़े इस कुँए का सच तो मैं नहीं जानता, पर आज इसका पानी ही इसका सच है /

बाग़ में कुछ पुराने आम के पेड़ हैं; जाड़ों में ये बेकार पड़े रहते हैं पर गर्मियों के आगमन पर हर नज़र इन पर जाती है / इंसानी प्रकृति प्राकृतिक प्रकृति पर कितना निर्भर है; मौसमों के साथ हमारी सोच भी बदलती है और प्रवृत्ति भी / अभी कुछ ही देर में औरतें हाथों में खुरपी और झौआ (बांस या अरहर के डंठल कि बनी टोकरी) लेकर निकल आएँगी; इन खेतों के बीच मेड़ों पर जो हरी घास दीखती है, वो उनके खुरपी की काल बनेगी / पढ़ाई न करने पर अक्सर पिताजी मुझे कहते थे कि बड़े होकर घास छीलोगे; पर गाँव में इसका अपना महत्व है / जाड़ों में सारे खेत फसलों से लबालब होते हैं इसलिए  गोरु (मवेशी) दिन भर अपने खूंटे से बंधे रहते हैं ; उनके लिए कोई अलग से चारागाह नहीं है यहाँ / छीली हुई घास साफ़ होकर महीन टुकड़ों में कट जायेगी और पर साल के गेहूं के भूसे और आटे की चोकर में मिलाकर इसकी सानी परोस दी जायेगी मवेशियों को उनके हौदों में / जब अम्मा सानी बनाती हैं तो सारे जानवर एकटक उनको देखते रहते हैं; यदि कभी ज़रा भी देर हो जाती है तो रंभाते हैं; बुलाते हैं / एक परिवार में सब की भाषा एक सी नहीं होती, पर प्रेम, वात्सल्य और करुणा की कोई भाषा नहीं होती; ये तो बिलकुल पानी की तरह ही होते हैं, जब प्यास लगती है तो प्रकट हो जाते हैं /

सुबह की पहली किरण के साथ सारे महुए के पेड़ पीले पके महुओं का त्याग करना शुरू कर देते हैं; टप टप महुए टपकते रहते हैं धरती पर ज्यों ज्यों धूप तेज़ होती है /  अरसा हो गया था देखे हुए; धरती पर फैली पीले महुओं की चादर; कहीं पांव रखने की भी जगह नहीं; अदभुत है ये सब / सुबह परवान चढ़ती है और रात का अकड़ा जीवन अंगडाई लेता है; और तब दिन भागने लगता है / यह अलौकिक सौंदर्य है; ये खेत, टूटी नालियाँ, हरे मेड़, आम के पेड़, खूंटे से बंधे जानवर, घास छीलती स्त्रियाँ, खेत सींचता किसान, महुओं का धरती से स्पर्श, अकेला खड़ा कुआं और उसका पानी, सब सौंदर्य है / मेरा मानना है की सौंदर्य भी बिलकुल पानी की तरह है; इसका न कोई रंग है, न कोई आकार; ये तो बस जिन आँखों में बसता है उसी का रंग और आकार ले लेता है; क्या हम शहरी लोग इस पानी से दूर होते जा रहे हैं; क्या आज के शहरी बच्चे कभी इस पानी को समझ पायेंगे /  किताबों से हम कितना कुछ बता पायेंगे, अब भी जीवन में कितनी ही चीज़ें हैं जो न पढ़ाई जा सकती हैं, न सिखाई जा सकती हैं; महज़ महसूस की जा सकती हैं / मेरा भाग्य है कि मैं इस पानी के सच को कुछ हद तक समझ पाया हूँ; काश मैं इसे अपने चाहनेवालों को भी समझा पाता ///


Thursday, April 12, 2012

कभी क़दमों के तले दुनिया,
सर पे ताज़ोतख़्त होता है;
कभी सब कुछ लुट कर भी,
साँसों में चैन जब्त होता है,
कभी धमनियों में ही नहीं,
आँखों में भी रक्त होता है,
परीक्षा ही तब होती है,
जब दर्द सख्त होता है,
ज़रा सब्र करो मेरे दोस्त,
बेवफा तो बस वक़्त होता है;
क्यों फिर समुद्रों में कुछ कोलाहल सा है,
तेरी रवानगी है, या धरती काँपी है कहीं...
वक़्त भी कैसे अचानक बन गया इन्सां,
फेर दिया पानी वहां पर थी जहाँ ज़मीं...

Tuesday, April 10, 2012

अब निज़ी कुछ भी नहीं है

हिनहिनाती ये घटाएं,
बारिशों की वत्सलाएं,
होश को मय से मिलाती,
पूर्व की बहकी हवाएं;

लोचनों के रंग सारे,
घाट के टूटे किनारे,
पंख जैसे पवन में कुछ,
तैरते अरमां हमारे;

सूरतें गुमसुम सी सारी,
भीगी पलकों की सवारी,
तितलियों सी खोजती कुछ,
सीरतें मेरी तुम्हारी;

रास्तों का अनमनापन,
पक्षियों का वह लड़कपन,
रात में राहें दिखाता,
जुगनुओं का वह बड़प्पन;

पूस का सिकुड़ा हुआ तन,
बाग़ में उतरा हुआ घन,
मंदिरों की घंटियों सा,
स्पर्श में डूबा हुआ मन;

सांझ की बिखरी सी लाली,
तेरे हिस्से की वो थाली,
आसरों के बोझ से,
लटकी हुई महुए की डाली;

आसमां सी अब ज़मीं है,
बिन तेरे कुछ भी नहीं है,
दे दिया मैंने सभी कुछ,
अब निज़ी कुछ भी नहीं है

Sunday, April 8, 2012

इन दिनों में दिन हैं,
और उनमे भी दिन हैं,
सुबह, दोपहर, शाम, रात,
कुछ हैं साथ, कुछ बिन हैं,
यादें हैं, यादों में यादें हैं,
वादों में और वादे हैं,
हंसी में है मिश्रण,
ग़मों के रूप सादे हैं,
रुआंसी में नसीहत है,
मुस्कान, जैसे सीरत है,
ये बस हो जाता है यूँ ही,
नहीं नासाज़ नीयत है;
झगड़ों में, मनाने में,
या यूँ ही चिडचिड़ाने में,
कदम अपने नहीं थकते,
सुबह से लडखडाने में;
तुम्हारे साथ भी हैं,
और तुम्हारे बिन हैं,
इसी में तरह तरह के,
गुज़रते पलछिन हैं,
देखो एक दिन में समाये,
कैसे अनेकों दिन हैं;

Thursday, April 5, 2012

वाह री अधेड़ता तेरे जलवे,
रोज़ गिरते हैं, संभलते हैं,
कभी दिन में हालात बदल देते थे,
अब हालात में दिन बदलते हैं;

Wednesday, April 4, 2012

किसी के हंसने से, किसी के रोने से,
और किसी के जगने से,
तस्वीरों में आइने बदल गए,
किसी के आने से, किसी के जाने से,
और किसी के रुकने से,
जिंदगी के मायने बदल गए;

Sunday, April 1, 2012

यथार्थ और उसकी परछाई के बीच,
एक दुनिया और है,
सुनाई और दिखाई नहीं देती,
पर रहती है;
क्या कभी महसूस किया है ?

along with the reality and its shadow,
there exists another world,
can neither be heard nor seen,
but exists;
have you ever felt it ?