खेतों के बगल से निकला चकरोट कुछ दूर जाकर पगडण्डी में तब्दील हो जाता है /
बायें हाथ पर सरसों फूल रही है, बीच बीच में मटर के पौधे भी हैं जिनके
छोटे छोटे पत्तों पर पड़ी ओस अब छिटकने लगी है / दायें हाथ पर है पुराना बेल
का पेड़; निगाह बरबस ही नीचे ज़मीन पर चली जाती है कि कहीं कोई बेल पक कर
गिरा हुआ न हो / ये मेरी बहुत पुरानी आदत है, बचपन में जब एक बेल नीचे गिरा
मिलता था था तो ये किसी लाटरी से कम नहीं होता था ; और खासकर के तब, जब
पेड़ किसी और का हो / प्रकृति से हमारा रिश्ता आश्चर्यजनक है; बरसों बाद भी
जब हम उन पहचाने पेड़ों से रूबरू होते हैं तो अनायास ही वही हरकत कर बैठते
हैं , पहले जैसी / बूढ़ा पेड़ मानो झुक कर देखता है और पहचानी आकृति देख कर
कहता है; बहुत दिनों बाद आये हो; कैसे हो ! कैसे बताऊँ; अब कहाँ आना हो
पाता है, और जाड़ों में तो लगभग न के बराबर /
खेतों के सामानांतर नाली है, सिंचाई के लिए और साथ ही साथ बांटती
है खेतों को; यहाँ तक ही मेरा है और इसके आगे भगेलू अहिर का / पगडण्डी के
दायीं ऑर बेल के पेड़ के पीछे एक ट्यूबेल है; इन तमाम खेतों की कृत्रिम
सिंचाई का इकलौता साधन / यह एक निजी ट्यूबेल है और खेत सींचने के लिए इसके
मालिक के पास बुकिंग करानी पड़ती है; और करना पड़ता है बिजली आने का इंतज़ार
/ जाड़ों में बिजली अक्सर रात में आती है, कोई सात आठ घंटों के लिए; इन
सर्द रातों में खेत सींचना किसी पर्बत श्रृंखला को पार करने से कम बड़ी
उपलब्धि नहीं है / पर यहाँ यह एक आम काम है, बिलकुल वैसे ही जैसे आप और हम
रात में भोजन करके सो जाते हैं / नालियाँ कई जगह से कट जाती हैं और बार बार
पानी के कटाव को रोकना पड़ता है, हाथों में फावड़ा आराम नहीं कर पाता,
क्योंकि ये पानी सस्ता नहीं आता / ये पानी महज़ पानी नहीं होता, यह एक साल
का दाना भी होता है; कभी गौर करेंगे तो पायेंगे कि यहाँ पानी, पानी को
सींचता है /
कभी ये नालियाँ पक्की हुआ करती थीं, पर वह सरकारी काम था और साल भर के
अन्दर ही उसमे लगी ईंटें करवटें लेने लगीं / गाँव वालों ने उन्हें तल्लीनता
से जगाया और उठाकर अपने घर ले आये / मिटटी के गारे में इनके छूहे बनाये
और उनपर बैठाया सरपत से बना छप्पर ; सरपत एक तरह की धार वाली घास है, जो
कुछ दो मीटर तक बढ़ती है / यदि ध्यान न दिया जाए तो ये हाथ में से रक्त का
रंग दिखा देती हैं; कुछ डेढ़ किलोमीटर दूर सई नदी के दूसरी तरफ ये बेपनाह
उगती हैं , और ऊँटों पर, साइकिलों पर और कभी कभी ट्रैक्टर में भर कर इनका
पदापर्ण गाँव में होता है / फिर बांस के ढांचे पर इन्हें फैलाया जाता है
और अरहर के भिगोये हुए राठे से इन्हें बाँधा जाता है; तैयार हो जाने पर
गाँव के पुरुष इकठ्ठा होकर इसे उठाकर छूहों पर रख देते हैं / इसके नीचे
सपोर्ट के लिए कुछ बबूल या बेर के पेड़ के मोटे तने लगा दिए जाते हैं
जिन्हें थून कहते हैं / नालियों की ईंटें इन्ही छप्परों के छूहों में अब
तसल्ली से सोती हैं /
नाली के दूसरी ओर अरहर में कुहासा जगह जगह पर पसर गया है; जहाँ भी
पौधों के बीच सांस है, कुहासे ने डेरा डाल रखा है / अक्सर सोचता हूँ की इस
कुहासे की उम्र धरती पर कितनी कम है, रात से सवेरे तलक; अभी सूर्य देवता की
किरणें इन्हें पिघला देंगी पर ये जम कर कहीं फिर इकट्ठा होंगे और रात में
धरती की छाती पर तैरेंगे / इन खेतों के पीछे छोटा सा आमों का बाग़ है और
उनके बीच है बांसों की कोठ जहाँ से रात में सियार बोलते हैं / और उसी के
साथ लगता हुआ है कुआं, जिसके छूहे कभी उज्जवल हुआ करते थे पर अब काले पड़ गए
हैं / अम्मा बताती हैं की ये कुआं मेरे दादाजी के जन्म के समय बना था और
गाँव के दो लोगों की मौत इसे बनाने में हो गयी थी/ इसलिए गांववालों ने इसको
न इस्तेमाल करने का निर्णय लिया था / फिर एक दिन गाँव के सब कुओं और
नलकूपों का पानी बदल गया; अब किसी भी पानी से दाल न पकती थी, दाल अलग रह
जाती और पानी अलग / तब इस कुँए की याद फिर आयी और अब एक बाल्टी पानी गाँव
के हर घर में इस कुँए से जाता है / कुर्बानी आज नहीं तो कल काम आती ही है
/ खेतों और बाग़ के साथ सन्नाटे में पड़े इस कुँए का सच तो मैं नहीं जानता,
पर आज इसका पानी ही इसका सच है /
बाग़ में कुछ पुराने आम के पेड़ हैं; जाड़ों में ये बेकार पड़े रहते हैं
पर गर्मियों के आगमन पर हर नज़र इन पर जाती है / इंसानी प्रकृति प्राकृतिक
प्रकृति पर कितना निर्भर है; मौसमों के साथ हमारी सोच भी बदलती है और
प्रवृत्ति भी / अभी कुछ ही देर में औरतें हाथों में खुरपी और झौआ (बांस या
अरहर के डंठल कि बनी टोकरी) लेकर निकल आएँगी; इन खेतों के बीच मेड़ों पर जो
हरी घास दीखती है, वो उनके खुरपी की काल बनेगी / पढ़ाई न करने पर अक्सर
पिताजी मुझे कहते थे कि बड़े होकर घास छीलोगे; पर गाँव में इसका अपना महत्व
है / जाड़ों में सारे खेत फसलों से लबालब होते हैं इसलिए गोरु (मवेशी) दिन
भर अपने खूंटे से बंधे रहते हैं ; उनके लिए कोई अलग से चारागाह नहीं है
यहाँ / छीली हुई घास साफ़ होकर महीन टुकड़ों में कट जायेगी और पर साल के
गेहूं के भूसे और आटे की चोकर में मिलाकर इसकी सानी परोस दी जायेगी
मवेशियों को उनके हौदों में / जब अम्मा सानी बनाती हैं तो सारे जानवर एकटक
उनको देखते रहते हैं; यदि कभी ज़रा भी देर हो जाती है तो रंभाते हैं;
बुलाते हैं / एक परिवार में सब की भाषा एक सी नहीं होती, पर प्रेम,
वात्सल्य और करुणा की कोई भाषा नहीं होती; ये तो बिलकुल पानी की तरह ही
होते हैं, जब प्यास लगती है तो प्रकट हो जाते हैं /
सुबह की पहली किरण के साथ सारे महुए के पेड़ पीले पके महुओं का त्याग
करना शुरू कर देते हैं; टप टप महुए टपकते रहते हैं धरती पर ज्यों ज्यों धूप
तेज़ होती है / अरसा हो गया था देखे हुए; धरती पर फैली पीले महुओं की
चादर; कहीं पांव रखने की भी जगह नहीं; अदभुत है ये सब / सुबह परवान चढ़ती
है और रात का अकड़ा जीवन अंगडाई लेता है; और तब दिन भागने लगता है / यह
अलौकिक सौंदर्य है; ये खेत, टूटी नालियाँ, हरे मेड़, आम के पेड़, खूंटे से
बंधे जानवर, घास छीलती स्त्रियाँ, खेत सींचता किसान, महुओं का धरती से
स्पर्श, अकेला खड़ा कुआं और उसका पानी, सब सौंदर्य है / मेरा मानना है की
सौंदर्य भी बिलकुल पानी की तरह है; इसका न कोई रंग है, न कोई आकार; ये तो
बस जिन आँखों में बसता है उसी का रंग और आकार ले लेता है; क्या हम शहरी लोग
इस पानी से दूर होते जा रहे हैं; क्या आज के शहरी बच्चे कभी इस पानी को
समझ पायेंगे / किताबों से हम कितना कुछ बता पायेंगे, अब भी जीवन में कितनी
ही चीज़ें हैं जो न पढ़ाई जा सकती हैं, न सिखाई जा सकती हैं; महज़ महसूस की
जा सकती हैं / मेरा भाग्य है कि मैं इस पानी के सच को कुछ हद तक समझ पाया
हूँ; काश मैं इसे अपने चाहनेवालों को भी समझा पाता ///