हिनहिनाती ये घटाएं,
बारिशों की वत्सलाएं,
होश को मय से मिलाती,
पूर्व की बहकी हवाएं;
लोचनों के रंग सारे,
घाट के टूटे किनारे,
पंख जैसे पवन में कुछ,
तैरते अरमां हमारे;
सूरतें गुमसुम सी सारी,
भीगी पलकों की सवारी,
तितलियों सी खोजती कुछ,
सीरतें मेरी तुम्हारी;
रास्तों का अनमनापन,
पक्षियों का वह लड़कपन,
रात में राहें दिखाता,
जुगनुओं का वह बड़प्पन;
पूस का सिकुड़ा हुआ तन,
बाग़ में उतरा हुआ घन,
मंदिरों की घंटियों सा,
स्पर्श में डूबा हुआ मन;
सांझ की बिखरी सी लाली,
तेरे हिस्से की वो थाली,
आसरों के बोझ से,
लटकी हुई महुए की डाली;
आसमां सी अब ज़मीं है,
बिन तेरे कुछ भी नहीं है,
दे दिया मैंने सभी कुछ,
अब निज़ी कुछ भी नहीं है
बारिशों की वत्सलाएं,
होश को मय से मिलाती,
पूर्व की बहकी हवाएं;
लोचनों के रंग सारे,
घाट के टूटे किनारे,
पंख जैसे पवन में कुछ,
तैरते अरमां हमारे;
सूरतें गुमसुम सी सारी,
भीगी पलकों की सवारी,
तितलियों सी खोजती कुछ,
सीरतें मेरी तुम्हारी;
रास्तों का अनमनापन,
पक्षियों का वह लड़कपन,
रात में राहें दिखाता,
जुगनुओं का वह बड़प्पन;
पूस का सिकुड़ा हुआ तन,
बाग़ में उतरा हुआ घन,
मंदिरों की घंटियों सा,
स्पर्श में डूबा हुआ मन;
सांझ की बिखरी सी लाली,
तेरे हिस्से की वो थाली,
आसरों के बोझ से,
लटकी हुई महुए की डाली;
आसमां सी अब ज़मीं है,
बिन तेरे कुछ भी नहीं है,
दे दिया मैंने सभी कुछ,
अब निज़ी कुछ भी नहीं है
No comments:
Post a Comment