Tuesday, December 29, 2020

अब यह मन है, अपने मन का अनमन बदले,
जो  विषाक्त हो रहे थे उनका तन मन बदले; 
अबलाओं की विवश दशा का विवश भी बदले,
जिनके भोर अंधेर रहे वह दिवस भी बदले;

भौतिकता तक सीमित यह अभिलाषा बदले,
कार्यालय में सम्बोधन की भाषा बदले;
वोटों के प्रेमी प्रतिनिधि का प्राज्ञ भी बदले
जिस हलधर का अन्न है उसका भाग्य भी बदले;

दीन जनों पर मात्र दया का अर्पण बदले,
जिसमे न मुस्कान दिखे वो दर्पण ​बदले;
मनुज प्रणय से वंचित रहा ह्रदय भी बदले,
अब की साल, साल ही नहीं समय भी बदले।

 

Saturday, December 26, 2020

कौन समझेगा इसे,
ये कोई शख्स नहीं, कोई जगह भी नहीं,
कोई वस्तु नहीं, कोई कलह भी नहीं,
कोई मिलन नहीं, कोई गिरह भी नहीं,
कोई प्रीत नहीं, कोई विरह भी नहीं,
किसी धन दौलत की लालसा नहीं,
किसी अपने का कोई हादसा भी नहीं,
ये वो भी नहीं जो दिखाई दे,
वो भी नहीं जो सिर्फ सुनाई दे,
कौन समझेगा इसे,
कि क्यूँ आवश्यक है किन्ही ज़ज़्बों में,
ढीठ होना,
और आज भी लाठियों से अधिक ज़रूरी है,
पीठ होना।

 

Tuesday, December 22, 2020

दरख़्त बोलते नहीं,
डोलते हैं तूफानों में,
झोंक देते हैं,
अपना सारा लचीलापन,
कि खड़े रह सकें,
तूफानों के बाद भी ...
खड़े रहते हैं निश्चल,
भीषण ऊष्मा में,
सोख कर अपने ही पसीने को,
और देखते हैं उपयोग,
अपनी छाया का,
चुपचाप......
उजड़ते रहते हैं पत्तियों से,
फिर संवरते हैं,
अनवरत, साल दर साल,
लगाते हैं गले,
बारिश, शीत सब.....
पर इस सब के लिए,
बढ़ना होता है उन्हें,
जमीन के ऊपर,
जमीन के भीतर,
निरंतर.......
कैसे कर पाते हैं,
ये सब,
दरख्त जो बोलते नहीं,
समझो कभी उनकी भी भाषा,
किन्हीं चुप्पियों में,
फिर करो कोशिश,
दरख़्त बनो,
तूफ़ान तो सब हैं।

 

आज भी वैसा ही दिन वैसी ही रात,
न भरोसा न दिलासा न ही बात,
रोज़ फल कर रोज़ पक जाता हूँ मैं,
रोज़ ज़रा सा और थक जाता हूँ मैं,
सपन लेकिन थकन से कितना बड़ा है,
उठ चलो कि दिवस मुँह बाये खड़ा है ।

 

 

कुछ समय तक धूल आँधी लू सब भाती है,
फिर समय है बीतता ज़िद्द कम हो जाती है,
जब लगा देते हैं हम इन खिड़कियों पर जालियाँ,
तब हवा और धूप दोनों छन के आती हैं।

Sunday, December 20, 2020

मास्क में छुपी है पर मुस्कराहट है वही,
कुछ वक़्त ही बीता है, ज़िंदगी नहीं,
जल्द ही फिर होगी टपरी, चाय, चुस्की,
तब नहीं कहना नहीं नहीं नहीं नहीं।

 

Tuesday, December 8, 2020

थोड़ी सिहरन,
उम्मीदें ढेर सारी,
कुछ ज़मीनी दूरियां,
पर भावनाओं की सवारी,
कभी आशंकाओं की हथेली,
कभी नई पहेली,
ठान रखी है हमने भी,
जीने की ज़िद्द वही,
सब्र की रहगुज़र में,
आँखों में आशा वही,
क़ुबूल है जंग इस साल से,
जो गुज़रता नहीं,
रुका रहता है,चलता नहीं,

हमारे हौसलों के काफिले,
रहेंगे साथ हरदम ,
चाहे हो धूल समय पर,
ये हों साँसों के ग़म,
ज़िंदगी रहे बेशक,
ज़रूरत से कुछ कम,
देखेंगे बाज़ी किसकी,
ये ठहरा साल और हम।

 

Monday, December 7, 2020

जब सफर में शान्ति का लहरा रहा परचम खड़ा,
किन्तु फिर उन्माद क्यों है राह में बिखरा पड़ा,
प्रेम की बोली के यूँ तो हम सभी हक़दार हैं पर,
युद्ध के अवसान पर है लग गया पहरा कड़ा। 

जब समस्या मूल से हट राजनैतिक रंग ले ले,
प्रक्रिया संवाद भी जब हठ की कोई जंग ले ले,
साक्षी इतिहास है कि जो दिशाभ्रम में अड़ा,
वह समय से हार बैठा, है समय सब से बड़ा।

क्षीण पड़ जाती दशा जैसे समय है बीतता,
अब नहीं कोई मनुज है हार कर के जीतता,
हो कृषक तुम या हो सैनिक या कोई नेता बड़ा,
धराशायी हो गया हठ, अंत तक था जब लड़ा।

 

 

Tuesday, December 1, 2020

ढेर सारी नमी सहेज ह्रदय में,​
और कुछ आँचल में,
वह रही रिसती पूरी बरसात,
न कोई उलाहना, न संताप,
न अपनी तक़दीर पर पश्चाताप,
बस अपनी सीलन को,
वह सहती रही चुपचाप,
शायद यह सोचकर,
कि कमी रह गयी कहीं जुड़ाव में,
जब छत से उसका हुआ था मिलाप,
वो छत जो है उसके सर पर सवार,
ये घर की दक्खिनी दीवार।

बरसात रुकी पर रह गयी सीलन,
बहुत दिनों तक,
फिर धूप ने सेंका उसे,
पपड़ियाँ पर गयीं दीवार पर,
उखड़ गए सब रंग,
वह अब भी न बोली कुछ,
फिर हमने छत की मरम्मत कराई,
कुछ और सुखाया दीवार के आँचल को,
और रंग दिया फिर नया सा।

अब भी मौन है दीवार,
पहले जैसी ही नयी हो गयी है,
अब आँचल में नमी नहीं दिखती,
पर वह नमी जो ह्रदय में थी उसके,
कहाँ सुखा पायी उसे धूप भी,
वह अब भी है उसके अंदर,
उसकी अपनी सीलन,
उसे रखना चाहती है वो,
किसी निशानी की तरह,
जिस तरह रख लेते हैं हम,
बुरे समय को सहेज कर,
अपनी दक्खिनी दीवार में।