Friday, August 31, 2012

क्या हो तुम और क्या हूँ मैं, है अलग कोई नहीं,
ढूँढ़ते हैं सब उसी को जो कभी खोयी नहीं;
                                 

Wednesday, August 29, 2012

दो उजाला इतना मुझको, रात शरमा कर कहे,
अब बुझा दो बत्तियाँ जो मिल गयी सुबह मुझे;
क्यों पथिक को रोकते हो ओहदों की सरज़मीं से,
जो अगर तुम हो खुदा तो रास्तों को रोक लो ;

Monday, August 27, 2012

आज फिर बारिश की रात है ! कहने को तो ये अचानक आई थी पर दिन में निकली उमसदार धूप शाम को बादलों में जाकर  कड़कती बिजली बन गयी थी ; फिर तो बारिश का आभास होना ही चाहिए था / पर हम कितनी सरलता से अनायास ही कह देते हैं कि अचानक बारिश आ गयी ;  मानो बरसात के मौसम में हम कुछ और ही उम्मीद लगाये बैठे थे / मैं कमरे में बैठा टी वी पर कोयले कि दलाली देख रहा था कि अचानक  सिग्नल आने बंद हो गए / डिश टी वी में यही एक खराबी है कि ख़राब मौसम में यह भी ख़राब हो जाती है / ख़ैर ! मैं फिर भी इसका कृतज्ञ हूँ कि इसकी वजह से मेरा पाव भर खून जलने से बच गया ; वरना जिस तरह से ये राजनेता टी वी पर आरोप प्रत्यारोप जड़ रहे थे, उससे से तो एक आम आदमी का खून ही जल सकता है / इससे बेहतर है कि कोयला ही जले, चाहे सतह के ऊपर हमारे पसीने पर या सतह के नीचे धरती के गर्भ में / खून बचा रहेगा तो ऐसे न जाने कितने घोटाले देखने सुनने का सौभाग्य मिलता रहेगा, और मुझे सदैव गर्व रहेगा हमारे चुनाव पर और हमारी चुनावी प्रक्रिया पर / ऐसे बिरले ही देश होंगे जिन्हें भगवान् चलाता है; यूँ ही नहीं हमारे अधिकतर टूरिस्ट प्लेस मंदिर और मकबरे हैं; हमारी ईश्वर में आस्था इतनी अटूट है कि स्वयं और परिवार के अलावा हमने अपने देश को भी उसके हवाले कर रखा है / इस देश में तो ईश्वर के  पैरों की खड़ाऊँ ने राज किया है; फिर ये नेतागण तो ईश्वर के बनाये हुए इंसान है; ये राज क्यों न करें / क्या कहते हैं आप लोग ?

पानी के एहसास

कुछ एहसास,
पानी की तरह हैं आते,
छुओ तो हाथ गीले हो जाते,
पर ये हाथ में नहीं आते;
रिश्तों और बंधनों से पृथक,
वायदों और जिम्मेदारियों से अलग,
ये दूसरी दुनिया में चलते हैं,
सामाजिक विषमताओं से दूर,
ये महज़ भावनाओं में पलते हैं;
इनका नाम नहीं होता,
इनका अंजाम नहीं होता,
और कितना भी पत्राचार करो,
इनका पैगाम नहीं होता;
इनका आकार नहीं होता,
कोई प्रतिकार नहीं होता,
यूँ तो ये अन्दर बसते हैं,
पर इनका अधिकार नहीं होता;
दोस्तों !
शायद ये हम सब में,
कहीं न कहीं पनपते हैं,
हम कहें, न कहें, मानें, न मानें,
ये चुपचाप खनकते हैं,
ये तो बस,
खुद को खुद से मिलाते हैं,
और कितना भी भर पेट रहें,
ये एक भूख और बढ़ाते हैं;

Friday, August 24, 2012

कोशिश है कि कुछ नए पन्ने जोडूँ खुद में,
सहेज सकूँ गुज़रे पन्नों को एहतियात से,
गुजारिश है नज़ाकत से पढना इन दिनों,
भीग जाता है ताज़ा अखबार भी बरसात से;

ये इनका अभिमान है,
या गूंगेपन का इकरार,
या जैसे किसी ने,
जान डाल दी हो हल्की सी,
पर जब तक,
बिजली का पंखा चलता है,
खिड़की को ओढ़े ये परदे,
मंद मंद हवा में हिलते हैं;
तब इनके झरोखों से,
पारदर्शी कांच,
और उसके पार.....भागती दुनिया,
दिखती है /

Thursday, August 23, 2012

हर ग़म दे जाता एक गिलास निशानी,
बताओ आधा खाली या आधा पानी;
सोचना तो दिमागी उपज है नीरज,
किसी का दिन ढला किसी की जवानी;
ये शहर, ये रास्ते जो साथ चले थे कभी,
बड़े गुमसुम से किसी बादल को तरसते हैं,
ये इंतज़ार है जो पानी सा जमा होता है,
भर जाता है तो आँखों से बरसते हैं

Monday, August 20, 2012

इंतकाम नहीं लेती,
पर पलती हैं,
अंधेरों में नहीं दिखती,
पर रहती हैं,
और कितना भी अकेलो चलो,
ये साथ देती हैं,
इनका बस तुमसे,
सरोकार होता है,
क्यों ग्लानि करते हो,
इन पर दाग नहीं होता है...

Saturday, August 18, 2012

दर्द का अपना रंग नहीं होता,
और आने का कोई ढंग नहीं होता;
हाँ, इसकी 'वजह' का रंग होता है,
धमनियों में बहे तो लाल,
आँखों से बहे तो ख़याल होता है.
मेहनत से बहे तो खारा,
हवाओं में उड़े तो गुलाल होता है,
मन को भाये तो दिलासा,
न भाये तो सवाल होता है;
शरीर में हो तो इलाज़,
रूह में हो तो हलाल होता है,
तुम्हारे पास है तो, 'थोड़ा',
मेरे पास है तो बवाल होता है,
                           ...neeraj
तू चाहे जिस कलम से,
उलझी जागीर लिखता है,
दुआओं का असर है ये,
हौसला अब भी दिखता है;
हसरतों के बादल,
जब छंटते हैं,
तब तक अरसा,
गुज़र जाता है,
बस गुबार बंटते हैं...

थकान का आकार,
शरीर से मिलता है,
और बूढ़े कंधे पर लटका ,
खाली झोला,
हवा में बेमन हिलता है;

वक़्त के साथ,
और असलियत के आभास से,
अन्दर का ढांचा,
शनै शनै गलता है,
पर धन्य है वो आदमी,
जो फिर भी चलता है....

Thursday, August 16, 2012

आज़ादी दी और ईज़ाद करना भूल गए,
क्यों श्वेत पन्नों पर रंग भरना भूल गए,
ये कैसी छटपटाहट दी तुमने मेरे साक़ी,
पंखों को खोल दिया, पैर खोलना भूल गए...

on independence day 2012

ऐ वतन इतना आज़ाद कर मुझे,
संवार सकूँ मैं सपनों की आजादी को;

Monday, August 6, 2012

बीती गुमनामियों का निशान नज़र आता है,
ज़मीं पर रहकर आसमान नज़र आता है,
शालीनता से जिसे बोया था कभी 'नीरज',     
आज उस जीवन का ईमान नज़र आता है...

Saturday, August 4, 2012

इस इग्यारहंवे मंजिल के फ्लैट की बालकनी से एक दुनिया दिखती है; कंक्रीट और कुछ हरे पेड़ों में घुली हुई...पास की इमारत के ऊपरी मंजिल को बादल यूँ छू कर निकलता है जैसे धुआं रिस रहा हो... ये रात सन्नाटों में जागने की रात है...धुंए और बातों के बीच एक अक्स तलाशने की रात है...इसे और कोई नहीं समझता...बस वो और मैं...कमरे में पड़े एक पिंजरे में पड़ी तकिया पर कफी कान खुजाता रहता है...तकलीफ है उसे... तकलीफ है हम सब को...कुछ दिखती है कुछ नहीं...वो कुछ बताता है...कुछ टाल जाता है...दर्द रिसता है पर लहू नहीं दिखता...फिर कभी...अभी सिर्फ सकारात्मकता का दौर है...क्या पा सकते हैं...किसको खोने से बचाना है...क्या करना है और क्या नहीं....इतनी तल्लीन रात पहले कभी नहीं आई...पहले कभी किसी ने इस तरह नहीं समझा...नहीं समझाया..ये इत्तफाक नहीं हो सकता...ये होना था...आगे बहुत से दिन देखने बाकी हैं...पर इस रात की छाप उनपर उजाले सी गिरेगी...मैं एहसानमंद नहीं हूँ...कृतज्ञ भी नहीं...बस खुद को खोजा हुआ पाता हूँ...वो समझता है और बहुत जगह चुप रहता है...नकारात्मकता नहीं आनी चाहिए..शहरी रात के उजाले में बादल तैरते हुए साफ़ दिखते हैं...अब बस इंतज़ार है...चुनौतियों का...एक बादल अपना भी है.

Wednesday, August 1, 2012

इस सिमटती धुंध की परछाइयों में,
रेंगती रुसवाइयों की आस है,
जो नहीं मिलना था आखिर न मिला,
पर महकता आज भी एहसास है;

खुद को खुद में ढूँढने का है समय,
वक़्त का अपना अलग सिद्धांत है,
गम नहीं 'नीरज' समझना तुम इसे,
ये अकेलापन नहीं, एकांत है;