कुछ एहसास,
पानी की तरह हैं आते,
छुओ तो हाथ गीले हो जाते,
पर ये हाथ में नहीं आते;
रिश्तों और बंधनों से पृथक,
वायदों और जिम्मेदारियों से अलग,
ये दूसरी दुनिया में चलते हैं,
सामाजिक विषमताओं से दूर,
ये महज़ भावनाओं में पलते हैं;
इनका नाम नहीं होता,
इनका अंजाम नहीं होता,
और कितना भी पत्राचार करो,
इनका पैगाम नहीं होता;
इनका आकार नहीं होता,
कोई प्रतिकार नहीं होता,
यूँ तो ये अन्दर बसते हैं,
पर इनका अधिकार नहीं होता;
दोस्तों !
शायद ये हम सब में,
कहीं न कहीं पनपते हैं,
हम कहें, न कहें, मानें, न मानें,
ये चुपचाप खनकते हैं,
ये तो बस,
खुद को खुद से मिलाते हैं,
और कितना भी भर पेट रहें,
ये एक भूख और बढ़ाते हैं;