Saturday, December 28, 2024

 

 

 

 

शनि बहुत हावी रहा इस साल,
पर अब बदलने वाली है दशा,
पता नहीं कि ऐसा सोचना,
उम्मीद है या बेबसी का नशा;

​जब बहुत साल बीत गए तब ये जाना,
कि महज़ साल बदलने से,
दिन नहीं बदलते,
दिन बदलने के लिए,
बदलना पड़ता है खुद को।

 

Saturday, December 14, 2024


रंग जीवन के अक्सर बदलते रहे,
हम रहे गिरते उठते पर चलते रहे;

जो लिए फैसले, मोड़ जब था मिला,
चाहे मन खिन्न था या हृदय था खिला,
आज बेशक लगे, कुछ में थीं गलतियां,
किंतु तब ठीक थे, वक्त का था सिला;

जब ज़रूरत अंधेरे से लड़ने की थी, 
हम उजाले की खातिर थे जलते रहे;

जब गुज़ारा हुआ, पर गुज़ारा न था,
जिसको समझे सहारा, सहारा न था,
निकले तूफान से, तब था ऐसा लगा,
कि किनारा मिला, पर किनारा न था;

जब भंवर में फंसे, या दिशाभ्रम रहा,
हम फिसलते रहे, पर संभलते रहे ;

माना किस्मत पतंगों की कटने में है,
या चरागों से जल कर के मिटने में है,
सारे सावन ये पतझड़ से कहते रहे,
कि असल जिंदगी गिर के उठने में है,

बुझती जलती रही आग, इस दौर में,
हम भी रुक रुक के थोड़ा पिघलते रहे;

रंग जीवन के अक्सर बदलते रहे,
हम रहे गिरते उठते पर चलते रहे;

Friday, December 13, 2024

 

 

चाहना कभी रहा शौक पर अक्सर था स्वभाव भी,
जिसमें पूरी हुईं ज़रूरतें पर रहा कुछ अभाव भी,
कायल रहे सुंदरता के, क्षणिक हो या कालांतर,
रही चाहत में कभी तृष्णा, कभी रहा कुछ भाव भी;

घुटनों के बल चलती नन्ही अवस्था को चाहा,
लड़कपन के पैरों में उलझी थिरकता को चाहा,
चाहा हमने यौवन के घुंघराले सपनों को,
रोज़ घटती बढ़ती इस जीवन व्यवस्था को चाहा;

चाहा ग्रीष्म रातों में पूरब से बहती शीतलता को,
चाहा सर्द दुपहरी में महुए की गिरती मादकता को,
ठिठुरन के उपरान्त बासंती छुवन को भी चाहा,
चाहा घटाओं से उमड़ती बूंदो की चंचलता को;

​पर चाहतें रहे चारदीवारी में , ऐसा कब, कहाँ चाहा,
​चाहा था सब जो मिला, न मिला, सारा जहां चाहा,
​यूँ हरदम बदलते थे मौसम, पर क्यूँ ये फ़ितरत बदली,
जब से चाहा है तुम्हें, हमने फिर कुछ नहीं चाहा;




 

Friday, November 15, 2024

 

 

जब दशाएं दिशाओं के विपरीत हों, और अवसान का भय प्रसारी   रहे,
ज्ञात हो तब कि हम मात्र मानव ही हैं, देवताओं के पल भी थे भारी  रहे;

हो ये गर्भित सदा प्रयत्न ही यंत्र है, चाहे श्रम ही करो,या करो भक्ति भी,
हर समाधान का अर्थ व्यापक यहाँ, हर समस्या में ही है छिपी युक्ति भी,
राह अंतिम है ये, भ्रम है मस्तिष्क का, मार्ग एकल नहीं है किसी पंथ में, 
राख हितकारी है पौध की वृद्धि में, राख जीवन से है देह की मुक्ति भी;

आवरणहीन हो द्वार के पट सदा, हल निकासी हो या हो पुनः आगमन,
उनकी जय है सुनिश्चित जो धीरज धरें, जो स्वयं ही स्वयं के प्रभारी रहे;
  
जब दशाएं दिशाओं के विपरीत हों, और अवसान का भय प्रसारी   रहे,
ज्ञात हो तब कि हम मात्र मानव ही हैं, देवताओं के पल भी थे भारी  रहे;

 

Monday, August 19, 2024

 

 

शरीर के हर हिस्से से,
ये जो खून बहता आया है,
बह रहा है,
इसके छींटें हम सब पर हैं,
ये कह रहा है।

हम सब आधुनिक गिद्ध हैं,
मरने से पहले,
और उसके बाद भी,
हमने कुछ नहीं सोचा है,
बस जिस्म नोचा है।

हैवानियत का नंगा नाच,
अबला हो या कोई निर्दोष,
घूमती कोई बस में हो,
या हो गले में स्टेथोस्कोप,
इस नाच को चाहे जिसने किया है,
पर उसे मंच हमने ही दिया है। 

हमारी आत्मा पर पसरा अँधेरा है,
जो मोमबत्तियों की लौ में,
उजागर नहीं होगा,
चलते रहें जुलूसों में,
या बैठे रहें धरने पर,
अब हम ज़िंदा नहीं होते,
बेटियों के भी मरने पर।

हमने मार दिया है विश्वास को,
मार दिया है माँ के वात्सल्य,
बाप की आस को,
हमने मार दिया है संस्कार को,
मार दिया है करुणा,
या मनुष्य के आकार को,
पर धन्य हैं हम,
कि हमने ज़िंदा रखा है,
दरिंदगी को,
राक्षसों की रियासत को,
धन्य हैं हम,
हमने ज़िंदा रखा है,
मुर्दों की सियासत को।

 

Thursday, March 14, 2024

 

 

किसी के आने की आहट, जाने के बाद आती है,
नहीं एकाध मंजर, साथ सब तादाद आती है,
जला कर दिल को जाड़े में, कभी जब बैठता हूँ मैं,
छुवन सी आँच लगती है, तुम्हारी याद आती है ;

 

Monday, February 19, 2024

 

 

जो लिखा उसे  'पुरानी स्याही' नाम दे दिया है,
भावों को मन की सराय में विश्राम दे दिया है,
करने लगे हैं शब्द जब से, घाव कोरे कागज़ों पर,
तब से हमने कलम को आराम दे दिया है;