जब
दशाएं दिशाओं के विपरीत हों, और अवसान का भय प्रसारी रहे,
ज्ञात हो तब कि हम मात्र मानव ही हैं, देवताओं के पल भी थे भारी रहे;
हो ये गर्भित सदा प्रयत्न ही यंत्र है, चाहे श्रम ही करो,या करो भक्ति भी,
हर समाधान का अर्थ व्यापक यहाँ, हर समस्या में ही है छिपी युक्ति भी,
राह अंतिम है ये, भ्रम है मस्तिष्क का, मार्ग एकल नहीं है किसी पंथ में,
राख हितकारी है पौध की वृद्धि में, राख जीवन से है देह की मुक्ति भी;
आवरणहीन हो द्वार के पट सदा, हल निकासी हो या हो पुनः आगमन,
उनकी जय है सुनिश्चित जो धीरज धरें, जो स्वयं ही स्वयं के प्रभारी रहे;
जब
दशाएं दिशाओं के विपरीत हों, और अवसान का भय प्रसारी रहे,
ज्ञात हो तब कि हम मात्र मानव ही हैं, देवताओं के पल भी थे भारी रहे;
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