Tuesday, November 28, 2023

मोड़ने से राह मुड़ जाए अगर, तो मोड़ दो,
​गाँठ को समतल बना पाओ अगर, तो जोड़ दो,
यूँ ही नीरज आस को कब तलक ढोते रहोगे,
छोड़ने से छूट जाता है अगर, तो छोड़ दो;

 

 


 

Friday, October 27, 2023

 

 

छोड़ना मुमकिन नहीं है,
वो भी जो हासिल नहीं है,
ख़्वाहिशों का इक पुलिंदा,
पूर्ण लेकिन कुछ नहीं है;

रात की ठहरी सी आशा,
रोज़ दिन रहता है प्यासा,
मरु सरीखी ज़िंदगी में,
क्यों है बाकी यह पिपासा; 

​क्या जवानी क्या लड़कपन,
दे दिया जितना भी था मन,
प्रेम लेकिन मिला जैसे,
ओस का अधजिया जीवन ;

 

Wednesday, October 18, 2023

 

इन दिनों कोई नहीं बुलाता हमें,
जैसे तुम बुलाते थे,
कोई और नहीं बताता हमें,
जैसे तुम बताते थे;

इन दिनों कोई नहीं जानता हमें,
जैसे तुम जानते थे,
कोई और मानता नहीं,
जैसे तुम मानते थे;

इन दिनों कोई नहीं है,
न बात करने को, न बात कहने को,
वो बात जो हम अक्सर करते थे,
जो सिर्फ हम समझते थे;

तुम्हारी चुप्पी,
शायद मनमर्ज़ी नहीं है,
नाजायज़ तो बिलकुल नहीं,
पर चुप्पी तो है ;

 

Wednesday, September 20, 2023

 

 

जब निकले हों हम तय करने,
किसी सड़क पर लम्बी दूरी,
चाहे थकन निरंतर टोके,
​पर चलना हो बहुत ज़रूरी;

ऐसे में यदि उसी सड़क पर,
लग जाए कोई ट्रैफिक जाम,
आगे पीछे दाएं बाएं,
जब हो जाएं बंद मुकाम;

तब गाड़ी में बैठे बैठे,
मज़बूरी कुछ यूँ घुलती है,
कितनी भी हो दौलत पास,
कोई राह नहीं खुलती है;

कोस कोस कर इस स्थिति को,
तब हम हैं थोड़ा पछताते,
बिना किसी आशा के फिर भी,
इधर उधर हैं फ़ोन घुमाते;

ढेरों प्रश्न हैं खुद से करते,
ऐसा कर दें ! क्या विचार है,
जब कि हम हैं स्वयं जानते,
उत्तर केवल इंतज़ार है;

तब समझौता कर लेते हैं,
जब कुछ समय बीत जाता है,
जो होगा देखा जाएगा,
मन फिर कुछ धीरज पाता है;

पर हमने क्या सोचा ऐसा,
जैसे दिल की कोई धड़क है,
दिखती नहीं किसी को लेकिन,
यह जीवन भी एक सड़क है;

कभी कभी इस जीवन में भी,
लग जाता है ट्रैफिक जाम,
आगे पीछे दाएं बाएं,
नहीं सूझता कोई मुकाम;

ढेरों प्रश्न हैं खुद से करते,
ऐसा कर दें ! क्या विचार है,
जब कि हम हैं स्वयं जानते,
उत्तर केवल इंतज़ार है;

 

 

Sunday, September 3, 2023

 

किसी ज़िद्दी से पौधे का,
टूट कर भी सांस लेना,
और उसी जगह पर,
बार बार उग जाना;
किसी का रुक कर चले जाना,
या जाकर फिर नहीं आना,
या परिचित से पथ पर,
न रहते हुए भी समझाना;
किसी का दिन की व्यस्तता में,
धुंधला हो जाना,
पर गोधूलि में,
अनायास छलक आना;
यही बताता है,
कि हम भावों से,
कभी रिक्त नहीं होते,
कोशिशों के बाद भी,
इससे अतिरिक्त नहीं होते;

उम्र की दोपहर बीत गयी,
तब जाकर ये जाना,
कि जज़्बातों के,
पैग़ाम नहीं होते,
परिणाम भी नहीं होते,
अवकाश होते हैं शायद,
पर आयाम नहीं होते।


Tuesday, June 27, 2023

 

मात्र एक अनुमति मांगी, इंकार कहाँ माँगा था,
हमने बस सपना माँगा, दीदार कहाँ माँगा था;

पूछे हैं सूखी आँखें टकटकी लगाए, राहों पर,
हमने बस अपना माँगा, संसार कहाँ माँगा था;

दरिया से कुछ दूर बसी जर्जर दीवारें कहती है,
हमने बस पानी माँगा, सैलाब कहाँ माँगा था;

गहरे सागर के तलहट में डूबा साहस बोल उठा,
हमने बस तिनका माँगा, पतवार कहाँ माँगा था; 

पूछ रहा है धर्म निरंतर, गिरते रोज़ आचरण से,
माँगा सिर्फ अनुसरण था,अवतार कहाँ माँगा था;

प्रश्न कर रहा समय को 'नीरज' उधड़ी हुई दरारों से,
थोड़ा बस जीवन माँगा, उद्धार कहाँ माँगा था;

 

Friday, June 23, 2023

 

ताउम्र रहे हमारे साथ,
जैसे बिन थामे से हाथ,​

​कुछ अनसुलझे हिसाब, ​
​​ कुछ अधबुने ख़्वाब,
​कुछ अनसुने सवाल,
कुछ अनकहे ज़वाब,
कुछ बंद नयन की बात,
कुछ बिन पायी सौगात,
कुछ उधड़े उधड़े गीत,
कुछ चुप्पी के संगीत,
कुछ पिघला पिघला रूप,
कुछ सहमी सहमी धूप,
कुछ चुभते चुभते शूल,
कुछ लज्जा जैसे फूल,

ताउम्र रहे हमारे साथ,
जैसे बिन थामे से हाथ,​

जब नियति ने,
कितने ही झरोखों से,
है हम सबको नवाज़ा,
फिर हम उम्र भर,
क्यों रहे देखते,
वह बंद दरवाज़ा ;



 

Saturday, June 17, 2023

 

जिसको चाहा था लिखना कभी उम्र भर,
वक़्त के सारे खत वो अधूरे रहे ;

गाँव के बाग़ में, खेत खलिहान में,
सांझ में, रात में, दिन के अभिमान में,
सुध भी रह रह कर आँखें भिगोती रही,
और सावन बरसता रहा आन में;

भीगने की जो ख्वाहिश कभी संग थी,
ख्वाहिशों के समंदर भी झूरे रहे,

जिसको चाहा था लिखना कभी उम्र भर,
वक़्त के सारे खत वो अधूरे रहे ;

आसमां सी ज़मीं अब है लगने लगी,
भोर होने तक रातें भी जगने लगी,
अपनी आवाज़ सोचा था पहुंचेगी पर,
दिल की चीखों को तन्हाई ठगने लगी;

शोर हासिल नहीं, जानता था मगर,
मौन के सारे पल भी न पूरे रहे,

जिसको चाहा था लिखना कभी उम्र भर,
वक़्त के सारे खत वो अधूरे रहे ;


 

Tuesday, May 16, 2023

 

छुट्टे सिक्कों की जमघट में,
चल निकले हैं खोटे कितने,
देखे हमने इस जीवन में,
बिन पेंदे के लोटे कितने;

रंग रूप में भेद न करते,
गोरा हो काला या भूरा,
इर्द गिर्द हरदम मंडराते,
जब तक स्वार्थ नहीं हो पूरा;

सब को बाप बनाना पड़ता,
चाहे जो हो सत्ताधारी,
ये भी नहीं सभी के बस का,
चमचागिरी काम है भारी;

देखा चमचों की महफ़िल में,
सभी तरह के नर और नारी,
कुछ ढोलक कुछ बीन बजाते,
कुछ करते ओहदे से यारी;

यारी से परहेज़ नहीं है,
सबको ये लगती है प्यारी,
पर जब सीमा लाँघ अचानक,
यारी बन जाती अय्यारी ;

तब विश्वास कहीं कोने में,
आँख बंद सोता रहता है,
लहरों के संग चलते चलते,
कुछ विवेक खोता रहता है;

दुनिया में हैं कई मेनका,
कामुकता का अंत नहीं है,
कहते हो पुरुषत्व जिसे वो,
मानव ही है, संत नहीं है;

एक दिवस तब ऐसा आता,
जब पहले विवेक मर जाता,
कर गरिमा से आँख मिचौली,
भंग तपस्या करके जाता;

लोभ, लालसा, मोह, पिपासा,
सब की अपनी अपनी भाषा,
अब वो है अधिकार मांगती,
जो पहले बस करती आशा;

जहाँ  परिश्रम हिल जाता है,
वहीं उसे सब मिल जाता है,
बिना योग्यता लाँघ सीढ़ियाँ,
चेहरा उसका खिल जाता है;

किन्तु यहाँ कब अंत है होता,
दोष लगा कर देती धोखा,
अंधियारे में कहीं मेनका,
एक दिवस जब भाग्य है सोता,

माना ओहदे की गल्ती है,
माना इच्छा भी पलती है,
वैध अवैध नहीं कुछ माना,
पर गरिमा कितनी सस्ती है;

पता नहीं है, कौन है जीता,
कौन है हारा, पता नहीं है,
टूट गए सपने और अपने,
क्या मर्यादा, पता नहीं है;





 

Saturday, April 22, 2023

 

 

बिखर कर जियो या बिखरा संवार कर,
लहरों के विपरीत बहो या उनसे हार कर,
गलत सही नहीं, ये तो अपना विकल्प है,
चाहे मन भर के जियो या मन मार कर ;

 

Sunday, April 16, 2023

 

भरे बाज़ार गोलियों की तड़तड़ाहट,
तब भी थी,
जब सी सी टीवी कैमरा न थे,
जब इतना मीडिया न था;
तब भी,
गोली सिर्फ दवा की नहीं होती थी,
तब भी डर अँधेरे में फुसफुसाता था,
और घर के हर बाहरी  दरवाज़े पर,
अंदर से ताला लगाता था;

उस भय का भी,
लोगों का अपना अपना तर्क है,
पर अब दुनिया देख रही है,
बस यही एक फ़र्क है;

यूँ तो हर इंसान,
किसी न किसी वजह से,
अंदर थोड़ा सा शर्मिंदा है,
पर वह क्यों देखे पड़ोस में,
कम से कम वह तो ज़िंदा है;

यह जो माहौल है,
और कुछ नहीं हमारी अपनी करनी है,
बस हमारे घर से दूर रहे पर ,
कहीं न कहीं तो रोज़ गोली चलनी है;

हर साल,
करते हैं भगीरथी का स्नान,
मानते हैं कि हम धुल गए,
और कर देते हैं इंकार,
कि हम भी,
इसी माहौल में घुल गए;

आज जब बैठो सड़क पर,
लेकर दोने में,
समोसा, छोले और खट्टी मीठी चटनी,
और कुल्हड़ भर चाय,
तो सोचना ज़रा की क्यों,
हक़ीकत सबब भी है,
और सबक भी ;