छोड़ना मुमकिन नहीं है,
वो भी जो हासिल नहीं है,
ख़्वाहिशों का इक पुलिंदा,
पूर्ण लेकिन कुछ नहीं है;
रात की ठहरी सी आशा,
रोज़ दिन रहता है प्यासा,
मरु सरीखी ज़िंदगी में,
क्यों है बाकी यह पिपासा;
क्या जवानी क्या लड़कपन,
दे दिया जितना भी था मन,
प्रेम लेकिन मिला जैसे,
ओस का अधजिया जीवन ;
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