Saturday, August 31, 2013

तू गर राह में फरमान सा न आया होता,
मैं ही होता था यहाँ और मेरा साया होता,
खुशबुओं से कोई निशान भी नहीं होता,
कागज़ों से जो कहीं दिल को लगाया होता,

जिंदगी यूँ ही नहीं कटती रोजगारी में,
गर कमाने का हुनर खुद में ही पाया होता,
ऐसे सब लोग मुझे छोड़ कर नहीं जाते,
कुछ अगर दर्द कहीं मैंने भी छुपाया होता,
एक घर हम भी कहीं पर तो बनाते 'नीरज',
बेचना खुद को सलीके से जो आया होता,

Friday, August 30, 2013

बूढ़ी शाख

कभी देखा है,
किसी पेड़ की शाखाओं को,
जैसे मदमस्त हवा में,
झूमती बालाओं को,
कोई शाख तिरछी नज़रों सी,
कोई मीठी छूरी सी,
कोई हिरनी सी चंचल,
कोई अभी अधूरी सी,
पर एक शाख,
जिस पर वजन है लदा,
संभालना चाहती है खुद को,
पर झुकी रहती है सदा ,
फिर एक दिन वो,
किसी बवंडर में फंस जाती है,
पेड़ जवान रहता है,
शाख बूढ़ी हो जाती है;

बहुत कोशिश करती है,
झूलती है, लड़ती है,
पर हवा और वज़न के दबाव में,
टूटकर गिर पड़ती है,
आज देखा किसी टूटी शाख को,
ज़मीन पर पड़ी थी ढेर,
फिर देखा कहाँ से गिरी,
आदमी था या पेड़।

Sunday, August 25, 2013

ये बासी सी शाम और धुंधली पड़ती डगर,
कहीं मैं, कहीं दोस्त और बेखबर सा सफ़र,
बसेरों को उड़ते पक्षी, देखा बहुत था 'नीरज',
आज याद बहुत आया उन्हें देख, अपना घर।

Friday, August 23, 2013

लूट खसोट, अत्याचार,
निर्मम हत्या, नर संहार,
सरे आम गुंडई , दुर्व्यवहार ,
काली कमाई, भ्रष्टाचार,
कुपोषित बचपन, दुराचार,
यौन शोषण, बलात्कार,
क्यों नहीं रहा लड़ने का दम,
जितना सहते रहे उतना कम,
ज़रा सोचो सैंतालिस के बाद,
रूपया अधिक गिरा है या हम ?

--
Neeraj

Saturday, August 17, 2013

बची कोई भी अब फरमाइश नहीं है,
क्योंकि अब अंजाम की ख्वाहिश नहीं है;
थी विषम में ही सदा जीने की 'नीरज' आदतें,
इस सरलता में कोई गुंजाइश नहीं है ; 

Tuesday, August 13, 2013

यादें क्यों कर हैं जगती, क्या सोना भूल गयी हैं,
क्यों बेनामी हैं आँखें, क्या बहना भूल गयी हैं,
अब तितली नहीं समझती, कोमल पुष्पों की बोली,
कब से रसपान पर बैठीं, क्या उड़ना भूल गयी हैं;