रास्तों के जुगनू
Sunday, August 25, 2013
ये बासी सी शाम और धुंधली पड़ती डगर,
कहीं मैं, कहीं दोस्त और बेखबर सा सफ़र,
बसेरों को उड़ते पक्षी, देखा बहुत था 'नीरज',
आज याद बहुत आया उन्हें देख, अपना घर।
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