Sunday, September 30, 2012

लगे  बर्फ भी तपने,
न हम रहे,  न अपने,
दफ़न हो जायेंगे यूँ ही,
ये कुछ सोते हुए सपने...

Wednesday, September 26, 2012

दिशायें साथ हैं फिर भी कोई ख्वाहिश अधूरी है,
किन्ही खामोशियों से भी नहीं होती ये पूरी है,
हमारे रहगुज़र की कीमतें अनमोल  हैं 'नीरज',
ये कुछ एकांत है ऐसा, दख़ल जिसमे ज़रूरी है;

.....when solitude needs an intrusion.

Monday, September 24, 2012

Every time the waves go back, they take some sand along...and there is this unseen minor struggle to get the foothold back....but it isn't difficult if one loves to face the waves....these waves of life keep challenging us.

वापस जाती ये लहरें अपने वेग से पाँव के नीचे की कुछ रेत भी साथ ले जाती हैं...ज़मीन से पैरों की ढीली पड़ती पकड़ पल भर के लिए संतुलन बिगाड़ सकती है...परन्तु यदि हम लहरों से प्रेम करते हैं तो तुरंत ही ये पकड़ फिर बनाते हैं... जीवन की ये लहरें हमें बार बार सीधा खड़े रहने की चुनौती देती हैं.

Tuesday, September 18, 2012

पहले मैं सोचता था कि कैसे कुछ लोग इतनी देर तक सो लेते हैं और आधे दिन का सूरज ही देख पाते हैं....बाद में जाना कि ये तो अपनी अपनी पसंद है...आधे दिन का सूरज देखो या पूरी रात का चाँद.

earlier i used to wonder as to how people can sleep this late and see only half a day's sun...later i realized that its each one's choice...half a day's sun or a full night's moon.
चलाये तीर तेरे तरकश में लौटा आऊंगा,
नादानियों की चपलता न समझ पाऊंगा,
उखड़ी साँसों में संभला हूँ इसलिए स्थिर हूँ,
अल्पमत की सरकार नहीं जो गिर जाऊंगा,

Monday, September 17, 2012

बरसाती मौसम में
अधखुले छातों पर,
उधड़े हुए ख्वाबों में
बिन ब्याही रातों पर,
जीवन के चौसर में
बीती बिसातों पर,
गुमसुम ख़ामोशी में
सादे जज्बातों पर,
क्यूँ हम आघात करें,
आओ फिर बात करें

Sunday, September 16, 2012

जिगर के उन्मुक्त उमंगों की कहानी थी कभी,
जब बढे, रोमांच की दिलकश जवानी थी कभी,
क्या हुआ जो आज फिर ये छोड़ कर हमको गई,
बचपने से साथ थी, आखिर गँवानी थी कभी;

Saturday, September 15, 2012

वक़्त ने था सब दिया

वक़्त ने था सब दिया,
पर आज फिर मन किया,

दफ्ती का घर,
तितली का पर,
कागज़ की नाव,
नीम की छांव,
भागना अफलातून,
कड़वी दातून,
गिल्ली और डंडा,
ठेले का अंडा,
ईंटों का विकेट,
अँधेरे में क्रिकेट,
गाँव का दंगल,
गुरूद्वारे का लंगर,
चवन्नी के समोसे,
परीक्षा रामभरोसे,
हांकने में सवा सेर,
जेबों में भरे बेर,
टी शर्ट बिलकुल रेड,
दूध और ब्रेड,
साईकिल कजरारी,
हाथ छोड़ सवारी,
किताबें निगोड़ी,
अमरुद की चोरी,
भीगना बेहाल,
कीचड़ में फुटबाल,
लप्पे और झप्पे,
गोलगप्पे,

वक़्त ने था सब दिया,
पर आज फिर मन किया,

Thursday, September 13, 2012

ये लम्हा चल पड़ा है फिर इसे तोहफा नया दे दो,
नहीं ये लड़खड़ाए अब, कोई ऐसी दवा दे दो,
कि भीतर राख के चिंगारी लेती सांस है नीरज,
इसे अब फिर से जलना है, ज़रा सी तुम हवा दे दो;

Wednesday, September 12, 2012

मचलती धारा की रवानी है,
कोई फिसलती निशानी है,
बिसरती  खोती  कहानी है,
भागती गुज़रती जवानी है,
कविता कोई बेगानी है,
या सिर्फ बहता पानी है !!!
जैसी हमारी सोच,
वैसी जिंदगानी है....
                         neeraj
आगे के चक्कर में,
आज का भी मलाल है,
कल क्या होगा,
ये बड़ा सवाल है,
जिंदगी के एक पड़ाव के बाद,
सब का यही हाल है...
महज़ आशंका है सब,
फ़िज़ूल का बवाल है,
ये कोई बिखरता सच नहीं,
बस सहमा हुआ ख़याल है,

Sunday, September 9, 2012

एक और दिन और बादलों का आसमां,
छिपा हुआ एक बड़ा सूरज शर्म से,
जगा दो अपने दिलों के जुगनू,
जगमगाने दो छोटे सूरज मर्म से..

Yet another day with a cloudy sky,
allowing the bigger sun to be shy...
time to illuminate the smaller suns,
in your hearts they stay, the firefly...
अमावस में जब,
खिडकियों के परदे समूचा चाँद सोख लेते हैं,
और तारे ख्व़ाब बनकर नहीं उतरते,
तब भी बंद आँखों में,
तुम जुगनू से जगते हो,
रह रह कर बनाते हो एक चाँद,
जिन्हें मैं तारों से सजाता हूँ,
अब नींद कहीं नहीं जाती है,
कल्पनाओं की चादर में लिपट,
हौले हौले चली आती है.....

Saturday, September 8, 2012

बंद आँखें सोचती हैं, तिमिर है, सो लो,
चीखती इस रात में भी कुछ नहीं बोलो,
कब तलक सोते रहोगे इन अंधेरों को, 
दिन निकलना चाहता है, आँख तो खोलो;
                          

Friday, September 7, 2012

सतरंगी ख्वाहिशों की ख्व़ाब ही निशानी है,
इन हाथों में रंग नहीं बस फिसलता पानी है;

Wednesday, September 5, 2012

इन दिनों फुर्सत कुछ नाराज़ रहती है मुझसे ;  वक़्त नहीं है उसके पास मेरे लिए / हमेशा ऐसा नहीं था...कभी मैं तसल्ली से बैठ कर बारिश की बूंदों को पेड़ों के पत्तों से झर झर झरते देखा करता था / एक अजीब सी कसमसाहट है दिल में, जैसे कुछ छूटता जा रहा है पीछे...जिसे छूटना नहीं चाहिए; रोज़मर्रा की जिंदगी जब बिलकुल रोज़मर्रा सी लगे तो समझ लेना चाहिए की बदलाव की दस्तक है / कुछ अपना ही लिखा याद आता है....

अब रात का मन रात में नहीं लगता,
दिन भी मेरे साथ साथ नहीं जगता;
रोज़ कैसे मन के अपने भाव हारूँ,
कुछ नया मिले एक मन फिर संवारूँ;
मूक दिखती चिड़ियों के संग फिर बोलूं,
जो चिपके हैं अधर से वो लिफ़ाफ़े खोलूं ;
कुछ अपना हार कर कुछ उन्हें  जिताऊं,
ऊब गया हूँ, कुछ वक़्त कहीं और बिताऊं;
 

Tuesday, September 4, 2012

To the mentors in my life...Happy teacher's day
डिग्रियां न होने से अज्ञान नहीं होता,
भौतिकता से मन आलीशान नहीं होता,
बस इतना ही तो सिखाया था गुरुओं ने,
मानवता से बड़ा कोई ज्ञान नहीं होता...
            

Monday, September 3, 2012

दिन हों अच्छे तो गल्ती भी मददगार होती है,
समझते सुख जिसे वो प्यास की अवतार होती है,
अब मनाते हो कि बह जाए हवाओं की तरह,
सब्र करो, रात की भी अपनी रफ़्तार होती है;
                         

Sunday, September 2, 2012

सब कहते हैं मत सोचो, मत देखो, मस्त रहो,
दुःख को कर अनदेखा, खुशियों के परस्त रहो;
कहने में क्या है, कोई पहल कर के दिखाए,
बिना ग़म के इस जिंदगी में मर के दिखाए,
मान लेंगे दिल, दर्द, जज़्बात लफ्ज़ हैं महज़,
कोई आंसुओं का भाव हंसी से भर के दिखाए,