Saturday, September 8, 2012

बंद आँखें सोचती हैं, तिमिर है, सो लो,
चीखती इस रात में भी कुछ नहीं बोलो,
कब तलक सोते रहोगे इन अंधेरों को, 
दिन निकलना चाहता है, आँख तो खोलो;
                          

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