Sunday, March 31, 2013

झरोखे

कुछ झरोखे हैं खुले हुए,
और कुछ अधखुले से,
विवशताओं में घुले से,
कुछ के पाट बंद हैं,
उनपर शायद कुछ पाबंद हैं,
कुछ ज़रा तरल से थे,
ढलान के साथ बह गए,
कुछ जमे हुए थे,
जो गर्मियों में पिघल गए,
कुछ ज़रा जिद्दी थे,
मौसम बदलते रहे,
पर वे
बस रह गए ....
यूँ सोचूं तो लगे है,
मीठी यादों से भरे,
ये कल और आज के सपने हैं,
झरोखे चाहे बंद हों या खुले,
ये सब मेरे अपने हैं,
ये कुछ लोग हैं,
जो मिले हैं राह में,
और अनुभूतियों का ,
एक वंश छोड़ गए हैं,
चाहे संपर्क में हों या दूर रहें,
मेरे अन्दर ,
अपना एक अंश छोड़ गए हैं .... 

Friday, March 29, 2013


वास्तविकता भी वास्तविकता से कितनी भिन्न हो सकती है, यह शहर मुझे बताता है। बेजान सड़कों की लम्बाईयों को नापती बेशुमार गाड़ियाँ और उन्ही गाड़ियों में दौड़ती जिंदगी। सब भाग रहे हैं; किसी और की खोज में ... और खोते जा रहे हैं स्वयं को ..एक और स्वयं पाने के लिए। यह शहर दोहरी वास्तविकता का सब से सजीव उदहारण है जो आप को नए आयाम दिखाता है, नई बोली सिखाता है, नई पहचान दिलाता है, नई प्रतिभाओं से मिलाता है ...बस आपका आपसे मेल नहीं करा पाता।

Wednesday, March 27, 2013


गुमसुम सी आँखों में हरी मुस्कान लाऊंगा,
ख्यालों में ही सही, बुलाओगे तो आऊंगा,
दिलों की आरज़ू शायद कभी न बन पाऊं पर,
मैं कोई साया नहीं जो अंधेरों में छोड़ जाऊँगा ..
                               --neeraj tripathi

Monday, March 25, 2013

धूप हुई ओझल नज़र से रात भी कुछ कह गयी,
शाम थीं दोनों सहेली फिर अकेली रह गयी,
एक जाने के लिए थी एक का आना था तय,
मिलन की इस कश्मकश में इक नवेली रह गयी,

उलझनों की भीड़ में खोकर ये जाना हमकदम,
प्रीत है ऐसी की कोई पल में जी ले दो जनम,
हर किसी को शाम में मिलता कहाँ दोनों जहाँ,
लाख सुलझाई मोहब्बत इक पहेली रह गयी .
                            .......  neeraj tripathi

Friday, March 22, 2013

तोहसे बस इतनी अरज गिरधारी,
अब के फागुन हमरी भी होवे पिचकारी ...
अक्सर बोलती हुई इन फिज़ाओं पर,
ज़बरन एक ख़ामोशी सी पसर आई है,
अवकाश है ये, सितारों ज़रा सब्र करो,
ये न सोचना की चाँद की सगाई है .....

Thursday, March 21, 2013

हम हैं ......................बस है,
तुम हो ..................... रस है,
बस इतना ही सच है ..

Sunday, March 17, 2013

निज़ी तुम थे,
और निज़ी थी वो बातें,
गुजरी थीं जिनमे रातें,
ऊँची मंजिलों के छज्जों पर,
आज सब आम होते देख,
दुःख होता है ...
माना मैं बुद्धिजीवी नहीं,
कार्यकुशल नहीं,
बड़ा भी नहीं,
पर आदमी तो हूँ ......

Saturday, March 16, 2013

तब था दिल को आज़माया, अब दिखाते हो बही,
इस भड़कती भीड़ में तुम भी सही, हम भी सही,
क्या बदल पाओगे 'नीरज' ज़िल्द अपनी पुस्तकों की,
सोचने को बहुत कुछ है, हल मगर कुछ भी नहीं।

Friday, March 15, 2013

....एक और अँधेरे का छिपना
....एक और भोर का बहकना
....एक और ख्व़ाब का जगना
....एक और सूरज का उगना
....एक और दिन का निकलना
.... एक और उम्मीद का संवरना 
दिशाओं को लकीरों से मिलाइये
जीने के लिए और क्या चाहिए ....

Tuesday, March 12, 2013

तब तुम नहीं रुके और एक बसंत गुज़र गया,
आज तुम नहीं हो तो इक और गुज़र जाएगा,
ये मौसम जिंदगी की मज़बूरियों का मोहताज़ नही, 
कल तुम रहो न रहो, फिर बसंत ज़रूर आएगा .....

ये ऊँचा नीचा रास्ता पार करने में मुझे कुछ पंद्रह मिनट का समय लगता है। इस्कॉन मंदिर के पीछे निकलता ये रास्ता मुझे नेहरु प्लेस मेट्रो स्टेशन ले जाता है  जहाँ से मैं ऑफिस के लिए मेट्रो ट्रेन पकड़ता हूँ। ये पंद्रह मिनट मेरे दिन के सब से सुखदायी क्षण हैं। एक भागती दुनिया के बीच में ठहरे हुए पंद्रह मिनट ...इन्हें मैं पूरा जीता हूँ। एक महीने के अंतराल के बाद जब दिल्ली लौटा और इस पथ पर अपने कदम बढ़ाये तो एक विस्मृत करने वाली रंग-बिरंगी छटा देखने को मिली। लाल हरे सफ़ेद पीले बैंगनी और न जाने कितने ही रंग फ़ैल गए हैं इस मैदान के आँचल में ...यह अलौकिक है ...घर में पिताजी की तबियत बिगड़ जाने पर महीने भर पहले जब मैंने दिल्ली छोड़ी थी, तब यहाँ महज़ कुहासा सा फैला रहता था और जाड़ों की धूप में कुछ मजदूर लम्बी पाइपों से पानी छिड़कते रहते थे। वहां जब मेरी रातें अस्पताल के कमरे में चिंता और आशंका के बीच कट रहीं थी, तब यहाँ अनेकों रंगों में जीवन पनप रहा था। यह सब सरल होते हुए भी आश्चर्यजनक है ....होठों से लुप्त हुई मुस्कराहट अनायास ही लौट आती है। मेहनत को धरती ने स्वीकारा है और बताया है की हर ख़ुशी का समय होता है ...प्रयास और प्रतीक्षा का कोई तोड़ नहीं है।

Tuesday, March 5, 2013

किन्ही रातों में अचानक कोई ख़याल आता है,
बिना मदिरा के कैसे ये आलम बहक जाता है,
छोड़ कर रस्मोरिवाज़, लाँघ दीवारेतहज़ीब,
ये मचलता बेतुका मन कहाँ कहाँ जाता है ....

Monday, March 4, 2013

काश हमारे दिल का भी इक कोना ज़रा सुनहरा होता,
काश तुम्हारे जेवर में कुछ उसके अंश का पहरा होता,
होता काश जिंदगी में दुःख का दरिया उथला उथला सा,
काश हमारे सुख का सागर सब रंगों से गहरा होता ......

Sunday, March 3, 2013

मूक आईना,
खामोश प्रतिबिम्ब,
और चुप्पी साधे परछाई,
अक्सर बहुत शोर करते हैं।
रोज़ इस शोरगुल में,
अपना अक्स ढूंढता हूँ,
इधर उधर से मिला जुला कर,
एक स्वयं बनाता हूँ,
और शोर में खो जाता हूँ,
एक दिन और गुज़र जाता है,
पर अगले दिन भी आईना बोलता नहीं .....