Sunday, March 31, 2013

झरोखे

कुछ झरोखे हैं खुले हुए,
और कुछ अधखुले से,
विवशताओं में घुले से,
कुछ के पाट बंद हैं,
उनपर शायद कुछ पाबंद हैं,
कुछ ज़रा तरल से थे,
ढलान के साथ बह गए,
कुछ जमे हुए थे,
जो गर्मियों में पिघल गए,
कुछ ज़रा जिद्दी थे,
मौसम बदलते रहे,
पर वे
बस रह गए ....
यूँ सोचूं तो लगे है,
मीठी यादों से भरे,
ये कल और आज के सपने हैं,
झरोखे चाहे बंद हों या खुले,
ये सब मेरे अपने हैं,
ये कुछ लोग हैं,
जो मिले हैं राह में,
और अनुभूतियों का ,
एक वंश छोड़ गए हैं,
चाहे संपर्क में हों या दूर रहें,
मेरे अन्दर ,
अपना एक अंश छोड़ गए हैं .... 

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