Wednesday, September 28, 2011

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी

आज फिर एक सांझ की है आने की तैयारी,
प्राकृतिक अंधेरों पर होगा कृत्रिम प्रकाश भारी,
चाहे अलौकिक कर दो या दे दो तिमिर उधारी,
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी...

क्या मेरे झुकने से ही होती है जीत तुम्हारी,
हैं भारी आँखें हरदम कोमल पलकों से हारी,
नशा हार का मुझको, बाज़ी हो या लाचारी,
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी...

पर जलता रहेगा दीपक, रातें हों चाहे बयारी,
जो दिल में फूल खिले हैं, हम सींचेंगे वो क्यारी,
चाहे नयनों में पिघलो, या मेघ बनो मल्हारी,
कुछ बात है  कि हस्ती मिटती नहीं हमारी...

Sunday, September 25, 2011

ढूँढने का आगाज़

कोई कहता है इनमे उदासी है,
कोई कहे विश्वास है,
कोई कहे एक आशा है,
कोई कहे उल्लास है,
किसी ने कहा अंतरभावना है,
किसी ने, अच्छा प्रयास है,
किसी ने सवालों का जवाब बताया,
किसी ने जवाबों पर सवाल उठाया,
किसी ने आत्मीय बताया,
कोई बस मुस्कुराया,
विविध प्रतिक्रिया मिलती है,
आभार है आप सब का,
मेरी कलम तो बस लिखती है;
बहुत से मौके आयेंगे,
जब मेरे भाव सब को नहीं भाएंगे,
माफ़ कर दीजियेगा,
मैं कोई कवि या लेखक नहीं हूँ,
कोई विदूषक नहीं हूँ,
एक अदना सा ठहराव हूँ,
असल जिंदगी में ज़रा घबराता हूँ,
इसलिए भाव,
कागज़ पर दर्शाता हूँ,
लेखन मेरा शौक ही नहीं है,
आप तक पहुँचने का ज़रिया भी है,
खुद को ढूँढने का आगाज़ है,
वरना डूबने को और दरिया भी है;

Friday, September 16, 2011

ये कैसी पहचान

उसके पास बहुत सी भौतिक वस्तुएं नहीं हैं,
साज़ो सामान, ऐशो आराम नहीं है,
यूँ तो एक संतुष्ट जीवन यापन के साधन हैं,
पर संतुष्टि की समुचित सीमाएं नहीं हैं,

अब वह अधेड़ हो चला है,
अब भी उससे सब की बहुत आशाएं हैं,
वह कोशिशों में बहुत समय बिताता है,
पर उसकी अपनी समस्याएं हैं.

उसने देखा है फिसलते इन हथेलियों से,
मछलियों की तरह रिश्तों को,
पकड़ता रहता है उन्हें वह उधार की तरह,
जैसे भरता हो हर महीने किश्तों को,

खट रहा है वह उस चक्की की माफिक,
जिसमें तेल निकलता है सरसों से,
क्या हुआ की वह अब भी आम है,
वह नौकरी कर रहा है बरसों से,

सब कहते हैं कि वह काबिल है,
पर कहीं दूर भटकता उसका मन है,
जो है, वह उसकी प्रतिभा से कम है,
जो नहीं, वह उसका अधूरापन है,

और इन सब की उधेड़बुन में,
आज उलझ गया उसका जीवन है,
क्यों कहते हो; यदि नहीं बुला सकते,
वहां से, जहाँ भटका इसका मन है,

वो कोई शीशा नहीं है,
कि उसमे अपना प्रतिबिम्ब देखोगे,
कोई मेज़ पर रखा गिलास भी नहीं,
कि आधा भरा या खाली देखोगे,

वो कोई विद्वान नहीं, धनवान नहीं,
कोई देव नहीं, दानव भी नहीं,
कोई रजा, रंक, भिखारी नहीं,
कोई सर्व गुण संपन्न मानव भी नहीं,

वो इक अदना सा इंसान है,
उसके भी कुछ अरमान हैं,
पर क्या कुछ भौतिक कमजोरी ही,
अब उसकी पहचान हैं,

ठीक है वह दर्शाता नहीं है,
पर वह भी तो ऐतबार करता है,
उसको जताने का ढंग शायद नहीं आता,
पर वह भी तो प्यार करता है,

किस्मत पर उसका ज़ोर नहीं है,
पर कोशिशें हज़ार करता है,
सुख का, साज़ो सामान, ऐशो आराम का,
वह भी तो इंतज़ार करता है,

उसकी भी दिली तमन्ना है,
वह जैसा है, अपनाया जाएगा,
उसके अपने भी अपने रहेंगे,
वह भी पहचाना जाएगा,

इसीलिए उसकी विनती है,
वह जैसा भी है स्वीकार करो,
एक मनुज के मनोभाव का,
यूँ ही न तिरस्कार करो,

जिस दिन वह जाड़े में बिखर जाएगा,
उसकी सिहरन से सब कांपोगे,
प्रतिभा को भौतिकता से,
मेरे आका; कब तक नापोगे.

Friday, September 9, 2011

दिल है तो धड़केगा भी

बड़ा लंबा सफ़र है,
धूप है, मेड़ों की,
छांव है, पेड़ों की,
कुछ सुस्ता लो,
पांव फैला लो,
यात्रा है ये,
कोई रेस नहीं है,
ज़रा रुक जाओगे,
तो कोई क्लेश नहीं है,
हौसला है तुम्हारा,
बढ़ेगा तो थकेगा भी,
और स्थिर है तो चलेगा भी;

किसे पुकारते हो,
क्यों पुकारते हो,
अधिकतर मायावी हैं,
क्यों दुलारते हो,
पहले खुद की तो सुनो,
कुछ और उम्मीदें बुनो,
चाहे कुछ देर बेमन से जियो,
पर एक प्याला और पियो,
उस तक बात जायेगी,
कहानी लौट आएगी,
समझेगा तो चुनेगा भी,
सोच है तो सुनेगा भी;

अब भी याद आता है,
कोई बात नहीं,
बिछड़ा दर्द कहाँ जाता है,
पर इसमें इसका,
कसूर नहीं है,
ये बस एक ठहराव है,
नासूर नहीं है,
कुछ समय और याद आएगा,
फिर दराजों में,
दफ़न हो जाएगा,
भीगा है तो फूलेगा भी,
याददाश्त है तो भूलेगा भी;

क्यों चेहरा लाल करते हो,
एक उलझन और इतना गुस्सा,
कमाल करते हो,
आँखें बंद हैं तो काली दिखती है,
खिडकियों को खोलो,
अब भी पूरब की लाली दिखती है,
ये दिल के मामले हैं,
दिलों से सुलझेंगे,
लहू भड़केगा,
तो और उलझेंगे,
आँधियों में खड़केगा  भी,
दिल है तो धड़केगा भी;

Thursday, September 8, 2011

मौत के बीच रहती है

विरह की औ मिलन की पालकी अब साथ चलती है,
कि अब खामोशियाँ, खामोशियों के साथ पलती है,
ये कैसा है नियम, तब्दीलियों का ऐ मेरे मौला,
कहीं पर दिन निकलता है, कहीं पर सांझ ढलती है;

ये कैसा आ गया है वक़्त कि अब तक़दीर कहती है,
तुम्हारी रूह है मज़बूत सभी दुःख सुख को सहती है,
कहीं पर हों धमाके या कहीं पर जश्न की हो रात,
ये कैसी जिंदगी है, मौत के जो बीच रहती है;

Monday, September 5, 2011

इतना वादा है

तमाम उम्र हवाओं में उड़ने की सज़ा,
ज़मीनी रिश्तों से कटने की मिली,लिए गम तलाशते रहे जिसे उम्र भर,
वो न मिला तो क्या, धूल गलियों की मिली;
न तब गुनाह था, न अब गुनाह है,
उसमे भी ख़ुशी थी, इसमें भी सबब है,
और ये लम्हे कितने भी बेदर्द लगें,
इनके गुजरने में एक हसीन अदब है;
आसान सी लगती, पर कहानी अजब है,
कमज़ोर सा चेहरा पर नूर गज़ब है,
बड़ा आसान है, बड़ा सादा है,
बातों में कम दिल में गम ज्यादा है,
कुछ और फुर्सत में हो लें ज़रा,
रहूँगा साथ, इतना वादा है....



Saturday, September 3, 2011

पहुँचने का ज़रिया

कोई कहता है इनमे उदासी है,
कोई कहे विश्वास है,
कोई कहे एक आशा है,
कोई कहे उल्लास है,
किसी ने कहा अंतरभावना है,
किसी ने, अच्छा प्रयास है,
किसी ने सवालों का जवाब बताया,
किसी ने जवाबों पर सवाल उठाया,
किसी ने आत्मीय बताया,
कोई बस मुस्कुराया,
विविध प्रतिक्रिया मिलती है,
आभार है आप सब का,
मेरी कलम तो बस लिखती है;
बहुत से मौके आयेंगे,
जब मेरे भाव सब को नहीं भाएंगे,
माफ़ कर दीजियेगा,
मैं कोई कवि या लेखक नहीं हूँ,
कोई विदूषक नहीं हूँ,
एक अदना सा ठहराव हूँ,
असल जिंदगी में ज़रा घबराता हूँ,
इसलिए भाव,
कागज़ पर दर्शाता हूँ,
लेखन मेरा शौक ही नहीं है,
आप तक पहुँचने का ज़रिया भी है,
खुद को ढूँढने का आगाज़ है,
वरना डूबने को और दरिया भी है;