Friday, September 16, 2011

ये कैसी पहचान

उसके पास बहुत सी भौतिक वस्तुएं नहीं हैं,
साज़ो सामान, ऐशो आराम नहीं है,
यूँ तो एक संतुष्ट जीवन यापन के साधन हैं,
पर संतुष्टि की समुचित सीमाएं नहीं हैं,

अब वह अधेड़ हो चला है,
अब भी उससे सब की बहुत आशाएं हैं,
वह कोशिशों में बहुत समय बिताता है,
पर उसकी अपनी समस्याएं हैं.

उसने देखा है फिसलते इन हथेलियों से,
मछलियों की तरह रिश्तों को,
पकड़ता रहता है उन्हें वह उधार की तरह,
जैसे भरता हो हर महीने किश्तों को,

खट रहा है वह उस चक्की की माफिक,
जिसमें तेल निकलता है सरसों से,
क्या हुआ की वह अब भी आम है,
वह नौकरी कर रहा है बरसों से,

सब कहते हैं कि वह काबिल है,
पर कहीं दूर भटकता उसका मन है,
जो है, वह उसकी प्रतिभा से कम है,
जो नहीं, वह उसका अधूरापन है,

और इन सब की उधेड़बुन में,
आज उलझ गया उसका जीवन है,
क्यों कहते हो; यदि नहीं बुला सकते,
वहां से, जहाँ भटका इसका मन है,

वो कोई शीशा नहीं है,
कि उसमे अपना प्रतिबिम्ब देखोगे,
कोई मेज़ पर रखा गिलास भी नहीं,
कि आधा भरा या खाली देखोगे,

वो कोई विद्वान नहीं, धनवान नहीं,
कोई देव नहीं, दानव भी नहीं,
कोई रजा, रंक, भिखारी नहीं,
कोई सर्व गुण संपन्न मानव भी नहीं,

वो इक अदना सा इंसान है,
उसके भी कुछ अरमान हैं,
पर क्या कुछ भौतिक कमजोरी ही,
अब उसकी पहचान हैं,

ठीक है वह दर्शाता नहीं है,
पर वह भी तो ऐतबार करता है,
उसको जताने का ढंग शायद नहीं आता,
पर वह भी तो प्यार करता है,

किस्मत पर उसका ज़ोर नहीं है,
पर कोशिशें हज़ार करता है,
सुख का, साज़ो सामान, ऐशो आराम का,
वह भी तो इंतज़ार करता है,

उसकी भी दिली तमन्ना है,
वह जैसा है, अपनाया जाएगा,
उसके अपने भी अपने रहेंगे,
वह भी पहचाना जाएगा,

इसीलिए उसकी विनती है,
वह जैसा भी है स्वीकार करो,
एक मनुज के मनोभाव का,
यूँ ही न तिरस्कार करो,

जिस दिन वह जाड़े में बिखर जाएगा,
उसकी सिहरन से सब कांपोगे,
प्रतिभा को भौतिकता से,
मेरे आका; कब तक नापोगे.

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