Sunday, July 21, 2013

वो अनकही बात पर यकीन किया करता है,
अपने आसमानों को ज़मीन किया करता है,
कर के हर बार सरेआम से परदा 'नीरज ' ,
खामशी की नज़्म को ग़मगीन किया करता है ;

Saturday, July 20, 2013

कुछ सपन औ आस हमने भी गढ़े थे,
पाँव चादर से मगर शायद बड़े थे,
अब सयानी सी हकीकत घूरती है,
कैसे कैसे ख़्वाब लेकर हम चले थे …

जिंदगी अभिप्राय क्या औ क्या है दोहन,
मुरलियों की तान है ओझल है मोहन,
जम गए क्यों पग जहाँ पर हम खड़े थे,
कैसे कैसे ख़्वाब लेकर हम चले थे ….

बिन भरे ही खेत में ज्यों धान बोता,
स्वप्न तो बस स्वप्न जैसा ही है होता,
हंडियां भूतल में गहरे पर गड़े थे,
कैसे कैसे ख़्वाब लेकर हम चले थे ….


Sunday, July 14, 2013

पर यह अंतिम गीत नहीं है

अविरल नदियों के कल कल में,
झरनों के फैले अंचल में,
चुगती चिड़ियों के चह चह में,
वर्तमान घड़ियों के शह में,
माना वह संगीत नहीं है,
पर यह अंतिम गीत नहीं है;

निष्छल कोमल उजले मन में,
सरल ह्रदय के भोलेपन में,
रौशन क्रीड़ा के आँगन में,
खिलती आँखों के दर्पण में,
माना अब वह जीत नहीं है,
पर यह अंतिम गीत नहीं है;

दान दया के धर्म भाव में,
शवरी के जूठे स्वभाव में,
आतिथ्यों के अहो चाव में,
सूखी रोटी के प्रभाव में,
माना अब वह रीत नहीं है,
पर यह अंतिम गीत नहीं है;
किसी सखा के नए सृजन में,
प्रणय प्रिये के अंतस मन में,
भीगी पलकों की धड़कन में,
जीवन की छिटकी कतरन में,
माना अब वह प्रीत नहीं है,
पर यह अंतिम गीत नहीं है;

---------- Neeraj Tripathi

As everyone seeks more and broader connectivity, the still, small voice speaks only in silence.

Tuesday, July 9, 2013

जब जब लिहाफ़ की सिलाई उधड़ जाती है,
और नज़रें सुई का छिद्र नहीं खोज पाती,
जब लालटेन की रुसवाई उजाला सोख लेती है,
और सलाखों से बिलाव की चमकती आँखें घूरती हैं,
तब तुम कहाँ जाते हो,
क्यों नहीं व्योम बनकर गली में उतर आते हो !

उजली पोशाकों में करिया करवाता है,
कोयल की बोली में कौवा बतियाता है,
विज्ञान का अधमरा मानव क्यों न शर्मिंदा हो,
कैसे विश्वास करें कि तुम अब भी जिंदा हो,
यूँ तो अभी भी खेतों की सरसों पीली है,
पर कई ओसारों में भरोसे की मिट्टी गीली है….