Saturday, December 21, 2013

अपने में मशग़ूल हो गए हैं सभी,
त्याग औ प्रेम की क्या फुर्सत है अभी;
कैसे समझा पाओगे तुम अगली पीढ़ी को,
ये फरिश्तों की धरती होती थी कभी ;

Sunday, December 15, 2013

खाली समय कितना कुछ भर जाता है ; एक आँकलन, एक सोच … एक मन ही मन तैयारी ; एक उड़ान लेता जहाज़ किसी अपने के साथ, कहीं बुढ़ापे से रोज़ संघर्ष करता बुढ़ापा, गाँव में दस्तखत देता जाड़ा, ट्रेन का रिजर्वेशन, कॉलेज की फीस, पानी मांगते गमले, दोस्त, नौकरी, किराया, पेट्रोल  …… खाली समय कितना कुछ भर जाता है ;

सूरज चढ़ते चढ़ते ठहर सा जाता है; मोबाइल पर उँगलियाँ हरकत करके फिर खामोश हो जाती हैं; हकीकत से रुबरु होना एक सबब भी है और सबक भी;
जिन हथेलियों पर आँसू रोपे थे वहाँ दूब अब भी हरी है; ​
​मँडराने दो मेरे इर्द गिर्द इस अजीब सी बेचैनी को; कल फिर सोमवार आने को है ​
​; पहिये अपने आप चलेंगे। ​

Wednesday, December 4, 2013

रिश्तों में तूफाँ के मंज़र सहने पड़ते हैं,
दिलों के कर्ज़ भी ताउम्र भरने पड़ते हैं,
बेशक हों ख्वाब सीमित, नींदों तक 'नीरज',
कुछ समझौते तो फिर भी करने पड़ते हैं;