Tuesday, January 31, 2012

चांदनी से नहा कर,
याद आती रही,
वो सुबकते रहे,
रात जाती रही;
कब ये सोचा था,
आँखों में रातें कटेंगी,
मोतियों को वफ़ा सी,
बहाती रही;
टीसें ये रह रह कर,
दुखती हैं क्यों,
जुगनुओं सी जलन,
टिमटिमाती रही; 
जो ये पीड़ा नहीं,
तो ह्रदय भी नहीं,
खुशबुओं सी हवा, 
मुस्कुराती रही;




एक बार जो अक्स अपना दिख जाए,
तो देखने का अंदाज़ ही बदल जाता है,
कल तक देखते थे आइनों में चेहरा 'नीरज',
अब हर चेहरे में आइना नज़र आता है;

Monday, January 30, 2012


जनवरी का आखिरी दिन भी कट जाएगा,
आज कलेंडर का पहला पन्ना फट जाएगा,
कैसे निकल जाते हैं दिनों के भंवर नीरज,
सब्र करो, रात का कोहरा है, छँट जाएगा;

Friday, January 27, 2012


तब कुछ नहीं दिखता था, कोहरे में वादियाँ थीं,
मशगूल दावतों में थे, शहरों में शादियाँ थीं,
अब खोजते फिरते हो क्यों, अपना वज़ूद 'नीरज',
कितना कुछ खो गया जब, आँखों में आंधियाँ थीं;





Friday, January 20, 2012

सब बटोरते बटोरते भी कुछ रह गया,
चुपचाप सुनते रहे, वक़्त कुछ कह गया,
तुम कुओं में रहे झांकते पानी का स्तर,
यहाँ ज़मीनों से एक समंदर बह गया;

Wednesday, January 18, 2012

वो अब अपना अक्स देखना चाहता है,
ख्वाबों के अलावा शख्श देखना चाहता है,
'नीरज' यूँ तो साथ रहते हैं साये सदा पर,
एक साया है, हकीकत देखना चाहता है,
कितना भी बदले जग, ये गाँठ है भावों की,
न तोड़ ही पाओगे, न जोड़ ही पाओगे,
कुछ ऐसे बंधन हैं, जो घुले रक्त में हैं,
कुछ भी कर लो इनसे, मुहं मोड़ न पाओगे;

Wednesday, January 4, 2012

पुराने सवाल

घर के कमरों में,
कपडे औंधे मुहं पड़े रहते है,
और कितना भी तह करो अलमारियों में,
रोज़ कुछ बढ़े रहते हैं,

जूठे बर्तन रसोई में,
आपस की जूठन सूंघते हैं,
सुबह साबुनों में नहला दो पर,
रात फिर वहीँ उंघते हैं,

खिडकियों के दर्रों में,
रोज़ गर्द जम जाती है,
जो हवाएं इन्हें ले कर आती हैं,
वो वापस क्यों नहीं ले जाती हैं,

गुसलखाने की बाल्टी में,
रोज़ कपडे फूलते हैं,
और चाहे जिस समय भी देखो,
ये बाहर डोरियों में झूलते हैं,

ये दाल, शक्कर, मसालों के डब्बे,
रोज़ लड़खड़ाते रहते हैं,
हम भी खाली हैं, हमें भरो,
अक्सर बड़बड़ाते रहते हैं,

रोज़ वही पहिये,
उन्ही रास्तों की धूल खाते हैं,
कभी हवा कम, कभी तेल कम,
ये कितनी भूख जताते हैं,

दफ्तर की मेज़ पर,
कागज़ जिद्द में अड़ जाते हैं,
और कितना भी सरकाओ,
रोज़ कुछ कागज़ बढ़ जाते हैं,

मोबाइल फ़ोन की आवाज़ों में,
सूरत नहीं दिखती,
पचासों बार हेल्लो बोलते बोलते,
निगोड़ी ज़बान नहीं थकती,

फिर स्कूल की फीस, मकान का किराया,
फिर बिजली का बिल, धोबी का बकाया,
क्यों ये बैंक का ए.टी.म रोज़ नज़र आता है,
कैसे तारीख़ की जगह महीना बदल जाता है,

क्या यही जिंदगी है !!
या ये महज़ रोज़मर्रा की बंदगी है,
क्या हम जबरन इसमें खुश हैं,
या इसके अलावा भी कुछ है,
क्या इन नियमों को कुछ भंग करें,
या पुराने रोज़मर्रा में नया रंग भरें,
क्या किसी कोने में महफ़िल सजाएं,
पर इस भीड़ में एकांत कहाँ से लायें,
क्या पुराना खोएं, नया पाएं,
या पुस्तकों पर नई जिल्द चढ़ाएं,
ऐसे बहुत से सवाल हैं,
और हम सब के अपने अपने जवाब हैं,
कुछ जवाब मुश्किल हैं, पर एक जवाब पाया है,
पुराने सवालों को हल करने, नया साल आया है.



कहते हैं जो गुज़र गए वो ज़माने नहीं आते,
जो डूब गए दरिया में वो मयखाने नहीं आते,
मान लेता मैं भी नीरज, छलछलाए हुए यदि,
जो बह गए आँखों से वो पैमाने नहीं आते;