Monday, November 15, 2021

 

वो भी दिन थे,
जब सर्द रातों में भी,
हथेली पर पसीना आता था,
बस कभी कभी ही,
कोई जुगनू टिमटिमाता था;

अंधेरों में कितने ही सपने,
देखे, टूटे, फिर देखे,
ख़्वाहिश थी कुछ मिले रौशनी,
कोई सपन तो इक उम्र तक पले, 
फिर तुम दिखे तो दीये जले;

आशंकाओं की हथेली पर,
चाहे बीत गयी कितनी ही दिवाली,
पर रौशन रहे आँखों में चिराग,
कभी न बुझे,
जब से देखा है तुझे। 

Tuesday, November 2, 2021

 

सारे दोस्त तुम बेशक ही मवाली रखना,
पर कम से कम उनमें एक सवाली रखना;

मुसीबत कभी अकेली ही नहीं आती,
बन्दूक भी जो रखना तो दुनाली रखना;

ख़ुशहाली से नीयत भी बिगड़ सकती है,
कभी कभी अलमारी भी खाली रखना;

मुस्कुरायेंगे लोग कागज़ के फूलों जैसे,
पर तुम भी अदा अपनी निराली रखना;

जब न रहेंगे दीये घरों की चौखट पर,
तुम तब भी इन आँखों में दिवाली रखना।