न थोड़ी दूर की सोचना,
न अंजाम समझना,
चुनिंदा परदों के पीछे,
खुद को बहलाना,
बहुत आसान होता है,
बहती धारा संग बह जाना,
कभी कभी हमारी सोच,
प्रवृत्ति से अलग होती है,
भावनाओं के आगोश में,
इन्द्रियाँ कहाँ सजग होती हैं;
माना ज़रूरी है,
कुछ पल खुद में जीना भी,
पर क्या बर्दाश्त होगा,
यदि पड़े गरल पीना भी,
यूँ तो बहुत अखरता है,
इन आँखों का भर जाना,
पर कभी कभी ज़रूरी होता है,
