Saturday, December 27, 2014

राह चलते हर कोई अपना नहीं होता,
जो मगर होता है वो सपना नहीं होता,
दोस्त ही कहते हैं नीरज अपनों को ठरकी,
सपना अपना हो भी तो अपना नहीं होता,

Monday, December 8, 2014

There is the story of a river
who inquired of a poet;
everyday my two banks hold me by my arms,
and make me walk a given path;
and, everyday, on my back, i carry
boats full of people to the other side.
Everyday, like adolescent children,
the waves write something on my chest.
Can it not be
that someday nothing happens
nothing at all
and i put my back to my bed
and remain motionless for one evening
just still
like a poem lies inert after being read
unmoving, at rest?
---------------------(anonymous)


एक कहानी है नदी की,
जिसने पूछा एक कवि से,
कि रोज़ मेरी बाहों को थामे रहते हैं ये दो किनारे,
और ले जाते हैं मुझे एक तय राह पर,
और रोज़, लोगों से भरी नौकाओं को,
ढोती हूँ अपनी पीठ पर,
दूसरे किनारे तक।
हर रोज़ किन्ही वयस्क बच्चों की तरह,
लहरें कुछ लिख जाती हैं मेरे सीने पर।

क्या ऐसा हो सकता है,
कि किसी दिन कुछ न हो,
कुछ भी नहीं,
और मैं, टिकाकर अपनी पीठ अपने ही तल से,
एक शाम अविचल रहूँ,
स्थिर,
जैसे स्थिर रहती है कविता पढ़े जाने के बाद,
​शांत , गतिहीन।

​a translation of an anonymous poem
Neeraj

Saturday, August 16, 2014

जब दूसरे की तक़लीफ़ अपने से ज्यादा हो,
और दूसरा कोई दूसरा न हो, अपना हो;
तो अपनत्व कैसे जताएं;
उसकी सुनें या अपनी बताएँ   …।

Tuesday, June 17, 2014

कैसे ज़माने कि समस्याएँ सुलझ जाती हैं,
अपनी उलझनें उलझनों सी उलझ जाती हैं ,
पुरानी सुलझाने में ही झुर्रियाँ चढ़ गयीं और,
नई बरसाती कुकुरमुत्तों सी पनप जाती हैं;

Monday, April 14, 2014

मर्ज़ जाता ही नहीं यादोँ का,
कैसे लम्हो की दवाई दी है;


खोयी हुई नींद तुम चली आओ,
हमने फिर खुद की सफ़ाई दी है;


रात को ओढ़ चाँद का घूँघट,
दिन में कैसी जगहंसाई दी है;


​आज फिर तुझको बंद नज़र करके,
हमने फुर्सत को रिहाई दी है;​
                 

Thursday, April 10, 2014

याद है अब भी ,
बचपने की वो कच्ची सड़क,
गाँव की,
और उस पर दौड़ती पुरानी जीप,
लाउडस्पीकर और ढेर सारी धूल;
और पीछे भागते हम,
न कोई शिकवा न कोई गम;
जीप में से लहराते पर्चे,
हवा में उड़ते,
कुछ काले कुछ रंग बिरंगे,
और कुछ फेंके गए बिल्ले,
जो थी हमारी जागीर,
जिनमे थी तस्वीर,
दो जोड़ी बैल,
बछड़े को दूध पिलाती गाय,
कंधे पर हल रक्खा किसान,
तब क्या पता था,
कौन साहूकार कौन बेईमान,
तब चुनाव के माने थे वे पर्चे,
और इकट्ठे किये वे बिल्ले,
जब भी गोलियां खेलते,
ये बिल्ले ही दांव पर लगते;
तब वोट एक शब्द था,
जिसे औरतें गाती थीं,
चाव से,
"चला सखी वोट देई आई,
मोहर गैया पर लगाई "

आज भी वोट एक शब्द है,
आज भी वह दांव पर लगता है,
आज भी,
उस पर दांव लगाया जाता है,
आज भी सब साहूकार हैं,
और सब बेईमान,
आज भी कंधे पर,
हल ढोता है किसान;
आज पक्की सड़कोँ पर,
गाड़ियो का कारवाँ,
ढेर सारी धूल,
झोँक जाता है,
इन खुली आँखोँ में,
आज भी चुनाव का मतलब,
कुछ पर्चे हैं,
हरे रंग के,
आज भी वोट एक शब्द है;

                 ----- नीरज त्रिपाठी 

'तुम दिल्ली का दरवाज़ा खोलो,
हम बस दिल को दस्तक दें दें '

Friday, March 14, 2014

क्या पता सामर्थ्य होती तो ज़रा हम भी अकड़ते,
या किसी का वास्ता देकर कहीं हम भी जकड़ते,
आज 'नीरज' ज़िन्दगी कुछ रूठकर यह पूछती है,
रूह की यदि नब्ज़ होती तो कलाई क्यूँ पकड़ते;

Saturday, March 1, 2014

पंख कट जाने से हासिल ​​कुछ नहीं होगा तुम्हे,​
है अगर समरथ तुम्हारी हौसलों को रोक लो;

बाँध कितने भी बनाओ वेग में सम्भले नहीं,
तुम में इतना ज़ोर है तो बादलों को रोक लो;
जंग के विस्तार से अब मेल ठहरेगा नहीं,
हो बहादुर तो दिलों के वास्तों को रोक लो;

क्यूँ हुनर को रोकते हो ओहदों की सरज़मीं से,
जो अगर तुम हो खुदा तो रास्तों को रोक लो;
पलकें झुका कर क्या था कहा,
नयनोँ से क्या था बरबस बहा,
​​​आँखें खुलीं तो फिर न मिला,
स्वपन का खोया​…खोया ही रहा।

Friday, February 14, 2014

a translation

I thought of brooming the stars,
Picking the Moon and letting it rest against the wall of the sky,
To make space for love.
Also, I wanted to rake the trees, level the mountains,
...Soak the oceans and mop the rivers,
To make space for love.
On second thoughts,
I let them be,
To camouflage
You and me.
By- Manji Kaur Handa
My Translation
सोचता था कि सितारों, पर ज़मीं को साफ़ करके,
और चंदा को टिकाकर, मैं गगन के आसरे से,
कुछ चमन खाली बनाऊं, प्रेम कि अभिव्यक्ति खातिर.

चाहता था खोद डालूं , वृक्ष के भूतल किनारे,
कर दूँ समतल इस धरा के, मस्त से परबत ये सारे,
सोख कर सारा समंदर, और नदियों की रवानी,
कुछ धरा खाली सजाऊं, प्रेम की अभिव्यक्ति खातिर.

किन्तु चंदा और तारे, वृक्ष औ पर्वत हमारे,
सारी नदियाँ सागर सारे, ये दिशायें ये किनारे,
घोल लेते हैं हमें, हैं प्रेम की अभिव्यक्ति सारे.

ये नहीं तो क्या गगन है, ये नहीं तो क्या चमन है,
प्रेम की तो ढाल हैं ये, प्रेम का इनसे सृजन है,
आओ इनको हम बचाएँ, प्रेम की अभिव्यक्ति खातिर.
पूरब की बयारों में,
जो अरमां उड़ा करते थे,
बड़े खामोश से,
सहमे से बैठे हैं,
कहीं कुछ
थम गया है शायद....

मचलती गर्मियों में,
दिल- ए -शरबते,
बरफ की सिल्लियों पर,
चुपचाप जलते हैं,
कहीं कुछ,
जम गया है शायद....

गुज़रती रातों में,
जो जुगनू थे रौशन,
अंधेरों में वो अपनी,
राहें ढूंढते हैं,
कहीं कुछ,
जल गया है शायद....

हताशाओं के मंज़र पर,
जो हिम्मत मुस्कुराती थी,
विवशताओं में अपनी वो,
निशानी खोजती है,
कहीं कुछ,
मर गया है शायद....



सब ने कहा सच्चे इरादों में दम होता है,
पर मुरादें सब हों पूरी, ऐसा कम होता है,
हौसला अफजाई कि बात और है'नीरज',
अक्सर घरों में एक कमरा कम होता है...
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हुजूर कहते हैं कि पाजिटिव लिखो,
कैसे समझाएं उन्हें,
एक और कमरे कि चाहत भी पाजिटिव है,
जिंदगी से समझौते कि आदत भी पाजिटिव है,
शब्दों के अर्थ हम बेशक अपने निकालें,
चाहतों कि चाहत भी पाजिटिव है....
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परिवर्तनशील जिंदगी

कमरे में  कुर्सियों की पहचान बदल जाती है,
दूधवाले भैया की मुस्कान बदल जाती है,
चिड़ियों के सुरों की तान बदल जाती है,
रोज़मर्रा के चीज़ों की दुकान बदल जाती है,

बदल जाती है सरसराहट नल के आने की,
बदल जाती आवाज़ दरवाज़ा खटखटाने की,
बदल जाती जगह अखबार को पाने की,
बदल जाती है खिड़की रोशनी अन्दर आने की,

घर खुला रखने की परेशानी बदल जाती है,
किसी के घर में होने की निशानी बदल जाती है,
महज़ एक मकान बदल लेने से,
हमारी कितनी जिंदगानी बदल जाती है,

दोस्तों, यूँ तो बदलाव की अपनी मीठी थकान है,
पर हमारा जीवन भी एक किराए का मकान है,
ठहराव है, बदलाव है, रोज़ नया आयाम है,
परिवर्तनशील जिंदगी, तुझे मेरा सलाम है.
वीरान रातों में दिये नहीं टिमटिमाते,
जुगनू अब जैसे दिन में निकलते हैं,
सोचा था कभी तो तन्हा होऊंगा पर,
ये सन्नाटे हमशक्ल से, साथ चलते हैं.....
ज़रा सा छेड़ दो तो ये कहाँ चुपचाप सहती हैं,
ज़रा बिखरी, ज़रा जिद्दी, ज़रा मशरूफ़ रहती हैं,
कसक हैं ये मियादों की, ये इक मुद्दत की यादें हैं,
मेरे दिल के घरोंदों में बड़ी महफूज़ रहती हैं,
इस जाड़े के शाम की सहमी धूप अब गुज़र जाना चाहती है I गार्डेन पाम के वृक्ष सीधे खड़े हैं;  बिलकुल मौन जैसे निस्तब्धता को सार्थक कर रहे हों I बिजली के तारों पर बैठी चिड़ियाँ न जाने क्या आने या जाने की प्रतीक्षा कर रही हैं I लान में जबरन फैलाई गई हरी घास ओस से मिलन की आस में रात की बाट जोह रही हैं I अहाते की फेंसिंग पर लगे नारंगी फूल अब भी नारंगी ही दिखते हैं I बरगद की झूलती जडें धरती से चार फीट ऊपर ही रहती हैं I सब कुछ तो रोज़ की तरह ही है; बस एक और दिवस है जो भाग जाना चाहता है I मुझसे, तुझसे, हम सब से दूर.....कहीं और उजाला होगा; कहीं और कुछ हसरतें खुमारी आँखों में जगेंगी; कुछ रेशमी सी किरणें कहीं बर्फ पर पड़कर चांदी सी चमकेंगी; कहीं और दुनिया सजेगी; कहीं और जिंदगी चलेगी....
देख कर मंज़र ये ऐसा क्यों लगा,
मन भरा पर आँख बाकी रह गयी,
देर से पहुंचा सवेरा आज क्यों,
रात की कुछ बात बाकी रह गयी,

पहले आती नहीं थी, अब खुलती नहीं है,
नींद भी मेरी किस्मत की तरह हो गयी है।
कुछ यादों का बिछौना भी बना लेना,
महज़ लिहाफ़ों में ये सर्द रात कटे  .... न कटे,
किसी कि फ़िक्र हो शायद किसी का ज़िक्र हो शायद,
सूरज ओढ़ कर सोना, ये कोहरा छंटे  .... न छंटे।
तेरा रुतबा है तो मेरा भी ईमान है ,
तेरे सितम से जूझना मेरा गुमान है,
सबने सोचा था बिखर जाऊँगा इन थपेड़ों से पर,
मेरी मौज़ूदगी ही आज मेरी पहचान है।

Thursday, February 13, 2014



खुद का गम साझा न कर मुझपर मेहरबान है,
मेरा मददगार देखो कैसा बेईमान है।

कुछ हम करें इकठ्ठा,
कुछ तुम बिन लाओ,
मचियों पर बैठें चरों ओर,
और अलाव जलाओ,
कुछ तापो कुछ कहो,
कुछ सुनो कुछ धुआँ भगाओ,
आलू शकरकंद भूनो,
फिर मिलकर खाओ,
मर्ज़ी है दुबका रजाई में,
या इस जाड़े को उत्सव बनाओ।

सुबह से सूरज नदारद,
दिन भर सर्द हवाएँ,
फिर शाम को बारिश,
दिल लगाएँ या दर्द बचाएँ ?
सुबह आशा  … शाम उदासी क्या ;
धूप तो धूप है  .... ताज़ा और बासी क्या।
न ही कोई निराशा है न ही कोई मज़बूरी है ;
पर दोस्त … सितारों को देखने के लिए,
थोड़ा अँधेरा ज़रूरी है।
अब इलाहाबाद पहले जैसा नहीं लगता। पर सब कुछ तो वही है … वही सडकों के किनारे खुदे गड्ढे, वही धुआँ उगलती गाड़ियां, वही गलियों में भरा टूटी पाइपों का पानी, वही ज़िद्दी जाड़ा, वही अनमना सूरज, वही फूल सी झड़ती गालियाँ .... सब कुछ तो वही है। यह एहसास पहले कभी नहीं हुआ कि कोई जगह मात्र इसलिए बदल सकती है क्योंकि हमारे वहाँ आने का कारण भिन्न है।
कोहरा अब छँटता है तब भी रह जाता है; धूप आकर भी नहीं आती है; रात जगते जगते सोती है; दिन काट काट कर कटता है; बिजली का आना जाना मायने नहीं रखता; इन्वर्टर कि बैटरी सांस लेते लेते दम तोड़ देती है … साल भर पहले बाथरूम में औंधी रक्खी बाल्टी अब भी औंधी ही पड़ी है; जब कष्ट आता है तो वक़्त थम जाता है।
आँखों में जब दर्द रिस आता है तो लहू भी थम जाता है; अस्पताल और घर के बीच की दूरी कभी इतनी याद नहीं थी; आज इतवार है शायद .... पर उससे क्या .... कोई शिकायत कि अर्ज़ी थोड़े ही लगानी है; ईश्वर का अपना फैसला है … कहते हैं वह बड़ा ऑटोक्रेटिक है।
कितने ही रंज तूने राह में बिछाये हैं,
दो पल के बीच दिए कैसे स्याह साये हैं,
तेरी बारीकियाँ तो तू ही जानता है मगर,
हम भी ज़िद्दी हैं चलने के लिए आये हैं,

मीलो मील पड़े चलना तो ज्यादा क्या है,
ज़िंदगी और बता तेरा इरादा क्या है …।
पथरा गई हैं राह की वीरानियों में,
बुझ गई हैं उम्र की कुर्बानियों में,
झिलमिलाकर चुलबुली सी हो गई हैं,
देख कर तुमको कहीं नादानियों में;

आँख से उपजा सजल औज़ार क्या है;
क्यूँ तुम अब भी पूछते हो प्यार क्या है …?