Sunday, November 18, 2012

चलो कि जिंदगी की रैलियाँ फिर से बुलाती हैं,
चलो कि अनबुझी पहेलियाँ फिर से बुलाती हैं,
कभी जो सो रहीं थी धुंध सी 'नीरज' की नींदों में,
चलो कि राह की अठखेलियाँ फिर से बुलाती हैं

time to move on...........

Thursday, November 15, 2012

बचपना कभी जल्दी में छू कर निकल जाता है ; और कभी बर्फ सा जम जाता है ...और फिर पिघलता नहीं I
दो आँखें अपनी चमक से जगमगाहट देखती हैं ...और ये सिलसिला कुछ दिनों तक चलता है।
फिर रोज पूरब से एक नई आस होती है पर रोज वही सूरज फिर उसी अंदाज़ में जगता है ...कहीं कुछ नहीं बदलता।
कितनी ही दीवाली इन आँखों से गुज़र जाती हैं  ...दूसरों की रौशनी में ;
तब ये कुछ नहीं कहतीं ...विधाता का तर्क देखती हैं ;
फिर एक दिन यही दो आँखें ....किन्ही सहमी सी खामोशियों में फर्क देखती हैं।
कभी सूखी आँखों से फर्क देखा है ...

Monday, November 12, 2012

अबकी दिवाली मना लेना,
चरागों को भीतर सजा लेना,
आतिशी से अलग मन के लिए,
कुछ रौशनी बचा लेना ,
इन दीयों की लौ से परे,
जब स्याह फिर पग धरे,
तब हौसलों के चरागों से ,
मन का दीया जलाना ,
अबकी नीरज न मुरझाना ....

Friday, November 9, 2012




ये बंज़र ज़मीनों का नसीब है नीरज,
नाउम्मीदी भी रही और इंतज़ार भी .......
बूँद बूँद नमी बहती रही नसों से,
अंजाम ढूंढते रहे,
डूब गए दरिया कितने पर हम,
सैलाब ढूंढते रहे ...
मिले न मिले वो आदमी जो मैं था ,
वापसी ही लेकिन इक रास्ता है 'नीरज'.