Thursday, November 15, 2012

बचपना कभी जल्दी में छू कर निकल जाता है ; और कभी बर्फ सा जम जाता है ...और फिर पिघलता नहीं I
दो आँखें अपनी चमक से जगमगाहट देखती हैं ...और ये सिलसिला कुछ दिनों तक चलता है।
फिर रोज पूरब से एक नई आस होती है पर रोज वही सूरज फिर उसी अंदाज़ में जगता है ...कहीं कुछ नहीं बदलता।
कितनी ही दीवाली इन आँखों से गुज़र जाती हैं  ...दूसरों की रौशनी में ;
तब ये कुछ नहीं कहतीं ...विधाता का तर्क देखती हैं ;
फिर एक दिन यही दो आँखें ....किन्ही सहमी सी खामोशियों में फर्क देखती हैं।
कभी सूखी आँखों से फर्क देखा है ...

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