Friday, December 28, 2012

कल भी लाठियां थीं,
और थी हमारी पीठ,
कल भी तुम हारे थे,
और हुई थी हमारी जीत,
तुम अब भी सोते हो,
और तुम्हारी लाठियाँ,
करती हैं मनमानी,
तुमने पनाह दी है दरिंदों को,
पर तुमने अवाम की,
ताक़त नहीं जानी,
मुश्किल नहीं है ओहदों में,
तुम्हारा ढीठ होना,
पर आज भी सुधार के लिए,
लाठी होने से ज़रूरी है,
पीठ होना ...

Wednesday, December 26, 2012

किसी कोने सिसकती हसरतों से,  
अब भी नयन हम मूंदते हैं,
बड़ी शिद्दत से लेकिन आज भी हम,
खुद को खुद में ढूंढते हैं ...

Sunday, December 23, 2012

जाड़ों की रात आज फिर शीत उगलेगी,
पर कोशिशों से स्थिति ज़रा और संभलेगी,
हमारे साथ थोड़ा सब्र रखना दोस्तों,
विषम ऋतु है, बदलते बदलते बदलेगी ...

Thursday, December 20, 2012

अभी भी कर गुज़रने का कोई फरमान बाकी है,
अभी इन दोस्तों के साथ का अरमान बाकी है,
कभी यह न समझना आइनों सा टूट जाऊँगा,
अभी इन बाजुओं में जिंदगी की जान बाकी है ...

Wednesday, December 19, 2012

कोई शर्म नहीं कि कुछ मौकों को भुना नहीं ,
हुए हाथ बहुत दूर पर हर्ज़ क्या है, जुदा नहीं,
करवट वक़्त की 'नीरज' हमें आगाह करती है,
कभी हमने कहा नहीं, कभी तुमने सुना नहीं,

Tuesday, December 18, 2012

कब तक खाली बातें ही खन्गालोगे
क्या भेड़ियों को शहर से निकालोगे,
वो कहीं और जाकर बस जायेंगे,
और मासूमियत को यूँ ही उजाड़ेंगे,
क्या इतनी हिम्मत बटोर पाओगे,
इन्हें रुखसत इस जहान से कराओगे,
क्योंकि ये 'कुछ' नहीं हैं, बहुत सारे हैं,
जिंदा शरीर से हैं, आत्मा से मारे हैं,
ज़रुरत है हम सब को सावधान करें,
मिलकर इन भेड़ियों का समाधान करें,
कानून और प्रशासन के सहारे न बैठें,
खुद शेर बनें, बस खाल ओढ़ न एंठें,
खुदगर्ज़ हम, खुदगर्ज़ हमारा रहन सहन है,
पर याद रहे इसी जंगल में बेटी है,बहन है ...

Monday, December 17, 2012

दर्द भरी शाम की पनाह से,
रात की बेदर्दी सौगात तक,
ठिठुरती भोर की सलाह से,
शर्माती धूप के जज़्बात तक,
बिसरा कब तन औ धन दिया,
आज बस जीने का मन किया ....

Wednesday, December 12, 2012

बहुत की कोशिशें लेकिन निगोड़ा गम नहीं जाता,
सुबह अब भी लजाती है, ये कोहरा छंट नहीं पाता,
मेरी मजबूरियों की 'नीरज' कुछ तस्वीर ऐसी है,
लिफाफा रोज़ खुलता है, लिखावट पढ़ नहीं पाता ....

Tuesday, December 11, 2012

कुछ है जो जागने नहीं देता ... और उठ कर के लाख कोशिशें कर लो, फिर सोने नहीं देता ....परिस्थिति वक़्त के साथ सहानभूति भी रखती है और झुंझलाहट भी ... यह अजीब है क्योंकि मस्तिष्क अक्सर कई ऐसी स्थितियों को मानने से इनकार कर देता है जिन्हें ह्रदय सहर्ष स्वीकार कर लेता है ...वह इसे intellectual simulation कहता है ...बौद्धिक अनुकरण .

 सब कुछ ठीक चलता है ....अपनी रफ़्तार से ...क्योंकि सफ़र तो अभी प्रारंभ हुआ है ...ये रास्ता ही अपने आप में एक मंजिल है ...मील के पत्थर पड़ाव हो सकते हैं पर सफ़र का काम तो चलना ही है ....लगातार रातों का काम दिन की आँखों पर भारी पड़ने लगता है ....कोई  सुपरमैन नहीं है ...पर जहाँ तक बन पड़ता है, करता है ...दिल की पीड़ा आँखों की थकान में घुली रहती है ...दर्द से निपटने के हम सब के अपने तरीके होते हैं ...मैं कुछ नहीं पूछता .

एक जन्मदिन पर माँ का वात्सल्य बंट जाता है और एक दुआ ह्रदय से निकलते ही टूटते तारे में समा जाती है ...धुओं के अस्थायी गुबार से होती हुई। कभी कभी नाम के मायने नहीं होते ...हाथों से बनाये व्यंजनों और जाम से गुज़रते हुए अस्पताल की चौखटों तक ये रिश्ते बेनाम ही रह जाते हैं ...शायद ये दूसरी दुनिया के रिश्ते हैं जो कहीं अधूरे रह  गए थे ... जैसे ये पहले भी था ...वैसे ही जैसे स्वप्न में फुटबॉल खेलते हुए हम कई गोल दाग देते हैं और जागने पर कुछ देर तक वह एहसास हमारे साथ रहता है ...यह सब अदभुत है ...खुशकिस्मती शायद किसी और नाम से मेरे पास आई है।

Sunday, December 9, 2012

आप की शुभकामनाओं से,
अथाह स्नेह से,
आप के प्रेम से,
चहकती मंगलकामनाओं से,
कुछ संजीदा भावनाओं से,
भर गया हूँ,
कृतज्ञ हूँ और खुशकिस्मत भी,
गर्व भी होता है,
और आती है हिम्मत भी,
इश्वर आप सब को,
ढेर सारी ख़ुशी दे,
बेहतर सेहत दे,
मुश्किलों में हंसी दे,
ज़रूरी ये है,
कि एक दूसरे के लिए हम हैं,
बहुत कुछ और कहता मैं,
पर मेरे पास,
धन्यवाद कहने के लिए,
शब्द कम हैं...

Sunday, December 2, 2012


लिहाफों के घरोंदों में तमन्ना भी लजाती है,
कभी जिंदा थी साँसों में, इमारत ये बताती है,
बड़ी मुश्किल से 'नीरज' आँख में ये पौ उतरती है,
ये जाड़े की सुबह तन्हाई में कितना सताती है ...
एक सफ़र का और इस्तकबाल करें,
पर इस बार कुछ तो बेमिसाल करें
बहुत सुन लिए दिमाग की 'नीरज',
चलो एक बार दिल का ख़याल करें ...
कुछ लुटा सकूँ ऐसी भी कमाई दे दे,
सब आसान लगे जिससे, दवाई दे दे 
इतनी फकत रह गई ख्वाहिश 'नीरज'
मेरे लफ़्ज़ों को मेरी रूह से रिहाई दे दे ...