Thursday, June 30, 2011

एक और मिश्रण

सब ने कहा सच्चे इरादों में दम होता है,
पर मुरादें सब हों पूरी, ऐसा कम होता है,
हौसला अफजाई कि बात और है'नीरज',
अक्सर घरों में एक कमरा कम होता है...
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हुजूर कहते हैं कि पाजिटिव लिखो,
कैसे समझाएं उन्हें,
एक और कमरे कि चाहत भी पाजिटिव है,
जिंदगी से समझौते कि आदत भी पाजिटिव है,
शब्दों के अर्थ हम बेशक अपने निकालें,
चाहतों कि चाहत भी पाजिटिव है....
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बादलों में शक्ल खोजते खोजते,
वो हवाओं से दूर चला जाता है,
दिशायें हैं मौन कैसे समझाऊं,
कि उसे कोई और भी बुलाता है...
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सब को सुनते सुनते ही मैं सो गया;
दिलों कि बात चुनते चुनते सो गया;
फैसलों के दरमियाँ  सोता रहा;
रास्तों को नापने में सो गया ;
कारवां था , कारवां चलता रहा;
मैं मगर फिर भी सदा सोता रहा;
अब जगाने से भला क्या फायदा;
कल था अरमां आज देखो सो गया....
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अब भी यकीन नहीं होता
कि कभी यहाँ कश्ती कोई चली होगी ;
सूखी दरारों में ज़मीं है,
और गहराइयाँ भी समतल हो चली हैं,
अलबत्ता कुछ चिकने से पत्थर ज़रूर हैं,
जिन पर से कभी बहुत पानी बहा होगा,
कभी यहाँ भावनाओं कि नदी होगी,
अब भी यकीन नहीं होता
कि कभी यहाँ कश्ती कोई चली होगी ;
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वन में हो या भवन में हो ,
आदमी, अपनी ख़ुशी खोज़ लेता है,
फिर ये कौन है जो इस भीड़ में,
न होने की कमी देता है ;
महज़ सोचने से सूखी आँखों में,
क्यों यादों कि नमी देता है;
जीने क़ी सजा ही काफ़ी थी,
क्यों दो गज ज़मीं देता है;
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बाकी सब वैसा ही है,
पुराना सा...
कुछ जाना, कुछ अनजाना सा,
कहीं पर वो है,
मगर कुछ बेगाना सा,
यहाँ पर मैं हूँ,
ज़रा सा दीवाना सा,
जो वो जब पूछ बैठे,
कि कैसे हैं हम...
हम कैसे बतलाते की,
हूँ इक अफसाना सा...
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व्याकुल सुबह, मचलता दिन और भर्राई शाम,
हँसता दुःख, रोती ख़ुशी और लवों पर नाम,
मेरा भी, तेरा भी, संदेशों का पैगाम,
कुछ गलतियों से सीख, कुछ उनका अंजाम,
कितना कुछ तो पा लिया, और क्या पायेंगे,
तुम्हारे दर से लौटे हैं अब और कहाँ जायेंगे...
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गर्मियों के उत्पीडन पर पवन की दृष्टि ज़ारी है,
बहुत सी खुशियों पर तेरा गम अब भी भारी है...
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भीड़ में और अकेले में,
एक ही इंसान में,
फर्क लाज़मी है............
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सुकून से रहो गहराइयों में ग़ालिब,
तुम्हारी ऊँचाइयों से लोग गिरे जाते हैं,
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 वो भी उसी छांव में सुस्ताते हैं,
पर कहते हैं,
हमारा नज़रिया जुदा है...
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कभी तुम भी नहीं थे,
कभी हम भी नहीं थे,
पर अब,
मुश्किलें भी,
आसानी से गुज़र जाती हैं...
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सूखी नदी,
और किनारे पसरी एक नाव,
सब को इंतज़ार है......
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किसी ने बड़े सलीके से तह करके,
दराजों में बंद किया,
और फिर खोलना भूल गया,
किसी ने ताबूत में उतारा,
मिटटी में झुकाया,
और ढंकना भूल गया,
किसी ने बड़ी बड़ी बातें की,
सपने दिखाए,
और सुलाना भूल गया,
इन सब के बावजूद जिंदा हूँ,
रात का तीसरा पहर है,
पर कोई कहता है,
इसके बाद सहर है......
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इन खूबसूरत हरी वादियों के पीछे ऊँचे पर्वत रहते हैं,
मेरे घर के कमरे में भी कुछ सुन्दर सपने पलते हैं....
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अब न कहने को, न सुनने को कुछ बाकी है,
अल्फाज़ों ने ही मारा है, अब खालीपन ही साक़ी है.
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नहीं ज़माने में ख़ुशी बिकती है,
ये तो खुद के जेहन में दिखती है,
शुक्रिया दोस्तों तुम्हारे हौसलों का,
मुझे भी रोशनाई दिखती है,
जो कुछ थमी थमी सी रहती थी,
कलम अब फिर प्रवाह लिखती है.
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इन लम्हों का,
शोर भी,
ख़ामोशी है...
कोई अंगूर नहीं,
फिर भी मदहोशी है,
इस ख़ामोशी में,
कोई जिंदगानी है,
जिसके बोलने की ताक़त..
रूहानी है,
माना कि मुलाकातों के,
लम्हे चंद हैं,
पर इन आँखों में भी
कुछ सपन बंद हैं,

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उस अलसाई सी शाख पर,
जो मेरा उल्लू बैठा था...
किसी का दिन था वो,
मेरी रातों पर ऐंठा था,
कुहासे का वो आलम,
कैसे ख़ाक हुआ,
किसी को याद करना भी,
यहाँ मज़ाक हुआ....
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 कोई कुछ भी कहे पर सदा मैंने ये माना है,
किसी को याद करना भी किसी के पास जाना है....
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ये मेघ गरज कर यूँ बरसे मैं बाकी सब कुछ भूल गया,
अपनों को रुलाना भूल गया अपनों को मनाना भूल गया,
मन भीगा, यौवन भीगा, चेहरे का दर्पण भीग गया,
बादल के पानी से देखो धरती का पानी भीग गया.
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हम समझते हैं तुम्हारी ये चुप्पी,
नासमझी की आड़ में इक मजबूरी है;
तुम जो कहते हो तुम्हे आभास है पर;
आभास का आभास भी बेहद ज़रूरी है.

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आज क्यों आँखें अचानक नम हुई,
एक दिल की आरज़ू थी, कम हुई...
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एक ही बात बार बार,
गरीब के सब्र को,
कब तक आंकोगे,
प्यास बुझे न बुझे कोई गम नहीं,
पर खाली गिलासों में,
कब तक झांकोगे....
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कोहरा अब भागने लगा है...मुझे धीरे धीरे सब दीखने लगता है,  खेत जोतता लल्लन, खूंटा तोड़ कर जैगोबिन्द की मटर चरती मोहना कुम्हार की गाय, दूकान की टीन की छत, और वो छोटी लड़की बस्ता लिए...प्रतीक्षा करती हुई...मुझे सब दिखाई देता है.

the fog struggles for its existence now....slowly i start seeing again, Lallan ploughing the fields, Mohna potter's cow that has ventured into Jaigobind's peas farm, the asbestos roof of the shop and the little girl with a school bag....waiting...i can see all now.

(it describes a winter morning in my village when the fog unsettles..sorry for the poor translation :)
.....मेरे संस्मरण से
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जो हसरत थी अधूरी, अभी भी है अधूरी,
तुम्हारी शोखियों से नहीं होती ये पूरी,
टिके रहना मगर तुम, ये जन्नत है यहीं पर,
ये अम्बर है यहीं पर, ये धरती है यहीं पर...
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इन पहाड़ों से नीचे उतरते वक़्त ऊपर खड़ी वह बच्ची काफ़ी देर तक दिखती है....हाथ हिलाती हुई.
उसका यूँ हवा में हाथ हिलाना अपने आप में एक दुनिया है....जैसे एक फौजी बाप छुट्टियों के बाद वापस जा रहा हो...अपनी दुनिया से..

---मेरे एक संस्मरण से
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खोल कर इन कागज़ों को कौन पढना चाहता है,
पर लिखावट ठीक कर लो, आखिर इसमें हर्ज़ क्या है ...
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ये तो कुछ भी नहीं,
महज़ इश्क मेरा है गरीबी से,
मेरा घर चल रहा तुमसे,
तुम्हारी खुशनसीबी से...
तो क्या हुआ कि मेरे खांसने से,
रक्त गिरता है,
तो क्या हुआ की दम मेरा,
दमे से रोज़ मरता है ...
तुम्हारे कैमरे में कैद,
ये फोटू बना लेना,
कहीं पर छाप देना,
और कहीं कविता लिखा लेना,
और फिर भूल जाना तुम,
हमें बेहद गरीबी से,
मेरा घर चल रहा तुमसे,
तुम्हारी खुशनसीबी से...
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आज का दिन भी ख़ामोशी के गर्भ से निकला था I सोमवार की सुबह भी सब मौन था; पवन का अवकाश ज़ारी था, पेड़ों के अधर भी चिपके हुए, पक्षी जैसे किसी शोक सभा में बैठे थे, सड़क अपनी मांग भरना भूल गयी थी शायद I ये सब अब मुझे जाना पहचाना सा लगता है; जैसे वर्षों से इसी ख़ामोशी में जी रहा था I पर ये ख़ामोशी अलग है I ये एक छोटे पर भागते हुए शहर की ख़ामोशी है जिसकी आवाज़ मुझ तक नहीं पहुँचती I पर ये किसी और को क्यूँ नहीं दिखाई देती ?  या फिर शायद ये ख़ामोशी मेरे अन्दर है, जो वर्षों से धीरे धीरे सीने में कहीं रिसती रही है I तभी इस भीड़ में भी स्वयं को अकेला पाता हूँ और घर से दफ्तर एवं दफ्तर से घर हरी भरी सड़क से अकेला चला आता हूँ I कुछ याद नहीं रहता; कुछ याद नहीं आता I ये कैसी खामशी है जिसमे न कुछ दिखाई देता है न सुनाई देता है I

मेरे संस्मरण से...
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आज मैं जग रहा हूँ,
और रात,
बेसुध है,
मौन और निश्तब्ध,
कल अवकाश है शायद.....
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जहाँ पर गगरियों में भी लाज सिमट जाती थी,
उसी पनघट पर नींद आ जाती तो अच्छा होता,
जहाँ पर चुप्पियों में भी निगाहें लिपट जाती थी,
उसी जमघट पर शाम ठहर जाती तो अच्छा होता,
सैकड़ों हैं ख्वाहिशें ऐसी दफ़न नीरज,
फकत गौर एक हो जाती तो अच्छा होता.
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नींदों में रातें फिर थमेंगी,
जब ये पुरवाई बहेगी,
आज का अफ़सोस क्यों कर,
कल दिशायें फिर सुनेंगी
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आज फिर,
जिंदगी मुझसे ,
और मैं उससे,
कुछ मांग रहे हैं...
यकीन और हकीकत की,
दुनिया से परे,
अपनी ही सीमाएं,
लांघ रहे हैं.
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अब भी उम्मीद लगाये बैठा हूँ,
उन पहचानी सी सड़कों पर,
कोई हाथ हिलाएगा,
मैं रुक जाऊंगा .....
नादान हूँ मैं ....
इतना भी नहीं समझता,
वक़्त की बेरहम करवट है;
कब तक उम्मीदों में जी पाउँगा,
एक दिन सड़क भी,
पहचानने से इनकार कर देगी,
तब उम्मीदों में ही....
गुज़र जाऊंगा.
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जिंदा है

हुआ क्या जो हमारे हाथ छूटे बिखरी राहों में,
हथेली पर अभी तक हाथ का आभास जिंदा है;

जो रस्ते थे बहकते शाम को क़दमों की आहट से,
नशे में आज भी धुत हैं, वही मयखार जिंदा है;

गए थे दूर फिर भी आसमां न मिल पाया धरा को,
तो क्या गम है अभी तक बादलों के तार जिंदा है;

अभी भी आस जिंदा है, अभी एहसास जिंदा है,
हमारी धमनियों में जीने का अंदाज़ जिंदा है;

नहीं कुछ भी कभी खोता, अगर हम खोना न चाहें,
जो जिंदा रख सकें खुद को तो सब संसार जिंदा है.

Tuesday, June 28, 2011

साफ़ दिखती हैं

हमेशा से मैं आँखों के तबस्सुम खोजता था,
कहाँ कब सोचा था बाज़ारों में मुस्कान बिकती है,
जिन्हें था कल तलक नहीं ज्ञान सीधे अक्षरों का,
कलम उनकी बड़ी बेदाग़ होकर नगमे लिखती है,
जिन्हें मैं सोचता था, मेहनती हैं, आगे जायेंगे,
बड़े  ईमान से हर रोज़ उनकी हस्ती मिटती है,
जिन्हें तुमने कभी अरमानों से नींदों में पाला था,
अभी तक सो रहे हैं वो, तुम्हारी ख्वाहिश सस्ती है,
रौशनी में भी जिन्हें था देखना मुश्किल नीरज,
अंधेरों में वो चीज़ें हैं जो बिलकुल साफ़ दिखती हैं...

Saturday, June 18, 2011

हम भी मुस्कुराएंगे

तुम जो कहते थे दोस्ती है,
हमने सोचा था आजमाएंगे;

तुम हमेशा आसरा दिखाते थे,
सोचा हम भी आशियाँ लुटाएंगे;

तुम किनारे पर मगर कैसे पहुंचे,
हमने सोचा था, दोनों डूब जायेंगे;

तुम जिस गली में रहते हो,
हम वहां अब गश्त न लगायेंगे;

तुम्हारा दामन पाक रहे हरदम,
हम गुनाहों का खाम्याज़ा पायेंगे;

तुमने तोड़े थे जो पेड़ों के पत्ते,
सूख गए हैं, हम उन्हें जलाएंगे;

तुम्हारी जिंदगी, जिंदगी रहे 'नीरज',
अज़ल से पर हम भी न मात खायेंगे;

तुम तबस्सुम को सदा सजाए रखना,
अरमां रहा तो हम भी मुस्कुराएंगे;

Thursday, June 16, 2011

अब भी यकीन नहीं होता

अब भी यकीन नहीं होता
कि कभी यहाँ कश्ती कोई चली होगी ;
सूखी दरारों में ज़मीं है,
और गहराइयाँ भी समतल हो चली हैं,
अलबत्ता कुछ चिकने से पत्थर ज़रूर हैं,
जिन पर से कभी बहुत पानी बहा होगा,
कभी यहाँ भावनाओं कि नदी होगी,
अब भी यकीन नहीं होता
कि कभी यहाँ कश्ती कोई चली होगी ;

Monday, June 13, 2011

आंच में ही फूलता है

आज उमस में शरीर से कुछ यूँ पसीना बहता है,
जैसे तेरी आँखों से ऐतबार बहा करता था;
मुहं से कुछ न बोलते थे लफ़्ज़ों से लेकिन,
प्यार का इक हल्का सा इकरार बहा करता था;

आज बीती बातों की बूढी कहानी हो गयी है,
लफ़्ज़ों की मासूमियत भी लफ़्ज़ों में ही खो गयी है;
ये पसीना बहते बहते आज मुझसे कह रहा है,
तुम जिसे समझे मोहब्बत, मेहरबानी हो गयी है;

हमने कितना कुछ कहा था, तुमने कितना कुछ सुना था,
फिर भी क्यों पिछला दिखाने, तुमने लम्हा वो चुना था;
उँगलियों में चोट से हम हाथ को नहीं काट देते,
ऐब कितने थे रहे पर ख्वाब तुम पर ही बुना था;

आज दिन मेरे नहीं अच्छे गुज़रते, मानता हूँ,
आज लिखने को नहीं है हाथ उठते, मानता हूँ,
पर कभी तुम भी हमारी रातों में थे जागते,
आज जगती रातों में अरमां झुलसते, मानता हूँ;

आज कुछ भी हाल होवे पर न बीता भूलता है,
इस समंदर में अभी भी लहरों सा मन झूलता है;
कोई कितना भी कहे पर है मुझे विश्वास अन्दर,
प्रेम का आटा सदा से आंच में ही फूलता है;

Sunday, June 12, 2011

राख की आग

अब रात ही रात में रात बिखर जाती है,
रोज़ अंधेरों में निकली ख्वाहिश किधर जाती है,
यूँ तो दिल बर्फीली रातों में भी हैं झुलसे,
पर राख में लगी आग से रूह भी सिहर जाती है;

अब तो जलने को भी न बचा, अब क्या सोचते हो,
क्यों भट्टियों में धमनियों का क्रोध झोंकते हो,
मुर्दे तो यूँ भी न बोलते हैं, न डोलते हैं,
तुम क्यों मेरे ताबूत में कील और ठोंकते हो;

तुम सदा मुझसे यूँ ही नाराज़ नहीं रहते थे,
गुस्सा होते थे अक्सर पर दूर नहीं रहते थे,
आज तनहाइयों का ज़ुल्म सर चढ़ा है नीरज,
वरना तनहाइयों में भी हम मजबूर नहीं रहते थे;



Saturday, June 11, 2011

दो गज ज़मीं देता है

वन में हो या भवन में हो ,
आदमी, अपनी ख़ुशी खोज़ लेता है,
फिर ये कौन है जो इस भीड़ में,
न होने की कमी देता है ;
महज़ सोचने से सूखी आँखों में,
क्यों यादों कि नमी देता है;
जीने क़ी सजा ही काफ़ी थी,
क्यों दो गज ज़मीं देता है;

Wednesday, June 1, 2011

जीवन एक डब्बा

इसमें हमारा यथार्थ है,
जो बची खुची आक्सीज़न में,
सांस लेता है,
और इसमें है कल्पनाओं का भण्डार,
जो आँख खोले है,
पर बीच बीच सोता है;
इसमें ही भावनाओं का अम्बार है,
थोड़ी हंसी है,
थोड़े हैं आंसू,
एक चहकता परिवार है;
इसमें ही मन है,
चाहतों का दर्पण है,
जिसमे शक्ल नहीं दीखती,
पर इनपे सब अर्पण है...
इसमें हमारा कल है, आज है,
और कल का मनन है,
और इसमें हम कितना ही झगड़ लें,
इसमें ही अमन है,
यूँ तो ये बहुत छोटा है,
पर इसमें कितना कुछ भरा है,
ये शायद जादुई है,
क्योंकि सच्चा है, खरा है,
ये किसकी माया है,
ये कैसे रचाया है,
कि इतने छोटे से डिब्बे में,
जीवन के हर पहलू की,
लचकती एक डाली है;
और हम कितना भी भर लें,
ये डब्बा,
फिर भी खाली है.............

पुराना सा...

बाकी सब वैसा ही है,
पुराना सा...
कुछ जाना, कुछ अनजाना सा,
कहीं पर वो है,
मगर कुछ बेगाना सा,
यहाँ पर मैं हूँ,
ज़रा सा दीवाना सा,
जो वो जब पूछ बैठे,
कि कैसे हैं हम...
हम कैसे बतलाते की,
हूँ इक अफसाना सा...