Monday, June 13, 2011

आंच में ही फूलता है

आज उमस में शरीर से कुछ यूँ पसीना बहता है,
जैसे तेरी आँखों से ऐतबार बहा करता था;
मुहं से कुछ न बोलते थे लफ़्ज़ों से लेकिन,
प्यार का इक हल्का सा इकरार बहा करता था;

आज बीती बातों की बूढी कहानी हो गयी है,
लफ़्ज़ों की मासूमियत भी लफ़्ज़ों में ही खो गयी है;
ये पसीना बहते बहते आज मुझसे कह रहा है,
तुम जिसे समझे मोहब्बत, मेहरबानी हो गयी है;

हमने कितना कुछ कहा था, तुमने कितना कुछ सुना था,
फिर भी क्यों पिछला दिखाने, तुमने लम्हा वो चुना था;
उँगलियों में चोट से हम हाथ को नहीं काट देते,
ऐब कितने थे रहे पर ख्वाब तुम पर ही बुना था;

आज दिन मेरे नहीं अच्छे गुज़रते, मानता हूँ,
आज लिखने को नहीं है हाथ उठते, मानता हूँ,
पर कभी तुम भी हमारी रातों में थे जागते,
आज जगती रातों में अरमां झुलसते, मानता हूँ;

आज कुछ भी हाल होवे पर न बीता भूलता है,
इस समंदर में अभी भी लहरों सा मन झूलता है;
कोई कितना भी कहे पर है मुझे विश्वास अन्दर,
प्रेम का आटा सदा से आंच में ही फूलता है;

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