Friday, July 17, 2020

जो दबायी थी ज़मीं में उम्मीद, वो बेपरवाह सोती है,
कितना भी दो खाद पानी, कुछ बीज़ किस्मत बोती है,
वक़्त कुछ हवाओं से सहमा हुआ है इस कदर,
मास्क उतार दें तो सांस लेने में तकलीफ़ होती है।

Wednesday, July 15, 2020

पल जो आया था, पल गया यूँ ही,
कल जो आया था, कल गया यूँ ही,
ज़िंदगी फिर से तेरी चाहत में,
एक दिन और ढल गया यूँ ही।

वो सुबह का इक बड़ा सपना,
हमको लगता था जो सदा अपना,
आज सपना बदल गया यूँ ही,
एक दिन और ढल गया यूँ ही।

जो गुज़र जाती थीं हमें थामें,
वो किनारा वो अधबुनी शामें,
सोच उनको मचल गया यूँ ही,
एक दिन और ढल गया यूँ ही।

Monday, July 13, 2020

एक से हैं ये दिन, एक सी रात हैं,
तुम ये कैसे समय संकुचित कर गए;

बंद बाज़ार, सड़कें भी सूनी रहीं,
खुद चमन भी दशा देख हैरान थे,
हमने कमरों की नापी ज़मीं रोज़ ही,
घर से निकले नहीं थे, परेशान थे,

हमने फैलाये पर थे गगन में सदा,
तुम ये कैसे हमें संतुलित कर गए;

जिन ख्यालों को हम थे संजोये हुए,
वो हकीकत की इक दास्ताँ कह गए,
हाथ को हमने साबुन से धोया बहुत,
दिल में जो झाग थे, जस के तस रह गए;

राज़ जो थे छिपे राज़ ही रह गए,
तुम हमारा ह्रदय ही भ्रमित कर गए;

कुछ गगन की तरंगें भी अनजान थीं,
कुछ धरा को थे हम भी बढ़ाये हुए,
बात करते भी कैसे इस आवाज़ में,
हमने मुख पर थे कपड़े चढ़ाये हुए ;

​मौन ही मौन में हमने सब कुछ कहा,
तुम भाषाओं को, संगठित कर गए ;

​भूल बैठे मिलन की हैं रंगीनियां,​
है ये ख्वाहिश कि फिर रूबरू बात हो,
अबकी तम जो हटे तो रहे रौशनी,
​अबकी फिर से न ऐसी घनी रात हो,

अब तो आशाओं की बाट जोहेंगे हम,
तुम ऐसे हमें संक्रमित कर गए।

Saturday, July 11, 2020

ये जो सफ़ेद धब्बे हैं न,
तुम्हारी उजली पोशाक में दिखाई नहीं देते,
ये सुबकते हैं धीरे से पर सुनाई नहीं देते,
इनमें कितनी ही चीखें हैं,
जो अब गूंगी हो चली हैं,
कितनी ही आँखें हैं, बह कर,
अब सूखी हो चली हैं;
इन धब्बों में सपने हैं, झुलसाए हुए,
कितने ही बचपन हैं, मुरझाये हुए,
और ये जो काले धब्बे हैं न,
टी वी पर, समाचारों में,
जिनकी प्रचलित हैं कहानियां अत्याचारों में,
​आज कहते हो कि ये काला धब्बा ,
समाज की ​बीमारी है ,
पर तुम जानते हो,
कि इस काले रंग में स्याही तुम्हारी है;
​और ये सफ़ेद धब्बे तुम्हारे,
क्या तुम्हे इनका आभास है,
नहीं न, कहते हो मेरी पोशाक साफ़ है;
यूँ होना तो इन धब्बों का रंग लाल है,
पर सफ़ेद कर दिया, तुम्हारा कमाल है;
और कमाल है हमारा,
कि नहीं पहुँचती हम तक,
उस सुबकने की आवाज़ भी,
और चुनते ही रहते हैं हम,
सफ़ेद धब्बे ; आज भी।