ये जो सफ़ेद धब्बे हैं न,
तुम्हारी उजली पोशाक में दिखाई नहीं देते,
ये सुबकते हैं धीरे से पर सुनाई नहीं देते,
इनमें कितनी ही चीखें हैं,
जो अब गूंगी हो चली हैं,
कितनी ही आँखें हैं, बह कर,
अब सूखी हो चली हैं;
इन धब्बों में सपने हैं, झुलसाए हुए,
कितने ही बचपन हैं, मुरझाये हुए,
और ये जो काले धब्बे हैं न,
टी वी पर, समाचारों में,
जिनकी प्रचलित हैं कहानियां अत्याचारों में,
आज कहते हो कि ये काला धब्बा ,
समाज की बीमारी है ,
पर तुम जानते हो,
कि इस काले रंग में स्याही तुम्हारी है;
और ये सफ़ेद धब्बे तुम्हारे,
क्या तुम्हे इनका आभास है,
नहीं न, कहते हो मेरी पोशाक साफ़ है;
यूँ होना तो इन धब्बों का रंग लाल है,
पर सफ़ेद कर दिया, तुम्हारा कमाल है;
और कमाल है हमारा,
कि नहीं पहुँचती हम तक,
उस सुबकने की आवाज़ भी,
और चुनते ही रहते हैं हम,
सफ़ेद धब्बे ; आज भी।
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