Monday, April 1, 2019

देखे थे कितने ही सपनें,
पायी थी सौगात,
फिर ईश्वर ने क्यों दिखलाई,
बिछड़न की वह रात।

रहे तड़पते जल धारा को,
ज्यों नदिया का तीर,
रह रह कर लेती थी झपकी,
पलकें धीर अधीर।

संसाधन के रहते भी हम,
रहे सदा ही रंक,
उड़ने को जब नहीं दे सके,
हम बेटी को पंख।

बहुत दिनों पर मेघ तुम्हारी,
पिघली हैं अब आंखेँ,
प्रेम सुधा बरसा लौटा दी,
तुमने मेरी सांसें।

कुछ वर्षों से जो लगता था,
खोया इक सपना सा,
आओ बिटिया उन पन्नों में,
रंग भरें अपना सा।

तेरे आने से इस मरु में,
बहती इक धारा है,
उड़ने को बेटी तेरे अब,
आसमान सारा है।