Thursday, March 18, 2021

स्कूल की अठखेलियों से,
तर बतर निकले थे हम,
खट्टी मीठी यादों के संग,
अरमां थे हमारे भी आसमानी,
बढ़ाना चाहते थे कदम,
पर पलक झपकते ही हम पर,
सज गयी थी फौजी वर्दी,
होने वाले थे अट्ठारह के हम;

कदम से कदम मिलाकर,
सीख गए कहीं भी आना जाना,
भूल गए एक पत्थर को,
स्कूल से घर तक ठोकरों से लाना;
चपाती की गोलाई भर कट गए बाल,
ऐसे शुरू हुआ अट्ठारहंवा साल,
जाना कि दुनिया सच में दिन में सोती है,
जाना कि सुबह चार बजे होती है,
भूल गए साम दाम, भूली ढिठाई भी 
यहाँ परेड भी की और की पढ़ाई भी,
भूले वो शामें, वो साइकिल भी,
यहीं पेन भी पकड़ी यहीं राइफल भी,
यूनिवर्सिटी का कहाँ नॉलेज हुआ,
ट्रेनिंग सेंटर ही हमारा कॉलेज हुआ;

अगले बीस साल हमारी जवानी रही,
पहले खाकी, फिर आसमानी और,
चितकबरी वर्दी की रवानी रही,
वो बिना रिजर्वेशन के डब्बे जनरल रेल के,
वो काला बक्सा, वो होल्डाल, वो दिन खेल के,
वो जगह जगह किराये के घर को सजाना,
वो बक्सों को जोड़ कर सोफा कम बेड बनाना,
वो भारत दर्शन का अंतहीन भ्रमण,
वो आगरा, मद्रास वो जामनगर,
बीकानेरी सेव, जम्मू का राजमा, हैदराबाद की गाली,
वो सफर में गुज़री होली और दिवाली;

न हुई कोई कोर्टशिप न की कभी डेटिंग,
बाहरी दुनिया में जीरो थी अपनी रेटिंग,
इसी जवानी में हुई हमारी शादी भी,
इसी में बढ़ाई हमने देश की एक आबादी भी,
लगता था रहते हैं चकाचौंध से बहुत दूर,
पर जो भी मिला उसको जिया हमने भरपूर,
कुछ भी हो लहू को नहीं दिया थमने भी,
इस तरह एक यौवन है जिया हमने भी। 


Tuesday, March 16, 2021

 वे सच हम खुद ही भूल गए,
जिन्हे समय पर बता न सके,
पर वे झूठ सच बन गए,
जिन्हें समय पर झुठला न सके;

लम्बी जद्दोज़हद के बाद ये जाना,
कि सच वही है, जो सब ने माना,
और ठहर जाता है पसर के,
झूठ भी, यदि पा जाए ठिकाना;

यदि समर्थ हैं हम अभिनय में,
तो हर मिथ्या के अर्थ हैं,
और यदि हैं जुड़े भावना से,
तो कुछ तथ्य बिल्कुल व्यर्थ हैं। 

Thursday, March 11, 2021

धंसे तीर से उपजा नीर ही सही,
कामना भी कुछ अधीर ही सही,
ये भी हासिल नहीं अधिकतर को,
प्रेम न बन सके तो पीर ही सही;

 

Tuesday, March 9, 2021

ये जो रह रह कर,
तुम्हारी कमर पकड़ लेती है,
और जिसे आमतौर पर,
सब बताते हैं,
स्लिप डिस्क के,
दूरगामी परिणाम,
ये असल में नतीजा है,
मैले हुए,
उन दिमागी चिंताओं का,
जिन्हें तुमने धोया नहीं,
उन बोझों का,
जिससे बचकर निकल गए तुम,
कभी ढोया नहीं।

 

Tuesday, March 2, 2021




कितने ही लोग मिलेंगे,
बांटने को सवेरे,
पर ढोने पड़ते हैं खुद ही,
अपने हिस्से के अँधेरे ....