स्कूल की अठखेलियों से,
तर बतर निकले थे हम,
खट्टी मीठी यादों के संग,
अरमां थे हमारे भी आसमानी,
बढ़ाना चाहते थे कदम,
पर पलक झपकते ही हम पर,
सज गयी थी फौजी वर्दी,
होने वाले थे अट्ठारह के हम;
कदम से कदम मिलाकर,
सीख गए कहीं भी आना जाना,
भूल गए एक पत्थर को,
स्कूल से घर तक ठोकरों से लाना;
चपाती की गोलाई भर कट गए बाल,
ऐसे शुरू हुआ अट्ठारहंवा साल,
जाना कि दुनिया सच में दिन में सोती है,
जाना कि सुबह चार बजे होती है,
भूल गए साम दाम, भूली ढिठाई भी
यहाँ परेड भी की और की पढ़ाई भी,
भूले वो शामें, वो साइकिल भी,
यहीं पेन भी पकड़ी यहीं राइफल भी,
यूनिवर्सिटी का कहाँ नॉलेज हुआ,
ट्रेनिंग सेंटर ही हमारा कॉलेज हुआ;
अगले बीस साल हमारी जवानी रही,
पहले खाकी, फिर आसमानी और,
चितकबरी वर्दी की रवानी रही,
वो बिना रिजर्वेशन के डब्बे जनरल रेल के,
वो काला बक्सा, वो होल्डाल, वो दिन खेल के,
वो जगह जगह किराये के घर को सजाना,
वो बक्सों को जोड़ कर सोफा कम बेड बनाना,
वो भारत दर्शन का अंतहीन भ्रमण,
वो आगरा, मद्रास वो जामनगर,
बीकानेरी सेव, जम्मू का राजमा, हैदराबाद की गाली,
वो सफर में गुज़री होली और दिवाली;
न हुई कोई कोर्टशिप न की कभी डेटिंग,
बाहरी दुनिया में जीरो थी अपनी रेटिंग,
इसी जवानी में हुई हमारी शादी भी,
इसी में बढ़ाई हमने देश की एक आबादी भी,
लगता था रहते हैं चकाचौंध से बहुत दूर,
पर जो भी मिला उसको जिया हमने भरपूर,
कुछ भी हो लहू को नहीं दिया थमने भी,
इस तरह एक यौवन है जिया हमने भी।