वे सच हम खुद ही भूल गए,
जिन्हे समय पर बता न सके,
पर वे झूठ सच बन गए,
जिन्हें समय पर झुठला न सके;
लम्बी जद्दोज़हद के बाद ये जाना,
कि सच वही है, जो सब ने माना,
और ठहर जाता है पसर के,
झूठ भी, यदि पा जाए ठिकाना;
यदि समर्थ हैं हम अभिनय में,
तो हर मिथ्या के अर्थ हैं,
और यदि हैं जुड़े भावना से,
तो कुछ तथ्य बिल्कुल व्यर्थ हैं।
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